मिठाइयों, हलवे और सूखे मेवों का स्वाद बढ़ाने वाली चिरौंजी न सिर्फ स्वादिष्ट बल्कि सेहत के लिए भी बेहद फायदेमंद है। औषधीय गुणों से भरपूर चिरौंजी को आयुर्वेद में खासा स्थान प्राप्त है। यह त्वचा से लेकर पाचन तक की समस्याओं को दूर करने में यह कारगर मानी जाती है।
बिहार सरकार का पर्यावरण, वन एवं जलवायु विभाग लोगों को इस बहुमूल्य पेड़ और इसके गुणों से अवगत कराता है। विभाग का कहना है कि चिरौंजी को पहचानें, इस्तेमाल करें और इसके संरक्षण में भी योगदान दें। चिरौंजी एक मध्यम आकार का पतझड़ी पेड़ है, जो लगभग 15 मीटर तक ऊंचा हो सकता है। इसकी छाल गहरे धूसर रंग की होती है, जो मगरमच्छ की खाल जैसी दिखती है। छाल के अंदर का हिस्सा लाल रंग का होता है, जिससे इसे आसानी से पहचाना जा सकता है।
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इसके बीज बादाम जैसे स्वाद वाले होते हैं और इन्हें सूखे मेवे के रूप में खूब पसंद किया जाता है। भारतीय मिठाइयों में चिरौंजी का इस्तेमाल स्वाद और बनावट दोनों बढ़ाने के लिए किया जाता है। हलवा, लड्डू, खीर, आइसक्रीम और कई पारंपरिक मिठाइयों में यह जरूर शामिल की जाती है। स्वाद के अलावा यह पौष्टिक भी है और सूखे मेवों की श्रेणी में गिना जाता है।
चिरौंजी के औषधीय गुणों पर नजर डालें तो आयुर्वेद में चिरौंजी को विशेष महत्व दिया गया है। इसकी जड़ें कसैली और ठंडी प्रकृति की होती हैं, जो दस्त (डायरिया) और पाचन संबंधी समस्याओं में राहत पहुंचाने में उपयोगी मानी जाती हैं। चिरौंजी त्वचा संबंधी विभिन्न रोगों के इलाज में भी कारगर है। इसके नियमित सेवन से त्वचा स्वस्थ और चमकदार रहती है। यह पेड़ न सिर्फ आर्थिक रूप से फायदेमंद है बल्कि पर्यावरण के लिए भी महत्वपूर्ण है।
बिहार सरकार लोगों से अपील कर रही है कि वे अपने आस-पास उगने वाले चिरौंजी के पेड़ों की पहचान करें, उनकी रक्षा करें और इनके संरक्षण में भाग लें। उपयोग और महत्व मिठाइयों और डेजर्ट में स्वाद बढ़ाने के लिए, सूखे मेवे के रूप में पौष्टिक नाश्ते में या आयुर्वेदिक दवाओं में त्वचा और पाचन की समस्याओं के उपचार के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।
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