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ये जो सूरत-ए-हाल है!

जब ऐसी साधारण चीजों का बाजार सिकुड़ा है, तो निर्यात होने वाली वस्तुओं के लिए देश के अंदर उपभोक्ता ढूंढना नामुमकिन ही है। आयात का गिरना इस बाजार रुझान का भी एक संकेत है।

निर्यात और आयात दोनों में अप्रैल में भारी गिरावट आई। निर्यात में 12 प्रतिशत और आयात में 14 प्रतिशत गिरावट आई। इसका ऊपर से दिखने वाला सकारात्मक नतीजा यह है कि देश का व्यापार घाटा कम हो गया। लेकिन यह गौर करने की बात है कि आयात में गिरावट को सिर्फ दो स्थितियों में अच्छी खबर माना जाता है। पहली तो यह कि उत्पादन सामग्रियां देश के अंदर ही बन रही हों और इनका इस्तेमाल निर्यात के लिए उत्पादन में हो रहा हो। दूसरी यह कि देश के अंदर बाजार बढ़ रहा हो और उसकी मांग को पूरा करने लायक उत्पादन करने में देश आत्म-निर्भर हो गया हो। ये आदर्श स्थितियां होती हैं। लेकिन भारत के साथ यह सूरत नहीं है। यहां आयात गिरने का सीधा अर्थ देश के अंदर उत्पादक गतिविधियों में गिरावट के कारण मांग का घटना है। जाहिर है, निर्यात के लिए विदेशों में प्रतिकूल बनते हालात के कारण निर्यात की स्थितियां बिगड़ रही हैं, तो देश के अंदर उत्पादक गतिविधियां भी धीमी हो रही हैं।

इस बात की तस्दीक दूसरे आंकड़े भी करते हैं। मसलन, यह खबर महत्त्वपूर्ण है कि एफएमसीजी (तेल-साबुन जैसी रोजमर्रा के उपभोग की चीजें बनाने वाली कंपनियों) अब अपने मुनाफे की कीमत पर सामग्रियों के दाम घटाने का फैसला किया है। साथ ही उन्होंने उन चीजों के वजन बढ़ाने का फैसला किया है, जिनकी कीमत पहले जितनी रखने के लिए उनकी मात्रा में कटौती कर दी थी। इसका साफ तौर पर अपने गायब होते उस बाजार को वापस पाने की कोशिश है, जो महंगाई के कारण कंपनियों ने गंवा दिया है। एक वित्तीय अखबार ने यह खबर छापी है कि हेडलाइन मुद्रास्फीति में गिरावट के बावजूद अप्रैल में उपभोक्ता समग्रियों की महंगाई बनी रही। ऐसे में उपभोक्ताओं का बजट में कटौती करने का ट्रेंड जारी रहना स्वाभाविक है। जाहिर है, जब ऐसी साधारण चीजों का बाजार सिकुड़ा है, तो निर्यात होने वाली वस्तुओं के लिए देश के अंदर उपभोक्ता ढूंढना नामुमकिन ही है। आयात का गिरना इस बाजार रुझान का भी एक संकेत है। भारत की आर्थिक संभावनाओं के मचे शोर से बीच ये हकीकत गुब्बारे में छेद करने वाली पिन की तरह हैँ।

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