Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

बांकीपुर की बात दूर तक जाएगी

भारत में कई उपचुनाव ऐसे हुए हैं, जिनसे देश और राज्यों की राजनीति बदली है। 1974 का जबलपुर लोकसभा सीट का उपचुनाव मिसाल है। सिर्फ 25 साल के शरद यादव ने कांग्रेस के जगदीश नारायण अवस्थी को हराया था। यह सीट कांग्रेस के दिग्गज सेठ गोविंद दास के निधन से खाली हुई थी। जबलपुर उपचुनाव में कांग्रेस की हार ने आगे के राजनीतिक घटनाक्रम को प्रभावित किया, जिसकी अंत परिणति देश में इमरजेंसी और उसके बाद हुए चुनाव में इंदिरा गांधी की विदाई के रूप में हुई। आजादी के बाद पहली बार देश में गैर कांग्रेसी सरकार बनी थी।

अगर राज्यों के संदर्भ में देखें तो बिहार की वैशाली सीट पर 1994 का उपचुनाव भी इसी तरह का चुनाव था। लालू प्रसाद ने पूर्व मुख्यमंत्री सतेंद्र नारायण सिन्हा की पत्नी किशोरी सिन्हा को चुनाव में उतारा था और कांग्रेस की ओर से पूर्व केंद्रीय मंत्री कृष्णा शाही की बहन उषा सिंह चुनाव लड़ रही थीं। इस हाई प्रोफाइल चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार लवली आनंद ने दोनों को हरा दिया था। इस चुनाव ने आगे के राजनीतिक घटनाक्रम को बहुत प्रभावित किया। जून 1994 में हुए इस चुनाव के बाद ही अक्टूबर में समता पार्टी का गठन हुआ था। जॉर्ज फर्नांडीज, शरद यादव और नीतीश कुमार को इसी चुनाव से अंदाजा हुआ था कि लालू प्रसाद को हराया जा सकता है। उनका वोट भी टूट सकता है। हालांकि लालू प्रसाद को हराने में समय लगा परंतु समता पार्टी बनाने वाले नेता ही अंत में कामयाब हुए थे।

बांकीपुर विधानसभा सीट का चुनाव भी इसी तरह बिहार की राजनीति को लंबे समय में प्रभावित करने वाला साबित होगा। यहां से पारंपरिक पक्ष व विपक्ष के बरक्स एक तीसरी ताकत के उभरने का रास्ता बन रहा है। इस चुनाव ने बिहार के राजनीतिक व्याकरण को पूरी तरह से बदल दिया है। इसने प्रशांत किशोर के इस विश्वास पर मुहर लगाई है कि अगर लगातार एक बात कही जाए और जमीन पर रह कर लोगों को उनका भला बुरा समझाया जाए तो वे जाति के बंधन से बाहर निकल सकते हैं। उनका यह विश्वास भी प्रमाणित हुआ है कि जब तक भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का वोट नहीं टूटेगा तब तक भाजपा को नहीं हराया जा सकेगा। अभी तक भाजपा का हराने का प्रयास भाजपा विरोधी वोट से हो रहा था। खुद प्रशांत किशोर भी एक समय यह कहते थे कि देश में 40 फीसदी वोट ही भाजपा को मिलता है और देश का 50 फीसदी हिंदू ही भाजपा को वोट देता है। यानी कुल 60 फीसदी और हिंदू का 50 फीसदी भाजपा के खिलाफ जाता है। इसी आधार पर वे भाजपा विरोधी व्यापक गठबंधन की बात हमेशा कहते थे। लेकिन बिहार की बांकीपुर सीट पर लड़ते हुए उनको समझ में आय़ा कि भाजपा का वोट तोड़ कर ही भाजपा को हराया जा सकता है।

इस काम में प्रशांत किशोर कामयाब रहे। उन्होंने भाजपा को उस सीट पर हरा दिया, जिस सीट पर वह 31 साल से जीत रही थी। उन्होंने भाजपा को उस सीट पर हरा दिया, जो शहरी सीट है और जिस सीट पर एनडीए के सामाजिक समीकरण का तीन लाख यानी लगभग 80 फीसदी वोट है। इसका अर्थ है कि एनडीए का सामाजिक समीकरण भी टूट सकता है, भाजपा के सबसे कट्टर समर्थक भी भाजपा के खिलाफ वोट कर सकते हैं और पारंपरिक समीकरणों से पार जाकर भाजपा को हराया जा सकता है। बांकीपुर सीट पर प्रशांत किशोर की जीत से यह मिथक भी टूटा है कि बिहार जाति के दायरे से बाहर नहीं निकलेगा। तभी इस सीट के नतीजे का असर दूरगामी होगा। यह बिहार की राजनीति को और कालांतर में देश की राजनीति को भी प्रभावित करेगा।

बांकीपुर उपचुनाव के नतीजों का आकलन कई तरह से किया जा रहा है। ज्यादातर लोग इसे स्थानीय परिघटना मान रहे हैं और इससे किसी बड़े बदलाव की संभावना नहीं देख रहे हैं। निश्चित रूप से जीत हार में स्थानीय और तात्कालिक कारणों ने भूमिका निभाई है। पेपर लीक और परीक्षा में गड़बड़ियों के खिलाफ हुए आंदोलन से लेकर इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल और यूजीसी के दिशा निर्देशों जैसे कारण थे, जिनसे लोग नाराज थे। भरत तिवारी के फर्जी इनकाउंटर और जहानाबाद की युवती के कथित यौन शोषण और हत्या से भी समाज के एक बड़े हिस्से में नाराजगी थी। किसी को भी चुनाव लड़ा कर चुनाव जीत जाने के भाजपा के अहंकार से भी लोग चिढ़े थे। इन सबका मिलाजुला असर बांकीपुर के नतीजे में दिखा है। लेकिन इस नतीजे को सिर्फ इन पैमानों पर देखेंगे तो गलती होगी। इसके दूरगामी राजनीतिक असर को भी देखने की जरुरत है।

अगर बिहार के संदर्भ में देखें तो यह साफ दिख रहा है कि भाजपा से नाराज लोगों या पारंपरिक रूप से भाजपा विरोधी मतदाताओं को एक विकल्प मिल गया है। कैम्पस में समानता के नाम पर लाए गए यूजीसी के दिशा निर्देश, भरत तिवारी के फर्जी इनकाउंटर और जहानाबाद की युवती के मामले से सवर्ण भाजपा से नाराज हैं। जब बांकीपुर में मुस्लिम मतदाताओं को लगा कि गैर कायस्थ सवर्ण प्रशांत किशोर के साथ खड़े हो रहे हैं तो तुरंत मुस्लिम उनके पीछे आ गए। ध्यान रहे मुस्लिम पिछले नौ चुनावों से भाजपा को हराने के लिए राजद और कांग्रेस को वोट दे रहे हैं। लेकिन कामयाबी नहीं मिली। इसलिए भी उन्होंने प्रशांत किशोर का साथ दिया। गैर कायस्थ सवर्ण और मुस्लिम सपोर्ट से प्रशांत किशोर मजबूत उम्मीदवार बन गए और राजद उम्मीदवार तीसरे स्थान पर चली गई।

यह परिघटना पूरे बिहार में दोहराई जा सकती है। 18 फीसदी मुसलमानों को अगर समझ में आता है कि उनके सौ फीसदी समर्थन के बावजूद राजद किसी हाल में भाजपा को नहीं हरा पाएगी तो वह राजद का साथ छोड़ कर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का समर्थन करेंगे। इसमें और भी वोट जुड़ सकते हैं लेकिन सवर्ण, मुस्लिम और कुछ दलित वोट के साथ प्रशांत किशोर बिहार में मुख्य विपक्ष की जगह ले सकते हैं। इसके बाद यादव वोट बिखरना वक्त की बात होगी। इस चुनाव में भी यादव वोट तीन तरफ बंटा। यह परिघटना राष्ट्रीय स्तर पर भी दोहराई जा सकती है।

बांकीपुर का एक संदेश यह भी है कि लोग भाजपा और उसकी सरकार से नाराज हैं तो वे कांग्रेस और विपक्ष से भी बहुत खुश नहीं हैं। तभी उन्होंने तीसरा विकल्प चुना। कुछ दिन पहले ही डीएमके और अन्नाडीएमके दोनों से उबे हुए तमिलनाडु के लोगों ने तीसरे विकल्प के तौर पर सी जोसेफ विजय को मुख्यमंत्री बनाया। उससे पहले दिल्ली में लोगों ने कांग्रेस और भाजपा की दो ध्रुवीय राजनीति को खारिज करके अरविंद केजरीवाल को चुना था। आने वाले दिनों में यह प्रक्रिया तेज हो सकती है। प्रशांत किशोर उसमें उत्प्रेरक का काम कर सकते हैं। ऐसा मानने का कारण यह है कि देश भर के नौजवान इस समय गुस्से में हैं। ‘जेन जी’ का दिल्ली का प्रदर्शन उसी गुस्से का प्रकटीकरण था। अभी झारखंड में बिल्कुल जंतर मंतर की तर्ज पर छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं।

अगले चुनाव तक मतदान करने वाले ‘जेन जी’ मतदाताओं की संख्या 40 करोड़ के करीब होगी। ये भाजपा से नाराज हैं तो विपक्ष से भी खुश नहीं हैं। तभी हर राज्य में और राष्ट्रीय स्तर पर भी एक तीसरा विकल्प खड़ा हो सकता है। अभी उसकी तस्वीर बहुत स्पष्ट नहीं है। लेकिन आने वाले दिनों में धीरे धीरे स्पष्टता आएगी। बिहार में प्रशांत किशोर, तमिलनाडु में विजय, उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर, महाराष्ट्र में अभिजीत दिपके, उत्तराखंड में बॉबी पवार, पंजाब में अमृतपाल सिंह व सरबजीत खालसा, जम्मू कश्मीर में इंजीनियर राशिद जैसे नए चेहरे उभरे हैं, जो पारंपरिक पक्ष व विपक्ष से अलग ‘जेन जी’ और अन्य की पसंद बन सकते हैं। बांकीपुर के साथ दतिया में भी उपचुनाव हुआ था, जहां कांग्रेस मजबूत है तो वह जीत गई लेकिन चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार को 22 हजार से ज्यादा वोट आए। यह तीसरे विकल्प के तलाश की बेचैनी दिखाता है।

Exit mobile version