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संसद की गरिमा कैसे सुनिश्चित होगी?

भारत में किसी भी चीज को नष्ट करने के कई तरीकों में से एक तरीका यह है कि उसे पवित्र बना दिया जाए। उसे पूजा के योग्य बना दिया जाए। जैसे ही हमारे यहां कहा जाए कि अमुक चीज तो पवित्र है और हम उसकी पूजा करते हैं तो समझ लें कि वह चीज ज्यादा समय तक नहीं रहने वाली है। उसका नष्ट होना अवश्यम्भावी है। मिसाल के तौर पर भारत में नदियों की स्थिति देखी जा सकती है। नदियों को भारत में माता का दर्जा दिया जाता है और पूजा की जाती है लेकिन पूजा करने वाला व्यक्ति भी नदी की साफ सफाई और उसकी पवित्रता का ध्यान नहीं रखता है। सारा कचरा नदियों में जाता है, लोगों के घरों के गंदे नाले नदियों में जाते हैं, औद्योगिक इकाइयों का कचरा नदियों में गिरता है, इसके अलावा और क्या क्या होता वह लिखने की जरुरत नहीं है। सरकारें हजारों करोड़ रुपए खर्च करती हैं और किसी भी नदी की सफाई नहीं हो पाती है।

ऐसे ही हमलोगों ने पहाड़ों को पूजना शुरू किया और अपने लालच में उनकी ऐसी खुदाई शुरू की या पहाड़ काट कर ऐसे निर्माण शुरू किए कि हर पर्वत शृंखला अस्तित्व का संकट झेल रही है। इसी तरह भारत में पेड़ों की पूजा होती है और फिर ऐसी अंधाधुंध कटाई होती है कि लाखों, करोड़ों हेक्टेयर में फैले जंगल समाप्त हो गए। हम अपनी देवियों की पूजा करते हैं और हमारे घरों में स्त्रियों की क्या स्थिति है यह राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं। ऐसी अनेक मिसालें और भी दी जा सकती हैं। लेकिन विषय को समझने के लिए इतना पर्याप्त है।

इतनी लंबी भूमिका की जरुरत इसलिए थी क्योंकि इस समय देश में संसद की पवित्रता की बहस चल रही है। बहुत सारे लोगों की भावनाएं इस बात से आहत हैं कि राहुल गांधी संसद की सीढ़ियों पर समोसे खा रहे थे और चाय पी रहे थे। असल में कुछ दिन पहले राहुल गांधी ने लोकसभा से निलंबित सांसदों के साथ मकर द्वार के पास बैठ कर समोसे खाए थे और चाय पी थी। इसे लेकर भाजपा के सांसदों ने नाराजगी जताई तो देश के दो सौ से ज्यादा कथित गणमान्य लोगों के चिट्ठी लिखने की भी खबर आई, जिसमें राहुल गांधी के व्यवहार को संसद की गरिमा के विरूद्ध बताया गया और उनकी आलोचना की गई। इससे पहले भाजपा के सांसदों ने तृणमूल के एक बुजुर्ग सांसद की शिकायत स्पीकर से की थी, जिसमें कहा गया है कि वे संसद परिसर में सिगरेट पी रहे थे। संसद के अंदर ई सिगरेट पीने की शिकायत भी की गई। ऐसे ही कांग्रेस की एक सांसद कुत्ता लेकर संसद परिसर में आ गई थीं तो उसकी भी बड़ी आलोचना हुई थी।

इसमें से ज्यादातर घटनाएं सामान्य मानवीय व्यवहार से जुड़ी हैं। हो सकता है कि किसी सांसद के सामान्य मानवीय व्यवहार से कोई दूसरा सदस्य आहत हो जाए। जैसे फिल्म अभिनेत्री से सांसद बनीं भाजपा की एक नेता को राहुल गांधी का व्यवहार ‘टपोरी’ जैसा लगता है और उनका दावा है कि राहुल गांधी को देख कर महिला सांसद असहज हो जाती हैं। ऐसे ही राहुल गांधी या किसी अन्य सांसद के सीढ़ियों पर खाना खाने से या संसद परिसर में सिगरेट पीने से कुछ लोगों की भावनाएं आहत होती हों। लेकिन इससे संसद की गरिमा और पवित्रता नष्ट होती है, ऐसा नहीं माना जा सकता है। आखिर संसद के अंदर भी खाने की कैंटीन है। लोग खाना खाते हैं। कुछ दिन पहले ही तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने संसद की सीढ़ियों पर पूरी रात धरना दिया तो वे उन्होंने वही खाना खाया और वही पर सोए। पहले भी ऐसा होता रहा है। इसलिए ऐसी बातों का मुद्दा बना कर विपक्ष के नेताओं को गैरजिम्मेदार, अगंभीर और गरिमामय आचरण नहीं करने का दोषी तो बताया जा सकता है लेकिन इसे संसद की गरिमा और पवित्रता के विरूद्ध बताना उचित नहीं है।

संसद की गरिमा और पवित्रता ऐसी चीजों से तय नहीं होती हैं। संसद की गरिमा और पवित्रता इससे तय होती है कि संसद में किस तरह के विधायी कामकाज होते हैं। देश के 140 करोड़ से ज्यादा लोगों का भाग्य तय करने वाले लोग वहां बैठते हैं, वे कैसे इतने लोगों की किस्मत तय करने वाले फैसले करते हैं, इससे संसद की गरिमा तय होती है। संसद के सदस्य सदन के अंदर किस तरह का आचरण करते हैं, किस तरह संवाद करते हैं, किस तरह की बहस करते हैं इससे तय होगा कि संसद का कितना सम्मान है और कितनी गरिमा है। संसद के संचालन में पक्ष और विपक्ष के बीच समन्वय बनता है या नहीं या सत्तापक्ष की ओर से विपक्ष को अपनी बात रखने का स्पेस दिया जाता है या नहीं इससे तय होगा कि संसद कितनी पवित्र है। इसमें पक्ष और विपक्ष दोनों के ही सांसदों का आचरण शामिल है।

संसद में जरूरी मसलों पर चर्चा नहीं हो। 140 करोड़ लोगों की किस्मत तय करने वाले विधेयक मिनटों में बिना किसी बहस के पास हो जाएं। विपक्ष को बोलने का मौका नहीं दिया जाए या बोलने से रोका जाए। विधेयकों को संसदीय समितियों के सामने नहीं भेजा जाए या संसदीय समितियों की रिपोर्ट्स को गंभीरता से नहीं लिया जाए। संसदीय समितियों में बहुमत के दम पर हर बार सरकार के पक्ष को स्वीकार किया जाए और विपक्ष की मांग खारिज हो। विधेयकों पर विपक्ष की आपत्तियों को बिना चर्चा के खारिज कर दिया जाए। तब संसद की गरिमा प्रभावित होती है। कानून की गुणवत्ता और उसके व्यापक असर में कोई कमी रह जाए तो संसद की गरिमा पर आंच आती है। इसकी बजाय अगर चर्चा इस दिशा में चली जाए कि अमुक नेता टीशर्ट पहन कर सदन में आता है या अमुक नेता सीढ़ियों पर बैठ कर खा रहा था तो समझ लेना चाहिए कि कुछ बुनियादी गड़बड़ी है। ऐसे मामले आमतौर पर ध्यान भटकाने या किसी नेता की साख बिगाड़ने के लिए उछाले जाते हैं। उनका संविधान की ओर से विधायिका के लिए निर्धारित भूमिका से कोई लेना देना नहीं होता है।

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