लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अधिकारियों को लेकर बहुत सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि यूपी सरकार के अधिकारी इसी तरह से बेलगाम और तानाशाही के रवैए से काम करते रहे तो उत्तर प्रदेश ‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ यानी ऐसी जगह में बदल जाएगा, जहां सरकार का पूरा नियंत्रण हो और लोगों को आजादी नहीं हासिल हो। अदालत ने कहा कि तानाशाह अधिकारी प्रदेश को भयावह राज में बदल देंगे।
अदालत ने यह टिप्पणी पूरी अफसरशाही को लेकर की लेकिन साथ ही नोएडा की कलेक्टर मेधा रूपम और कुछ अन्य अधिकारियों पर भी टिप्पणी की। हाई कोर्ट ने पिछले हफ़्ते दिल्ली यूनिवर्सिटी की कानून की छात्रा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी रासुका के तहत हुई गिरफ्तारी और उनकी हिरासत रद्द करते हुए नोएडा की कलेक्टर की ओर से हिरासत का आदेश जारी करने के तरीके की कड़ी आलोचना की।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने कहा कि रासुका के तहत आकृति चौधरी को हिरासत में रखने से अनुच्छेद 21 के तहत उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, क्योंकि हिरासत का आदेश और उसके आधार ठोस सबूतों पर आधारित नहीं थे और उन्हें बिना सोचे समझे जारी किया गया। कोर्ट ने चौधरी को पांच लाख रुपए का मुआवज़ा देने का भी आदेश दिया और कहा कि यह रकम गौतम बुद्ध नगर की कलेक्टर मेधा रूपम और इसके लिए ज़िम्मेदार अन्य अधिकारियों की सैलरी से वसूली जाए।
अपने 15 पेज के आदेश में बेंच ने अफ़सरशाही और पुलिस की भूमिका पर कई अहम टिप्पणियां की हैं। कोर्ट ने कहा है कि अधिकारियों को बहुत ज़्यादा अधिकार दिए जाते हैं, क्योंकि उन पर नागरिकों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों, गरिमा, सम्मान और कल्याण की रक्षा करने की ज़िम्मेदारी होती है। हालांकि, कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि उन्हें यह याद रखना चाहिए कि उनकी ‘निष्ठा वफ़ादारी संविधान के प्रति है, न कि सरकार के प्रति’। कोर्ट ने यह भी कहा कि अधिकारी जनता की सेवा करने वाले सेवक होते हैं, और ‘लोकतंत्र में जनता ही मालिक होती है’।
