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मोह-भंग और सही सबक

अब पहलवानों को अहसास हुआ है कि राजनीति से दूर रहने की चाहत में उनका संघर्ष अकेला और कमजोर पड़ चुका है। देर से ही सही लेकिन उनमें अब दुरुस्त समझ विकसित हुई है, तो उसका स्वागत किया जाएगा।

देश का नाम रोशन करने वाले पहलवान अभी कुछ ही समय पहले दिल्ली के जंतर-मंतर  पर धरना देने आए थे। उन्होंने भारतीय कुश्ती संघ के अध्यक्ष ब्रजभूषण शरण सिंह पर यौन शोषण का गंभीर आरोप लगाया था। तब सीपीएम नेता वृंदा करात उन्हें समर्थन देने पहुंची थीं, तो पहलवानों ने उन्हें मंच से उतार दिया था। उन्होंने कहा कि उन्हें कोई राजनीति नहीं करनी है- सिर्फ अपनी शिकायत का हल निकालना है। तब उन्हें सरकार- खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न्याय भावना पर भरोसा था। अब वे फिर से जंतर-मंतर पर आए हैं। इस बार उनकी आंखों में आंसू हैं और अपनी शिकायत ना सुने जाने का गम उनकी आवाज पर हावी है। रात भर जंतर-मंतर पर जमीन पर सोकर गुजारने के बाद सोमवार को पहलवानों की तरफ से ओलंपिक पदक विजेता पहलवान बजरंग पूनिया ने एक महत्त्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने कहा कि इस बार समर्थन देने के लिए आने वाले राजनेताओं या राजनीतिक दलों से उन्हें कोई गुरेज नहीं है। बल्कि उन्होंने सबसे गुजारिश की कि वे आगे आकर खिलाड़ियों का समर्थन करें।

कहा जा सकता है कि खिलाड़ियों ने यह सही सबक सीखा है। राजनीति नहीं करनी या किसी संघर्ष का कोई राजनीतिक लाभ ना उठाए, जैसी सोच नव-उउदारवादी दौर में शासक वर्ग की तरफ से लोगों पर थोपा गया फॉर्मूला है। राजनीतिक लड़ाई भी अ-राजनीतिक दिखे, इस कोशिश के तहत हर संघर्ष की धार कमजोर करने का प्रयास इसके जरिए किया गया, जो खासा कामयाब रहा है। यह सोच किसान आंदोलन से लेकर कई बार श्रमिकों के आंदोलन तक में देखने को मिली है। नतीजा यह हुआ कि राजनीति का वैचारिक आधार क्षीण हो गया है, जिससे हर उत्पीड़ित समूह अकेला पड़ता चला गया है। इससे सरकारों और शासक तबकों के लिए हर लड़ाई के दायरे को सीमित कर देना और अंततः उसे नाकाम कर देना आसान हो गया है। अब पहलवानों को अहसास हुआ है कि राजनीति से दूर रहने की चाहत में उनका संघर्ष अकेला और कमजोर पड़ चुका है। देर से ही सही लेकिन उनमें अब दुरुस्त समझ विकसित हुई है, तो उसका स्वागत किया जाएगा।

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