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एक साथ चुनाव कैसे होगा?

Jahanabad, Nov 11 (ANI): Women voters wait in a queue to cast their vote for the second phase of the Bihar assembly election, in Jahanabad on Tuesday. (ANI Photo)

अचानक ‘एक देश, एक चुनाव’ की चर्चा तेज हो गई है। संसद की संयुक्त समिति यानी जेपीसी के अध्यक्ष पीपी चौधरी अचानक सक्रिय हो गए हैं और कहा जाने लगा है कि 2029 में ही पूरे देश के चुनाव एक साथ हो सकते हैं। मीडिया में इस पर बहसें होने लगी हैं। अचानक आई इस तेजी से दो सवाल उठते हैं। पहला तो यह कि सरकार अभी तक परिसीमन और महिला आरक्षण के प्रयास में लगी है तो फिर ‘एक देश, एक चुनाव’ की चर्चा क्यों शुरू हुई और दूसरा सवाल यह कि अगर महिला आरक्षण कानून को सरकार संशोधित नहीं करा पा रही है तो पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने के लिए लाए गए संविधान के 129वें संशोधन विधेयक को कैसे पास कराएगी? ध्यान रहे जिस तरह नारी शक्ति वंदन कानून में बदलाव के लिए लाए गए 131वें संशोधन विधेयक को पास कराने के लिए दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत की जरुरत है वैसे ही 129वें संशोधन के लिए भी दो तिहाई बहुमत चाहिए, जो सरकार के पास नहीं है।

अगर सरकार 129वें संशोधन को पास नहीं करा पाती है तो 2029 में ‘एक देश, एक चुनाव’ संभव नहीं है। इसके बावजूद अगर भाजपा चाहे तो बहुत से राज्यों के चुनाव लोकसभा के साथ करा सकती है। इसके लिए उसे अपने शासन वाले राज्यों की सरकारों से संबंधित राज्य की विधानसभा को समय से पहले भंग कराना होगा। अगर भाजपा ऐसा करती है तो कांग्रेस या दूसरी पार्टियों के शासन वाले राज्यों पर भी दबाव बनेगा कि वे इस अभियान में शामिल हों। इसके लिए भाजपा को अगले साल होने वाले चुनावों से ही तैयारी शुरू करानी होगी। हालांकि यह तय माना जा रहा है कि विपक्षी पार्टियां एक साथ चुनाव के लिए तैयार नहीं होंगी। कांग्रेस के पी चिदंबरम ने केंद्र सरकार के इस प्रयास को असंवैधानिक बताया है तो जेपीसी में शामिल तृणमूल कांग्रेस की सागरिका घोष ने भी इसका विरोध किया है। दोनों ने समिति के सामने अपनी पार्टी की राय स्पष्ट रूप से रख दी है।

इसलिए केंद्र सरकार और भाजपा के पास यह रास्ता बचता है कि वह अपने शासन वाले राज्यों की विधानसभा समय से पहले भंग कराए और एक साथ चुनाव करा कर एक मिसाल बनाए। वैसे लोकसभा के साथ चार राज्यों के चुनाव स्वतः होते हैं। आंध्र प्रदेश, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के चुनाव लोकसभा के साथ में होते हैं। इनके अलावा तीन अन्य राज्यों के चुनाव उसी साल के अंत में होते हैं। इनमें से दो राज्यों महाराष्ट्र और हरियाणा में भाजपा की सरकार है, जबकि झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा की सरकार है। चुनाव आयोग चाहे तो इन तीनों राज्यों का चुनाव मई में लोकसभा के साथ करा सकता है। इस तरह लोकसभा और सात राज्यों में एक साथ चुनाव कराए जा सकते हैं।

अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने के आइडिया को लेकर गंभीर हुए, अभी तक वह गंभीरता नहीं दिखी है, तो 2030 और 2031 में जिन भाजपा शासित राज्यों में चुनाव होने हैं, वहां की विधानसभा भंग करा सकते हैं। 2030 में दो राज्यों दिल्ली और बिहार का चुनाव है, जहां भाजपा की सरकार है। 2031 में पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के चुनाव होंगे। इनमें से तीन राज्यों में भाजपा की सरकार है। अगर भाजपा चाहे तो तीनों राज्यों में समय से पहले चुनाव करा सकती है। अगर 2030 और 2031 के पांच राज्यों के चुनाव समय से पहले होते हैं तो लोकसभा के साथ 12 राज्यों के चुनाव हो सकते हैं।

अगले साल यानी 2027 में सात राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। इनमें पंजाब और हिमाचल छोड़ कर बाकी पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर और गुजरात में भाजपा की सरकार है। उसके अगले साल यानी 2028 में पांच बड़े राज्यों के चुनाव हैं, जिनमें कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस सत्ता में है, जबकि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है। इनके अलावा पूर्वोत्तर के चार राज्यों मेघालय, त्रिपुरा, नगालैंड और मिजोरम के चुनाव भी 2028 में हैं। 2027 के चुनावों को तो 2029 तक स्थगित नहीं किया जा सकता है। लेकिन क्या 2028 के चुनावों के 2029 के लिए स्थगित किया जा सकता है? विधानसभाओं का कार्यकाल बढ़ाने के लिए कानून बनाने की जरुरत होगी, जो संभव नहीं दिख रहा है। दूसरा रास्ता राष्ट्रपति शासन लगाने का है। लेकिन यह काम विपक्षी पार्टियों की सहमति के बगैर संभव नहीं है। कांग्रेस इस बात के लिए तैयार नहीं होगी कि कम से कम उसके शासन वाले राज्यों में राष्ट्रपति शासन में चुनाव हो। भाजपा शासित राज्यों में भी राष्ट्रपति शासन लगा कर चुनाव टालना एक संवैधानिक मामला बनेगा, जिसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है। लेकिन अगर राजनीतिक सहमति बने तो 2028 के नौ चुनाव भी 2029 में कराए जा सकते हैं। इस तरह लोकसभा और कम से कम 21 राज्यों के चुनाव एक साथ हो जाएंगे।

परंतु यह पूरा हिसाब किताब दूर की कौड़ी लग रहा है। संसद से कानून बनाए बगैर और संविधान के प्रावधानों को बदले बगैर ‘एक देश, एक चुनाव’ मुमकिन नहीं दिख रहा है। अगर सरकार दो तिहाई बहुमत जुटा लेती है या विपक्ष को तैयार कर लेती है तभी कानून पास होगा और तब 2028 के चुनाव टाल कर और 2032 तक के चुनाव पहले करा कर 2029 में एक साथ सारे चुनाव कराए जा सकते हैं। अन्यथा इसे 2034 के लिए छोड़ना पड़ेगा। हालांकि इस पूरी कवायद का कोई खास अर्थ नहीं है और न इसकी कोई जरुरत है। न तो एक साथ चुनाव कराने से कोई बहुत ज्यादा पैसे की बचत होनी है और न बार बार चुनाव होने से कोई कामकाज प्रभावित होता है। पैसे की बचत और कामकाज प्रभावित होने का तर्क पूरी तरह से बेकार है। उलटे हर साल कहीं न कहीं चुनाव होने से सरकारें जवाबदेह बनती हैं। अमेरिका में हर साल चुनाव होते हैं और इस वजह से सरकारें जनता के प्रति ज्यादा जवाबदेह रहती हैं।

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