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सोनिया वोटर केस फिर खुला

New Delhi, Apr 28 (ANI): Congress Parliamentary Party Chairperson Sonia Gandhi, during a meeting with a delegation from Progressive International, at 10 Janpath in New Delhi on Monday. (ANI Photo)

नई दिल्ली। दिल्ली की एक अदालत ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी का नाम भारतीय नागरिकता हासिल करने से तीन साल पहले मतदाता सूची में कथित रूप से शामिल किए जाने के आरोप की जांच से इनकार करने वाले मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश को सोमवार को रद्द कर दिया। मामले को नए सिरे से विचार के लिए वापस भेजा गया है और अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी।

विशेष न्यायाधीश विशाल गोगने अधिवक्ता विकास त्रिपाठी की ओर से मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश के खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। त्रिपाठी राउज एवेन्यू अदालतों की सेंट्रल दिल्ली कोर्ट बार एसोसिएशन के उपाध्यक्ष हैं। आदेश के महत्वपूर्ण हिस्सों को मौखिक रूप से पढ़ते हुए न्यायाधीश ने कहा, “अदालत के आदेश में कानून के प्रति निष्ठा होनी चाहिए, न कि तथ्यों के साथ खिलवाड़।” उन्होंने कहा कि इस कसौटी पर अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) के आदेश में खामियां हैं।

अदालत ने मजिस्ट्रेट के आदेश को पर्याप्त कारण नहीं बताने वाला आदेश माना और मामले पर नए सिरे से विचार करने को कहा। त्रिपाठी की शिकायत में आरोप है कि सोनिया गांधी का नाम 1980 में नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र की मतदाता सूची में कथित रूप से अवैध तरीके से दर्ज किया गया था, जबकि उन्होंने भारतीय नागरिकता 1983 में हासिल की थी।

शिकायत के मुताबिक उनका नाम 1982 में मतदाता सूची से हटा दिया गया था, लेकिन 1983 में फिर शामिल किया गया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि यह दोबारा नाम शामिल किया जाना भी 30 अप्रैल, 1983 को उनके भारतीय नागरिक बनने से पहले हुआ था।

मजिस्ट्रेट अदालत ने शिकायत को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि यह बिना पर्याप्त सबूत के दावों पर आधारित है, इसमें धोखाधड़ी और जालसाजी की जरूरी जानकारी नहीं है और शिकायत 1980 की कथित मतदाता सूची की अप्रमाणित प्रति पर आधारित है।

विशेष न्यायाधीश ने कहा कि संसदीय लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक के लिए मतदाता सूची की पवित्रता अटूट विश्वास का विषय है। देश का सबसे ताकतवर व्यक्ति भी एक मतदाता या नागरिक के तौर पर कम प्रभावशाली लोगों के बराबर ही होता है।

अदालत ने कहा कि मतदाता सूची में हेरफेर, किसी मतदाता का नाम धोखाधड़ी से शामिल करने, किसी गैर-नागरिक का नाम दर्ज करने और झूठे घोषणापत्र या दस्तावेजों के संभावित इस्तेमाल जैसे आरोपों पर कारणों सहित यह तय किया जाना चाहिए कि क्या धोखाधड़ी या जालसाजी से संबंधित अपराध का मामला बनता है।

न्यायाधीश ने कहा कि एसीजेएम के आदेश में इस बात पर विचार नहीं किया गया कि सोनिया गांधी का नाम 1980 में मतदाता सूची में कैसे शामिल हुआ, 1982 में कैसे हटा और 1983 में फिर कैसे दर्ज हुआ।

अदालत के मुताबिक यह जांचने के बजाय कि आरोपों से कोई संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं, शिकायत को जरूरी जानकारी की कमी वाला बताकर खारिज कर दिया गया। मतदाता सूची के हिस्से को भी “1980 की कथित अप्रमाणित मतदाता सूची के हिस्से की फोटो कॉपी की फोटो कॉपी” कहकर खारिज कर दिया गया।

अदालत ने मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द करते हुए मामले पर नए सिरे से विचार करने को कहा है। अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी। यह आदेश शिकायत में लगाए गए आरोपों को सिद्ध नहीं करता, बल्कि उनके नए सिरे से कानूनी परीक्षण का रास्ता खोलता है।

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