नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मुश्किल बढ़ रही है। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइंया की टिप्पणी के एक दिन बाद सर्वोच्च अदालत ने आयोग के कामकाज को लेकर बड़ी टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोई अंतरिम आदेश तो पास नहीं किया लेकिन कहा कि अगर चुनाव आयोग ने कानून तोड़ा है तो उसके फैसलों को वापस लिया जा सकता है।
इतना ही अदालत ने यह भी कहा कि पहली बार के मतदाताओं के नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म छह में बदलाव की मंजूरी सुप्रीम कोर्ट ने नहीं दी है। गौरतलब है कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपनी एक खोजी रिपोर्ट में दावा किया था कि फॉर्म छह में तीन घोषणाएं जोड़ी गई हैं। बाद में तीनों चुनाव आयुक्तों की बैठक हुई, जिसके बाद एक साझा बयान जारी किया गया और उसमें दावा किया गया कि फॉर्म छह के बदलाव को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी है।
अब अदालत ने कहा है कि उसने ऐसे किसी बदलाव की मंजूरी नहीं दी है। अगर सुप्रीम कोर्ट का नाम लेकर गलतबयानी करने की बात प्रमाणित होती है तो आयोग की मुश्किल बढ़ेगी। वैसे सोमवार को हुई सुनवाई में भी सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा है वह चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के लिए बहुत डैमेजिंग है। गौरतलब है कि मुख्य चुनाव आयुक्त पर एसआईआर से जुड़े 14 फैसले दो अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लेने का आरोप है।
उनको हटाने के लिए दायर याचिका पर अदालत ने उन्हें निलंबित करने का अंतरिम आदेश देने से इनकार किया, लेकिन चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। कोर्ट ने कहा कि अगर फैसले बिना सहमति के लिए पाए गए, तो उन्हें वापस लिया जा सकता है। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी कहा कि फॉर्म छह में किसी संशोधन को सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी नहीं दी है। गौरतलब है कि नौ दिन पहले चुनाव आयोग ने कहा था कि एसआईआर के लिए फॉर्म छह के साथ लगाए गए घोषणा को सुप्रीम कोर्ट से मंजूरी मिली है।
बहरहाल, जिन याचिकाओं पर सोमवार को सुनवाई हुई उनमें से एक राकेश कुमार सिंह ने दाखिल की है। उनकी ओर से वरिष्ठ वकील विकास सिंह ने दलीलें रखीं। दूसरी याचिका शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने लगाई। उनकी ओर से सीनियर एडवोकेट मेनका गुरुस्वामी पेश हुईं। इन पर सुनवाई में चीफ जस्टिस की बेंच ने कहा कि कोई खबर सौ फीसदी सही, आंशिक रूप से सही या गलत हो सकती है। इसलिए सिर्फ मीडिया रिपोर्ट के आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने का अंतरिम आदेश नहीं दिया जा सकता। पहले चुनाव आयोग का जवाब और रिकॉर्ड देखना होगा।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग के फैसले सर्वसम्मति या बहुमत से लिए जाने चाहिए। यानी तीन सदस्यीय आयोग में किसी एक सदस्य का अकेले फैसला पूरे आयोग का फैसला नहीं माना जा सकता। इसके आगे उन्होंने कहा कि पहले रिकॉर्ड देखना होगा। सिर्फ आरोप के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि सभी फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ने अकेले लिए थे। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि अगर रिकॉर्ड से पता चलता है कि कोई फैसला जरूरी प्रक्रिया के बिना लिया गया था, तो उस पर रोक लगाने पर विचार किया जा सकता है।
