आरक्षण की व्यवस्था पर देश में बहस हो रही है। अच्छी बात है। बहस होनी चाहिए। अगर पहले बहस हुई होती और समय की जरुरत के हिसाब से आरक्षण की व्यवस्था में बदलाव किया गया होता तो देश की अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ी जातियों की स्थिति बहुत बेहतर हो गई होती और संभव था कि आरक्षण की व्यवस्था भी समाप्त हो जाती। लेकिन अफसोस की बात है कि एफर्मेटिव एक्शन के नाम से शुरू हुई आरक्षण की व्यवस्था देश की कमजोर, वंचित और पिछड़ी जातियों के उत्थान की बजाय चंद नेताओं की राजनीति साधने का हथियार बन गई। तभी 80 साल के बाद भी देश की एक भी जाति का उत्थान नहीं हुआ। एक भी जाति आरक्षण की व्यवस्था से लाभान्वित होकर इससे बाहर नहीं निकली। उलटे आजादी के समय जितनी जातियां आरक्षण के दायरे में थीं उससे कई गुना ज्यादा जातियां अब इसके दायरे में आ गई हैं। आरक्षण के दायरे में आने वाली जातियों के आंकड़े इस बात का सबूत हैं कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था का वैसा लाभ नहीं मिला है, जैसी उम्मीद की गई थी और तभी संविधान में एक अस्थायी प्रावधान के रूप में शुरू हुई योजना स्थायी हो गई है।
आरक्षण की टाइमलाइन देखेंगे तो इसके तीन महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। पहला 1950 का, जब संविधान लागू हुआ। उस समय एससी और एसटी को आरक्षण दिया गया। हालांकि यह प्रावधान अस्थायी था। उसके बाद दूसरा पड़ाव 1990 का है, जब मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करने की घोषणा हुई। इसमें देश की ओबीसी जातियों को आरक्षण दिया गया। तीसरा पड़ाव नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद है, जब आर्थिक रूप से पिछड़े सामान्य वर्ग यानी ईडब्लुएस को आरक्षण दिया गया। यह संविधान में की गई आरक्षण की व्यवस्था से बिल्कुल अलग मामला है। संविधान में सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने की व्यवस्था की गई। उसमें आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात नहीं थी। जब एक बार आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था शुरू हो गई तो यह सवाल बार बार उठने लगा कि क्यों नहीं सिर्फ आर्थिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था लागू हो क्योंकि संविधान लागू होने के समय सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन को जिस तरह से परिभाषित किया गया था, अब समाज वैसा नहीं है। आरक्षण को लेकर चल रही बहस में इस बिंदु को प्रमुखता से उठाया जा रहा है।
रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन यानी आरएचए के नाम में आरक्षण हटाने का प्रदर्शन हो रहा है। लेकिन उनकी मुख्य मांग आरक्षण की समीक्षा करने की है। सामान्य वर्ग की ओर से शुरू किए गए इस आंदोलन में दो मांगें प्रमुखता से रखी जा रही है। पहली मांग तो यह है कि आरक्षण की मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था की समीक्षा हो और दूसरी मांग यह है कि आरक्षण के भीतर आरक्षण की व्यवस्था हो। यानी आरक्षण का वर्गीकरण किया जाए और ज्यादा जरुरतमंदों को आरक्षण का लाभ दिया जाए। यह भी पुरानी बहस है। इस बहस में अब बिहार के दो दलित राजनीतिक परिवार भी कूद गए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने एससी आरक्षण के भीतर वर्गीकरण की मांग की है, जबकि एक अन्य केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने इसका विरोध किया है। दूसरे लोग भी इस बहस में शामिल हुए हैं। राजद के तेजस्वी यादव और भाजपा की नेता उमा भारती का नाम लिया जा सकता है, जिन्होंने जोर देकर कहा है कि कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता है। उधर सुप्रीम कोर्ट में नए सिरे से ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर की व्यवस्था पर सुनवाई हो रही है।
सो, जाहिर है आरक्षण की बहस बढ़ रही है और उसमें एक एक करके कई चीजें जुड़ती जा रही हैं। क्रीमी लेयर की बहस है, आर्थिक आधार पर आरक्षण की बहस है, आरक्षण के भीतर आरक्षण की व्यवस्था बनाने पर बहस है, एक परिवार एक आरक्षण की व्यवस्था लागू करने की बहस है, एससी-एसटी-ओबीसी को मिलने वाली आरक्षण की सुविधाओं जैसी सुविधा ही ईडब्लुएस को भी देने की बहस है और सबसे ऊपर हर प्रतियोगिता परीक्षा में चयन के लिए एक न्यूनतम योग्यता तय करने की मांग पर भी बहस है। इन सभी बिंदुओं पर निश्चित रूप से बहस होनी चाहिए।
अगर इन बिंदुओं पर चर्चा होगी तो कई विसंगितयां दिखाई देंगी, जिनको आम सहमति बना कर दूर किया जा सकता है। जैसे एक बड़ी विसंगति सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन की व्याख्या में है। आजादी के समय कई जातियां सामाजिक भेदभाव का शिकार होती थीं और उनमें शैक्षणिक पिछड़ापन था। उन्हें आरक्षण का लाभ देकर मुख्यधारा में लाना एक जरूरी कदम था। परंतु बाद में अनेक ऐसी जातियां ओबीसी की सूची में शामिल की गईं, जो इतिहास में कभी भी सामाजिक रूप से पिछड़ा नहीं रहीं और न समाज में उनके साथ भेदभाव हुआ। मिसाल के तौर पर जाट या मराठों को लिया जा सकता है। उनके साथ कभी भेदभाव नहीं हुआ। लेकिन उन्हें भी ओबीसी की सूची में शामिल किया गया। जाहिर है समय के साथ एक कृत्रिम सूची बनी है, जिसका सामाजिक वास्तविकताओं से कोई लेना देना नहीं है। अनेक ऐसी जातियां सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ा बन कर आरक्षण का लाभ ले रही हैं, जो वास्तविक अर्थों में समाज में शोषक रही हैं। ऐसी सामंतवादी जातियां, जिनका सामाजिक स्तर पर सचमुच के पिछड़े और वंचितों से लगातार टकराव होता है वे भी आरक्षण का लाभ ले रही हैं। इस विसंगति को दूर करके वास्तविक जरुरतमंदों को आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है।
ऐसी ही एक विसंगित क्रीमी लेयर की व्यवस्था में है। मौजूदा नियम के मुताबिक किसी क्लास वन अधिकारी का वेतन कितना भी हो उसे क्रीमी लेयर में नहीं माना जाएगा और उसके बच्चों को आरक्षण का लाभ मिलेगा। सोचें, किसी के अधिकारी बन जाने से उसके परिवार की सामाजिक व आर्थिक स्थिति भी सुधर जाती है और उसका वेतन इतना होता है कि वह क्रीमी लेयर में आए। लेकिन उसके वेतन को परिवार की आय़ नहीं माना जाता है। इसलिए उसके बच्चों को आरक्षण का लाभ मिलता है। हां, वेतन के अलावा अगर उसका कोई और कारोबार है तब उस आय को परिवार की आय माना जाएगा। इस विसंगति को भी दूर कर दिया जाए तो अपने आप एक परिवार, एक आरक्षण की व्यवस्था लागू हो जाएगी और ज्यादा जरुरतमंदों को इसका लाभ मिलने लगेगा।
इसी तरह एक विसंगति न्यूनतम योग्यता के मामले में है। आरक्षण की व्यवस्था ने दाखिले और नौकरी दोनों के लिए न्यूनतम योग्यता के सिद्धांत को समाप्त कर दिया है। पिछले साल इस बात पर बहुत बहस हुई कि मेडिकल के पीजी कोर्स में माइनस 40 अंक पर दाखिला हुआ। सोचें, पीजी में दाखिले की परीक्षा में वो डॉक्टर शामिल होते हैं, जो पांच साल तक एमबीबीएस की पढ़ाई कर चुके होते हैं। अगर उनको अपने ही पढ़े हुए विषय में माइनस में अंक आ रहे हैं तो क्या उनको स्पेशियलाइज्ड पीजी कोर्स पढ़ कर एमडी बनने की इजाजत होनी चाहिए? यह सवाल हर विषय की पढ़ाई के लिए है और हर नौकरी के लिए है। आरक्षण की व्यवस्था लागू रखते हुए भी पात्रता के लिए न्यूनतम अहर्ता तय होनी चाहिए और उसका पालन होना चाहिए।
दुर्भाग्य से आरक्षण के हर पहलू की बहस इस बात पर चली जाती है कि अनेक समूहों का पांच हजार साल से उत्पीड़न हुआ है। हालांकि पांच हजार साल से उत्पीड़न का कोई ऐतिहासिक सबूत नहीं मिलता है। इतिहास के विद्यार्थी जानते हैं कि पांच हजार साल में भारत पर ज्यादातर पिछड़ी जातियों ने शासन किया है। इतना ही नहीं पिछले तीन हजार साल में तो देश के ज्यादातर शासक गैर हिंदू रहे। वे जैन थे, बौद्ध थे, मुस्लिम थे या अंग्रेज थे। एक हजार साल तो मुसलमानों और अंग्रेजों ने राज किया। लेकिन विडम्बना देखिए कि आरक्षण की व्यवस्था का बचाव करने वाला देश का कोई भी बौद्धिक मुस्लिम उत्पीड़न की बात नहीं करता है। जैसे ही यह बात निकलती है वह सामाजिक विद्वेष फैलने की बात करने लगता है। हालांकि उसी बौद्धिक को ब्राह्मणों या अन्य सवर्णों द्वारा किए गए कथित और अनदेखे उत्पीड़न की बात करने में कोई हिचक नहीं होती है। उसे इससे सामाजिक सद्भाव बिगड़ने की रत्ती भर आशंका नहीं होती है। आरक्षण की बहस में इस हिप्पोक्रेसी पर भी बात होनी चाहिए।
सो, अब बात निकली है तो इसे आगे बढ़ाने की जरुरत है। इसे अंतिम परिणति तक पहुंचाने की आवश्यकता है। अगर बहस आगे बढ़ती है और इससे कुछ विसंगतियों को दूर किया जाता है तो देश और समाज का भला होगा और साथ ही वास्तविक जरुरतमंदों को भी फायदा होगा। सरकार को भी इसमें साहस दिखाने की जरुरत है। सरकार रोहिणी आयोग की रिपोर्ट दबा कर बैठी है और अनुसूचित जाति के आरक्षण में वर्गीकरण के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी खामोश बैठी है। अगर सरकार ज्यादा जरुरतमंदो को लाभ देने के लिए वर्गीकरण से शुरुआत करे तब भी बहुत सुधार हो सकता है।
