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ब्रिक्स सम्मेलन भारत के लिए अहम

मूल रूप से पांच देशों और अब 11 देशों के संगठन ब्रिक्स के अध्यक्ष के नाते भारत इस बार के लीडरशिप समिट की मेजबानी कर रहा है। करीब तीन साल पहले भारत ने जी-20 बैठक की भी मेजबानी की थी। उसके लिए भी इतना भव्य आयोजन हुआ था कि पूरी दुनिया देखती रह गई थी। ब्रिक्स का आयोजन भी उतनी ही भव्यता से हो रहा है। 11 से 13 सितंबर के बीच पूरी दिल्ली बंद कर दी गई है। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट भी बंद हो गया है।

सारे स्कूल, कॉलेज और सरकारी कार्यालय शुक्रवार, 11 सितंबर को बंद कर दिए गए हैं। तभी जो ब्रिक्स के बारे में नहीं जानता है वह भी सब कुछ बंद होने से यह जान गया है कि दिल्ली में कुछ बहुत बड़ा हो रहा है और यह बड़ा काम प्रधानमंत्री मोदी करा रहे हैं। राजनीति में ऐसे मैसेज बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। नरेंद्र मोदी बार बार ऐसे मैसेज कराते हैं, जिससे देश के लोग समझें कि उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद से भारत कितना बड़ा हो गया है।

इस लोकप्रिय धारणा या इसके निर्माण के लिए होने वाले प्रयासों को छोड़ दें तो बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत ब्रिक्स की इस बैठक में कोई छाप छोड़ पाएगा? इसमें कोई ऐसा फैसला होगा, जिससे भारत की वैश्विक छवि को लाभ मिलेगा? कोई ऐसा समझौता होगा, जिससे भारत को व्यापार, उद्यम और रोजगार में लाभ होगा? क्या भारत किसी तरह से रूस पर दबाव बना कर यूक्रेन युद्ध खत्म करा पाएगा? इन सब सवालों के जवाब 13 सितंबर को जारी होने वाले साझा बयान में मिलेगा। लेकिन उससे पहले संदेह इसलिए पैदा हो रहा है क्योंकि इसी साल मई में भारत में ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक हुई थी, जिसमें साझा बयान नहीं जारी हो पाया था। भारत ने मेजबान के नाते अध्यक्षीय बयान जारी किया था, जिसमें सदस्य देशों की असहमतियों का भी जिक्र था।

असल में ईरान चाहता था कि उस पर अमेरिका और इजराइल के हमले की आलोचना हो, जिसके लिए संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब तैयार नहीं थे।

सो, सबसे पहले तो यह समझने की जरुरत है कि ब्रिक्स बुनियादी रूप से चीन का एक बनाया फोरम है, जिसमें चीन की ताकत सबसे ज्यादा है। वह कई काम अपने हिसाब से कराना चाहता है। ब्रिक्स के बहाने ही चीन ने डी डॉलराइजेशन यानी अंतरराष्ट्रीय विनिमय की स्वीकार्य मुद्रा के तौर पर डॉलर के वर्चस्व को समाप्त करने के अभियान की हवा बनाई है। भारत में भी इसे ऐसे प्रस्तुत किया जा रहा है कि जैसे डॉलर की व्यवस्था समाप्त होगी तो भारत को बहुत फायदा होगा। ऐसा कुछ नहीं होने वाला है।

डॉलर की व्यवस्था समाप्त होकर रुपए की व्यवस्था बने तभी भारत को फायदा होगा अन्यथा डॉलर से निकल कर युआन का वर्चस्व बनवाने में भारत की कोई दिलचस्पी नहीं होनी चाहिए। भारत भी इस बात को समझ रहा है। इसलिए व्यापारिक लेन देने के लिए होने वाले ट्रांजेक्शन की इंटरलिंकिंग पर भारत का ज्यादा ध्यान है। ब्रिक्स देशों के बीच भारत अगर इस पर सहमति बनाता है कि सबका आपसी कारोबार बढ़े और भुगतान अपनी मुद्रा में हो तो यह बड़ी उपलब्धि होगी। इसके लिए डिजिटल ट्रांजेक्शन की नई व्यवस्था बनानी होगी।

इसके अलावा अध्यक्ष के नाते भारत की एक बड़ी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करने की होगी कि सदस्य देशों के आपसी झगड़े का सम्मेलन की साझा गतिविधियों पर असर न पड़े। ध्यान रहे भारत पहले से ब्रिक्स को सिर्फ पांच देशों का समूह बनाए रखने के पक्ष में था। लेकिन भारत के रिजर्वेशन की अनदेखी करके चीन ने सऊदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, मिस्र, इथियोपिया और इंडोनेशिया को सदस्य बनवाया। अब स्थिति यह है कि ईरान इस समय सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से लड़ रहा है तो सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात आपस में यमन के मुद्दे पर लड़ रहे हैं। इनकी लड़ाई का असर ब्रिक्स पर नहीं पड़ना चाहिए। अगर ऐसा हुआ तो ब्रिक्स का हस्र भी सार्क जैसा हो सकता है।

इसी तरह की एक जिम्मेदारी रूस और यूक्रेन के युद्ध को लेकर भी बनती है लेकिन उसमें ज्यादा बड़ा पहलू यह है कि भारत किसी तरह से यह सुनिश्चित करने कि ब्रिक्स को पश्चिम विरोधी मोर्चे के तौर पर नहीं देखा जाए। इस समय रूस पूरे यूरोपीय ब्लॉक से लड़ रहा है। इसलिए रूस के साथ किसी भी टेबल पर बैठना यूरोपीय ब्लॉक को अगर नाराज नहीं करता है तो कम से कम चिंता में जरूर डालता है। दूसरी ओर चीन चाहता है कि पश्चिम विरोधी ब्लॉक के तौर पर ब्रिक्स की पहचान मजबूत होगा। ऐसा होने का कोई नुकसान चीन को नहीं होगा क्योंकि वह अब कोई मिडिल पावर वाला देश नहीं है। वह महाशक्ति है, जिससे अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी संबंध रखना चाहते हैं।

इस साल के अंत में एशिया पैसेफिक इकोनॉमिक कोऑपरेशन यानी एपेक की चीन में होने वाली बैठक में ट्रंप, पुतिन और जिनपिंग सब साथ बैठेंगे। इसलिए चीन हर तरह के शॉक से सुरक्षित है। लेकिन ब्रिक्स के पश्चिम विरोधी ब्लॉक के तौर पर स्थापित होने का भारत को नुकसान हो सकता है। अगर भारत इस फोरम का मुख्य प्लेयर होता और तब ऐसी धारणा बनती तो अलग बात थी। लेकिन मुख्य प्लेयर चीन है। इसलिए भारत के ऊपर बड़ी जिम्मेदारी है कि वह ब्रिक्स को एक तटस्थ बहुपक्षीय मंच बनाए रखने में भूमिका निभाए।

भारत को यह भी ध्यान रखना होगा कि पूरी दुनिया से जुड़े बहुत से मामले में चीन मनमाने तरीके से काम करता है। वह वैश्विक संस्थाओं से मंजूर नियमों से चलने की बजाय अपने नियम से चलता है। वह आर्टिफिशयल इंटेलिजेंस से लेकर इलेक्ट्रिकल व्हीकल्स और डिजिटल गवर्नेंस से लेकर डाटा ऑनरशिप तक के मुद्दे पर अपने नियम और कानून बना रहा है। उसकी एकाधिकारवादी सोच और  स्वीकार्य वैश्विक नियम व व्यवस्था से अलग अपना नियम व अपनी व्यवस्था बनाने के प्रयास को रोकना भी भारत के लिए जरूरी है। बहरहाल, अगर भारत इस अहम आयोजन में तमाम वैश्विक मुद्दों पर एक राय बनवाने में कामयाब होता है, युद्ध समाप्त करने पर सहमति बनाने के प्रयास को आगे बढ़ाता है और ब्रिक्स देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के साथ साथ लेन देन की साझा व्यवस्था बनवाने में कामयाब होता है तो यह बड़ी उपलब्धि होगी। इसके लिए भारत को बहुत गंभीर कूटनीतिक प्रयास करने होंगे।

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