झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (जेटेट) की नई नियमावली को लेकर राज्य में भाषा विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। राज्य सरकार की ओर से जारी ताजा अधिसूचना में क्षेत्रीय भाषाओं की सूची से मगही, भोजपुरी, मैथिली और अंगिका को हटाए जाने पर विरोध के स्वर मुखर हो गए हैं।
इस फैसले ने न केवल विपक्षी दल भाजपा को हमलावर होने का मौका दे दिया है, बल्कि सत्ताधारी गठबंधन के कई नेता भी भाषाई विसगंति को लेकर सवाल खड़े कर रहे हैं। इस विवाद का सबसे अधिक असर पलामू प्रमंडल और संथाल परगना के सीमावर्ती इलाकों के उन हजारों अभ्यर्थियों पर पड़ रहा है, जो झारखंड के मूल निवासी हैं, लेकिन उनकी मातृभाषा भोजपुरी, मगही या अंगिका है।
दूसरी तरफ, सरकार की नियमावली तैयार करने वालों का पक्ष है कि ये भाषाएं मुख्य रूप से बिहार में प्रचलित हैं, इसलिए इन्हें झारखंड की क्षेत्रीय भाषा सूची में शामिल नहीं किया गया। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद आदित्य साहू ने नियमावली लागू होने से पहले ही मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर भाषा निर्धारण में ‘दोहरा मापदंड’ अपनाने का आरोप लगाया था।
उन्होंने कहा कि करीब एक दशक से लंबित जेटेट परीक्षा को लेकर लाई गई नई नियमावली में क्षेत्रीय भाषाओं का चयन न केवल अतार्किक है, बल्कि इससे अनावश्यक भाषाई विवाद को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने सवाल उठाया कि जब ओडिशा और पश्चिम बंगाल से सटे जिलों में क्रमशः उड़िया और बंगला को क्षेत्रीय भाषा के रूप में मान्यता दी जा रही है, तो बिहार से सटे जिलों में बोली जाने वाली भाषाओं के साथ अलग व्यवहार क्यों किया जा रहा है।
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उन्होंने पलामू, गढ़वा, लातेहार के अलावा संथाल परगना के देवघर, गोड्डा और साहिबगंज जिलों का हवाला देते हुए कहा कि इन इलाकों में भोजपुरी, मगही, अंगिका और मैथिली बोलने वालों की बड़ी आबादी है, फिर भी इन्हें सूची से बाहर रखना भेदभावपूर्ण है। भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष और पूर्व मंत्री भानु प्रताप शाही ने भी इस फैसले का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि यह स्थानीय भाषाओं और अभ्यर्थियों के अधिकारों की अनदेखी है।
उन्होंने कहा कि पलामू और गढ़वा जिले में नागपुरी बोलने वाले लोग नहीं के बराबर हैं, लेकिन इसे क्षेत्रीय भाषा की सूची में नहीं रखा गया है। पूरे पलामू प्रमंडल में भोजपुरी और मगही भाषा बोलने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है, लेकिन इन भाषाओं को सूची में जगह ही नहीं दी गई है। राज्य सरकार में वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने नियमावली में विसंगतियों को स्वीकार करते हुए कहा कि पलामू और गढ़वा जिलों में भोजपुरी और मगही बोलने वालों की बड़ी संख्या है, लेकिन इन भाषाओं को सूची में शामिल नहीं किया गया है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वे इस मुद्दे को आगामी कैबिनेट बैठक में उठाएंगे। पूर्व मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता केएन त्रिपाठी ने भी कहा है कि पलामू प्रमंडल में भोजपुरी और मगही सबसे ज्यादा बोली जाती है, लेकिन जेटेट में इन भाषाओं को शामिल नहीं किया जाना सरासर गलत है।
डाल्टनगंज से भाजपा विधायक आलोक चौरसिया ने सरकार पर पलामू प्रमंडल के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि वर्षों से जेटेट की तैयारी कर रहे छात्रों को उनकी मातृभाषा भोजपुरी-मगही में परीक्षा देने के अवसर से वंचित करना न केवल अन्याय है, बल्कि उनके आत्मविश्वास पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। चौरसिया ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने जल्द ही इस फैसले पर पुनर्विचार नहीं किया, तो व्यापक जन आंदोलन किया जाएगा।
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