कर्नाटक में आज शाम को होने वाला मंत्रिमंडल विस्तार सत्ता संतुलन, आलाकमान के दखल और क्षेत्रीय-जातिगत दांव-पेंच का नतीजा होगा, जिसमें 20 नये मंत्रियों को मंत्री पद की शपथ दिलायी जाएगी।
इस सूची में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया के राजनीतिक नेटवर्क, नयी दिल्ली में कांग्रेस आलाकमान, क्षेत्रीय नेताओं, वरिष्ठ विधायकों और पार्टी संगठन का असर दिखता है। हर मंत्री की नियुक्ति का मतलब केवल पद देना नहीं बल्कि किसी राजनीतिक दावे को सुलझाना भी है। मंत्रिमंडल के विस्तार में देरी का कारण यह भी हो सकता है। कांग्रेस में महत्वाकांक्षा की कमी कभी नहीं रही, कमी थी तो बस खाली पदों की। इस बार 20 मंत्री पदों के लिए 60 से अधिक विधायक रेस में थे। हर नियुक्ति से कोई न कोई दावेदार निराश हुआ। हर नाम छूटने पर राजनीतिक प्रबंधन की जरूरत पड़ी। आखिरी फैसला अंतत: नयी दिल्ली से आया।
कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल के पत्र में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की मंजूरी थी, जिसने सप्ताहों से चल रही अटकलों पर विराम लगा दिया। इसके बाद ही श्री शिवकुमार ने चुने गए विधायकों को शपथ ग्रहण के लिए बुलाना शुरू किया। कैबिनेट में कोई चौंकाने वाला बदलाव नहीं दिखता है। पिछली सरकार के मंत्री, जैसे बीजेड जमीर अहमद खान, संतोष लाड, मधु बंगारप्पा, एन चेलुवरया स्वामी, मंकला वैद्य और शिवराज तंगदागी या तो अपनी जगह बनाए रखने में कामयाब रहे या उन्हें फिर से कैबिनेट में जगह मिली। इससे अनुभवी विधायकों और श्री सिद्दारमैया के राजनीतिक नेटवर्क का लगातार बना हुआ असर दिखता है।
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इनके साथ ही पीएम नरेंद्रस्वामी, डॉ. अजय सिंह, रिजवान अरशद, रुद्रप्पा लमानी, केएस बसवंथप्पा, टी रघुमूर्ति, एचसी बालकृष्ण और गायत्री शांतेगौड़ा भी शामिल हैं। यह पार्टी की उस कोशिश को दिखाता है जिसमें वह पुरानी पीढ़ी को नाराज किए बिना नयी पीढ़ी को आगे बढ़ाना चाहती है। इस सूची में बी नागेंद्र, पुत्तरंगा शेट्टी, केएम शिवलिंगे गौडा, बसवराज रायरेड्डी, विजयानंद कशप्पनवर और लक्ष्मण सावदी भी शामिल हैं। इससे यह मंत्रिमंडल राजनीतिक तालमेल और प्रशासनिक जरूरत दोनों को ध्यान में रखकर बनाया गया है।
कर्नाटक मंत्रिमंडल विस्तार में किसी एक गुट का दबदबा होने की बजाय कांग्रेस ने ऐसा मंत्रिमंडल बनाया है जिसमें लगभग हर प्रभावशाली क्षेत्र के लोगों को अपना जाना-पहचाना चेहरा मिल सकता है। क्या इससे असरदार शासन भी हो पाएगा, यह तो समय ही बताएगा। कर्नाटक में मंत्रिमंडल बनाना लंबे समय से राजनीतिक गणित का खेल रहा है। जाति, इलाका, समुदाय, वरिष्ठता और चुनावी प्रदर्शन, ये सभी एक ही मेज पर जगह पाने के लिए होड़ करते हैं। काबिलियत मायने रखती है लेकिन प्रतिनिधित्व भी अक्सर उतना ही जरूरी होता है।
पूर्व मंत्री दिनेश गुंडू राव ने बहुत संयम के साथ अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि उनके तीन साल के कार्यकाल के बाद दूसरों को भी मौका मिलना चाहिए। राजनीति में ऐसी उदारता का स्वागत किया जाना चाहिए। शपथ ग्रहण के दिन ऐसी उदारता कम ही देखने को मिलती है।
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