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यूजीसी नियमों पर बैकफुट पर सरकार

नई दिल्ली। उच्च शिक्षण संस्थानों के कैम्पस में कथित तौर पर समानता लाने के नाम पर लाए गए यूजीसी के दिशानिर्देशों पर केंद्र सरकार बैकफुट पर आई है। केंद्र सरकार ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वह इस पर पुनर्विचार कर रही है। गुरुवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने इस पर अपना पक्ष रखने के लिए और समय मांगा। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को चार हफ्ते का समय दिया है और इस दौरान विस्तृत हलफनाम दायर करने को कहा है।

गौरतलब है कि यूजीसी की ओर से उच्च शिक्षण संस्थानों के कैम्पस में समानता स्थापित करने का नाम पर कुछ दिशानिर्देश जारी किए गए थे, जो बहुत भेदभाव वाले थे। उसमें सामान्य वर्ग के छात्रों को बिना कुछ किए अपराधी बनाने का प्रावधान था। सामान्य वर्ग की ओर से इसका जबरदस्त विरोध किया गया। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने इस पर रोक लगा दी। अभी तक अदालत की रोक कायम है। हालांकि इस वजह से भाजपा को सामान्य वर्ग की नाराजगी झेलनी पड़ी है।

यूजीसी के दिशानिर्देश के खिलाफ दायर याचिका पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। यूजीसी ने सर्वोच्च अदालत को बताया कि वो नए नियमों पर फिर से विचार कर रहा है। साथ ही यूजीसी ने कहा इसके लिए उसे और समय चाहिए। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी से इस बारे में विस्तृत हलफनामा मांगा। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की पीठ ने यूजीसी से चार हफ्ते में हलफनामा दायर करने को कहा है। कोर्ट ने कहा कि यूजीसी इस हलफनामे को पक्षकारों को भी दे।

गुरुवार को सुनवाई के दौरान यूजीसी की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यूजीसी नए नियमों पर पुनर्विचार कर रहा है। इसके लिए कुछ और समय चाहिए। पिछली सुनवाई मे सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नियमों पर अंतरिम रोक लगाते हुए केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किया था। इस नियम को 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया गया था। इसके खिलाफ दायर याचिका में आरोप लगाया है कि इस नियम का 3(सी) मनमाना और भेदभावपूर्ण है और इससे कुछ वर्गों को उच्च शिक्षा से बाहर किया जा सकता है।

याचिका में कहा गया है कि यूजीसी के नियम का यह प्रावधान संविधान में दिए गए समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। याचिका में यह भी कहा गया है कि यह नियम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 के खिलाफ है और उच्च शिक्षा में समान अवसर देने के उद्देश्य को नुकसान पहुंचाता है।

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