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‘मुफ्त की रेवड़ी’ का बंटना बंद होगा!

लोक कल्याण या एफर्मेटिव एक्शन से जुड़े हर कानून में या हर नीतिगत फैसले में एक ‘एक्जिट क्लॉज’ या ‘सनसेट क्लॉज’ होता है। यह इसलिए जरूरी होता है ताकि जब कानून का उद्देश्य पूरा हो जाए तो उसे समाप्त किया जा सके। हालांकि भारत में ऐसा होता नहीं है। संविधान बनाने वालों ने आरक्षण को 10 साल और अंग्रेजी को 15 साल तक कामकाज की भाषा रखने का कानून बनाया था। लेकिन आजादी के 77 साल बाद तक दोनों चीजें बनी हुई हैं। आजादी के 77 साल बाद आरक्षण की व्यवस्था न सिर्फ जस की तस चल रही है, बल्कि उसमें नए नए किस्म के आरक्षण जुड़ रहे हैं। आरक्षण बढ़ाने और उसके दायरे का विस्तार करने की मांग भी उठ रही है और हैरानी नहीं होगी, अगर अगले साल होने वाली जाति जनगणना के बाद आरक्षण बढ़ाया जाए और उसके दायरे में निजी क्षेत्र और उन सभी क्षेत्रों को भी लाया जाए, जो अभी उसके दायरे से बाहर हैं।

‘मुफ्त की रेवड़ी’ का मामला भी आरक्षण की व्यवस्था की तरह होता जा रहा है। कोई भी लोक लुभावन घोषणा ऐसी ही होती है। वह शेर की सवारी की तरह है। उस पर सवारी तो सर्वशक्तिमान होने का अहसास कराती है लेकिन यह खतरा हमेशा रहता है कि उस पर से गिरे तो शेर खा जाएगा। इसी चिंता में कोई भी पार्टी आरक्षण की व्यवस्था खत्म करने के बारे में नहीं सोचती है, उलटे आगे बढ़ कर श्रेय लेती है कि उसने आरक्षण में और क्या क्या जोड़ दिया। इसी तरह इन दिनों ‘मुफ्त की रेवड़ी’ का मामला है। भले ही अर्थव्यवस्था का रक्तस्त्राव बढ़ता जा रहा है और हालत बिगड़ती जा रही है लेकिन कोई इसे खत्म करने की हिम्मत नहीं कर सकता है। उलटे सभी राज्य हर चुनाल से पहले नकद बांटने की कोई न कोई नई योजना घोषित कर रहे हैं।

पिछले दिनों पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बजट पेश किया तो महिलाओं के मिलने वाली मासिक आर्थिक मदद को एक हजार रुपए से बढ़ा कर डेढ़ हजार कर दिया। साथ ही बेरोजगार युवाओं को डेढ़ हजार रुपया महीना देने की घोषणा की। बजट में उन्होंने कहा कि उनकी सरकार बनेगी तो 15 अगस्त 2026 से युवाओं को डेढ़ हजार रुपया महीना दिया जाएगा। लेकिन उनको लगा कि अगस्त से देने का वादा शायद ज्यादा वोट नहीं दिला सके तो उन्होंने ऐलान कर दिया कि चुनाव से पहले ही बेरोजगारों को यह पैसा मिलने लगेगा। पश्चिम बंगाल सरकार एक अप्रैल से युवाओं को डेढ़ हजार रुपया महीना देगी। ध्यान रहे अप्रैल में ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। जाहिर है इसका मकसद चुनाव को प्रभावित करना है। बिहार में इसी तरह चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार की सरकार ने मुख्यमंत्री महिला उद्यमी योजना के तहत हर घर की एक महिला को 10 हजार रुपए देना शुरू किया। झारखंड में मइया सम्मान योजना ने हेमंत सोरेन की सरकार को लगातार दूसरी बार जीतने में मदद की। मध्य प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से राजधानी दिल्ली तक किसी न किसी रूप में एक से ज्यादा ‘मुफ्त की रेवड़ी’ वाली योजनाएं चल रही हैं।

इस साल आम बजट से पहले केंद्र सरकार ने जो आर्थिक सर्वे पेश किया उसमें ‘मुफ्त की रेवड़ी’ बांटने वाली योजनाओं को लेकर चिंता जताई गई। कहा गया कि इससे लोगों को तत्काल फायदा तो होता है लेकिन लंबे समय में इसका नुकसान हो रहा है। फायदे का तो पता नहीं है लेकिन नुकसान को लेकर कई आंकड़े पहले भी सामने आ चुके हैं। महिला को नकद रुपए देने की योजना पर राज्यों का कुल खर्च सालाना दो लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया है। कई सर्वेक्षणों में बताया गया कि नकद पैसे और मुफ्त की वस्तुओं और सेवाओं की वजह से लोगों में काम करने की इच्छा कम हो रही है। महाराष्ट्र में माझी लड़की बहिन योजना के बाद महिलाओं की कामकाज में भागीदारी कम होने की खबर आई थी।

ध्यान रहे देश में संगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम ही हैं और असंगठित क्षेत्र में रोजगार बहुत मुश्किल भी है और श्रमसाध्य भी है। सरकारें उसे ठीक नहीं कर पा रही हैं। इस बीच लोगों को नकद पैसे मिल रहे हैं और मुफ्त में सेवाएं व वस्तुएं भी मिल रही हैं, जिससे बहुत आरामदेह तो नहीं लेकिन जीवन जीने की स्थितियां मिल रही हैं। इसका असर उत्पादकता पर पड़ रहा है। भारत को इस समय मुफ्त की वस्तुएं, सेवाएं और नकद बांटने की बजाय श्रम शक्ति के सार्थक इस्तेमाल की नीतियां बनाने की जरुरत है। लोगों को सम्माननजक रोजगार और वेतन मिले इसके उपाय करने की जरुरत है। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि यूरोपीय संघ से लेकर अमेरिका तक के साथ भारत की व्यापार संधि हो रही है और भारत के उत्पादों के लिए दुनिया का बाजार खुल रहा है। अगर भारत में विनिर्माण सेक्टर मजबूत होता है और कृषि व पशुपालन के क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ती है तो करोड़ों करोड़ लोगों का जीवन संवारना आसान हो जाएगा।

इसकी बजाय अगर भारत में मुफ्त की रेवड़ी बांटने का चलन जारी रहता है तो इन बदली हुई स्थितियों का लाभ उठाना मुश्किल हो जाएगा। साथ ही राज्यों की हालत और बिगड़ती जाएगी। उनका खर्च और कर्ज दोनों बढ़ेगा। जैसे जैसे कर्ज बढ़ेगा वैसे वैसे ब्याज चुकाने में ज्यादा रकम खर्च होगी। इससे लोक कल्याणकारी योजनाओं के साथ साथ शिक्षा व स्वास्थ्य का खर्च कम होगा और बुनियादी ढांचे के विकास का खर्च भी कम होगा। राज्यों की लगातार बिगड़ती अर्थव्यवस्था की वजह से कई राज्यों में सरकारों ने इस बारे में सोचना शुरू किया है। लेकिन वही शेर की सवारी वाली बात है इसलिए कोई अपनी तरफ से आगे बढ़ कर ऐसी योजनाओं को रोकने की हिम्मत नहीं कर रहा है।

लेकिन अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने विचार के लिए पहुंचा है और चीफ जस्टिस ने इस पर विचार के लिए तीन जजों की बेंच का गठन कर दिया है। कायदे से पहले ही पांच जजों की बेंच बना कर संविधान पीठ में ही सुनवाई होती तो बेहतर होता। लेकिन तीन जजों की बेंच भी लोक कल्याण को परिभाषित कर सकती है और ‘मुफ्त की रेवड़ी’ व लोक कल्याण का फर्क समझा जा सकती है। ज्यादातर राज्य सरकारें चाहेंगी कि सुप्रीम कोर्ट कोई रूलिंग दे तो वे उसको लागू करें और नकद पैसे बांटने या सेवाएं व वस्तुएं मुफ्त में उपलब्ध कराने की योजनाओं को बंद करें। ध्यान रहे इस देश में बहुत सारे अलोकप्रिय या राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों को अदालत के फैसलों से सुलझाया गया है। ‘मुफ्त की रेवड़ी’ का मामला भी उसी रास्ते पर बढ़ता दिख रहा है। लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि राज्य इस पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं।

क्योंकि जब मामला सुप्रीम कोर्ट में सुना जाएगा तो केंद्र से लेकर राज्यों तक को नोटिस भेजा जाएगा या खुद राज्य सरकारें पक्षकार बनेंगी। ध्यान रहे मुफ्त शिक्षा व स्वास्थ्य से लेकर बुजुर्गों, दिव्यांगों, महिलाओं, किसानों, बेरोजगारों आदि के लिए जन कल्याण की योजनाएं पहले भी चलती थीं। उन्हें किस रूप में जारी रखना है यह अदालत को तय करना है। लोक कल्याण और ‘मुफ्त की रेवड़ी’ का फर्क साफ साफ बताना होगा ताकि बाद में सरकारें चुनावी फायदे के लिए सरकारी खजाना लुटाने वाले काम नहीं कर सकें और साथ ही जरुरतमंदों को मदद भी मिलती रहे। महिलाओं को पैसे बांट कर बिहार चुनाव जीतने के आरोप लगाते हुए प्रशांत किशोर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। उनकी याचिका तो खारिज हो गई लेकिन अदालत ने कहा कि वह इस मामले को देख रही है। उम्मीद करनी चाहिए कि सर्वोच्च अदालत से कोई स्पष्ट आदेश आएगा।

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