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गर्भपात पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने 28 हफ्ते की गर्भवती युवती को गर्भपात की अनुमति दे दी है। गर्भवती युवती रेप पीड़ित है और उसने गुजरात हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट ने रेप पीड़िता को 28 हफ्ते का गर्भ गिराने की अनुमति दे दी हे और साथ ही कहा है कि अगर भ्रूण में जान होगी तो अस्पताल उसे जीवित रखने के लिए सारी सुविधाएं देनी होंगी। इस क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात हाई कोर्ट पर तीखी टिप्पणी भी की।

रेप पीड़िता गुजरात की है, जिसने पहले हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हाई कोर्ट ने बिना कारण बताए 17 अगस्त को उसकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद पीड़िता 19 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट पहुंची। उसी दिन गुजरात हाई कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए एक आदेश जारी किया, जिसमें लिखा कि उन्होंने पीड़ित पक्ष की याचिका खारिज करते हुए उनसे पूछा था कि क्या वह बच्चे को जन्म देकर उसे स्टेट को सौंपना चाहती हैं।

गुजरात हाई कोर्ट का यह आदेश देख कर सुप्रीम कोर्ट की जज जस्टिस बीवी नागरत्ना काफी नाराज हुईं। उन्होंने कहा- सुप्रीम कोर्ट के किसी आदेश के जवाब में हाई कोर्ट से कुछ ऑर्डर आता है, इसे हम सही नहीं मानते। गुजरात हाई कोर्ट में यह क्या हो रहा है? सोमवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा- भारतीय समाज में शादी के बाद प्रेग्नेंट होना विवाहित जोड़े और उनके परिवार के लिए खुशियां लाता है, लेकिन इसके उलट बिना शादी की प्रेग्नेंसी काफी पीड़ादायक होती है। खासतौर से जब बलात्कार के मामलों में ऐसा होता है तो यह विक्टिम के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालता है।

सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा- एक महिला का दुष्कर्म होना, अपने आप में कष्टदायक है। इसके बाद अगर वह गर्भवती हो जाए तो यह पुराने घावों की याद दिलाता रहता है। ऐसे में हम मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, विक्टिम को अबॉर्शन की इजाजत देते हैं। कोर्ट पीड़ित को मंगलवार को अस्पताल जाने की निर्देश देती है, ताकि अबॉर्शन की प्रक्रिया को पूरा किया जा सके। सर्वोच्च अदालत ने ने अपने फैसले में यह भी कहा कि अबॉर्शन के बाद यदि भ्रूण जीवित पाया जाता है तो अस्पताल को भ्रूण के जीवित रहने को सुनिश्चित करने के लिए सभी सुविधाएं देनी होंगी। बच्चे को कानून के अनुसार गोद देने के लिए सरकार कानून के मुताबिक कदम उठाए।

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