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संसद कोर्ट निर्णय नहीं पलट सकती: सुप्रीम कोर्ट

New Delhi, May 22 (ANI): A view of the Supreme Court of India, in New Delhi on Thursday. (ANI Photo/Rahul Singh)

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बड़ा झटका देते हुए बुधवार को न्यायाधिकरणों के सदस्यों और पीठासीन अधिकारियों की नियुक्ति, कार्यकाल और सेवा शर्तों से संबंधित न्यायाधिकरण सुधार अधिनियम, 2021 के प्रमुख प्रावधान रद्द कर दिए। अदालत ने स्पष्ट टिप्पणी की कि “संसद मामूली बदलावों के साथ इन्हें फिर से लागू करके न्यायिक फैसले को दरकिनार नहीं कर सकती।”

शीर्ष अदालत ने उन प्रावधानों को अध्यादेश के रूप में लाने और बाद में लगभग समान रूप में कानून बनाकर पेश करने के लिए केंद्र पर तीखी टिप्पणी की। प्रधान न्यायाधीश बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 137 पृष्ठ के अपने फैसले में कहा, “न्यायाधिकरणों से जुड़े जिन मुद्दों पर यह अदालत पहले ही कई निर्णयों के माध्यम से दिशा-निर्देश दे चुकी है, उन्हें बार-बार अस्वीकार करने के भारत सरकार के रवैये से हम असहमति जताते हैं।”

पीठ ने कहा, “यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है कि न्यायाधिकरणों की स्वतंत्रता और कामकाज को लेकर इस न्यायालय द्वारा तय स्पष्ट सिद्धांतों को लागू करने के बजाय विधायिका ने ऐसे प्रावधान फिर से पेश किए, जिनके कारण अलग-अलग कानूनों और नियमों के जरिये वही संवैधानिक वाद-विवाद दोबारा खड़े हो गए हैं।”

पीठ ने कहा कि विवादित प्रावधान शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं और इन्हें वापस नहीं लाया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि लंबित मामलों से निपटने की जिम्मेदारी केवल न्यायपालिका पर नहीं है, बल्कि सरकार के अन्य अंगों को भी समान रूप से यह जिम्मेदारी निभानी होगी। पीठ ने यह भी कहा कि संसद ने पहले से रद्द किए गए प्रावधानों को पुनः लागू करके बाध्यकारी न्यायिक मिसालों की “विधायी अवहेलना” करने की कोशिश की है।

प्रधान न्यायाधीश ने फैसले में कहा, “हमने अध्यादेश और 2021 के अधिनियम के प्रावधानों की तुलना की है और यह स्पष्ट है कि पहले ही खारिज किए जा चुके सभी प्रावधानों को मामूली बदलावों के साथ दोबारा लागू किया गया है।”

उन्होंने कहा, “इस प्रकार हमारा मत है कि 2021 अधिनियम के प्रावधान बरकरार नहीं रखे जा सकते, क्योंकि वे शक्तियों के पृथक्करण और न्यायिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करते हैं। इनमें किसी वास्तविक खामी को दूर नहीं किया गया और बाध्यकारी निर्णय के विपरीत जाकर यह विधायी अतिक्रमण के समान है। यह संविधान के अनुरूप नहीं है, इसलिए इसे असंवैधानिक घोषित कर रद्द किया जाता है।”

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