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मुंबई और मालेगांव का दोषी कौन?

यह पुरानी बात हो गई लेकिन दो नए घटनाक्रमों की वजह से इसका संदर्भ जरूरी है। राजधानी दिल्ली के एक पॉश क्लब में 30 अप्रैल 1999 को जेसिका लाल नाम की 34 साल की एक मॉडल की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में गवाहों के बयान और परिस्थितिजन्य सबूतों के आधार पर मुख्य आरोपी सिद्धार्थ वशिष्ठ उर्फ मनु शर्मा को गिरफ्तार किया गया था। इस मामले में कुल 12 आरोपी बनाए गए थे। सात साल की सुनवाई के बाद 21 फरवरी 2006 को मुख्य आरोपी मनु शर्मा सहित नौ आरोपी बरी कर दिए गए।

एक आरोपी पहले ही बरी हो गया था और दो लोग फरार रहे। पुलिस की ओर से पेश किए गए 32 गवाह अपनी गवाही से मुकर गए थे। फैसले के बाद दिल्ली के अंग्रेजी अखबार ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने खबर छापी ‘नो वन किल्ड जेसिका लाल’। इसके बाद आंदोलन, प्रदर्शन और घटनाओं का ऐसा सिलसिला चला कि मनु शर्मा की फिर गिरफ्तारी हुई और पहले हाई कोर्ट से और बाद में सुप्रीम कोर्ट से उम्र कैद की सजा हुई।

इस घटनाक्रम की याद दिलाने का ताजा संदर्भ यह है कि 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव में हुए बम धमाके के सभी सात आरोपियों को राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए की विशेष अदालत ने 31 जुलाई को बरी कर दिया। मालेगांव धमाके में छह लोगों की मौत हुई थी। क्या अब जेसिका लाल हत्याकांड की तरह यह नहीं कहा जा सकता है कि इन छह लोगों को किसी ने नहीं मारा? जांच एजेंसी ने कहा है कि वह फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती नहीं देगी। इसका मतलब है कि एनआईए ने फैसले को स्वीकार कर लिया है। जब जांच एजेंसी ही आरोपियों को सजा दिलाने में दिलचस्पी नहीं ले रही है या नए सिरे से जांच शुरू करने में कई रूचि नहीं ले रही है तो मामले का क्या भविष्य होगा यह अंदाजा लगाया जा सकता है। परंतु पीड़ित पक्ष यानी सात मारे गए लोगों के परिजन विशेष अदालत के फैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती देंगे।

इसी तरह 11 जुलाई 2006 को मुंबई में हुए ट्रेन धमाके के सभी 12 आरोपियों को बॉम्बे हाई कोर्ट ने बरी कर दिया। हालांकि इस मामले में जांच एजेंसी ने फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और सुप्रीम कोर्ट ने फैसले पर रोक लगा दी। सर्वोच्च अदालत ने सभी 12 आरोपियों को बरी करने के फैसले पर रोक लगा दी है लेकिन हाई कोर्ट के फैसले के बाद जेल से रिहा हो गए आरोपियों की फिर से गिरफ्तारी का आदेश नहीं दिया है, बल्कि उन्हें आजाद रहने देने को कहा है। जाहिर है अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चलेगा लेकिन हाई कोर्ट के फैसले के बाद यह तो हेडलाइन बनती थी कि मुंबई में 180 लोगों को किसी ने नहीं मारा! ध्यान रहे इससे पहले 2015 में मकोका अदालत ने इन 12 आरोपियों को दोषी ठहराया था, जिनमें से पांच को फांसी की सजा और बाकी सात को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। हाई कोर्ट ने इस फैसले को पलट दिया है।

मालेगांव और मुंबई दोनों मामले भारत की पुलिस, दूसरी विशिष्ठ जांच एजेंसियों और न्यायपालिका के कामकाज की वास्तविकता प्रकट करने की मिसाल हैं। इस बहस में जाने की  जरुरत नहीं है कि किस मामले में आरोपी किस धर्म के हैं और पीड़ित किस धर्म के हैं और उसका मुकदमे पर क्या असर हुआ है। इस तथ्य से परे यह देखने की जरुरत है कि जांच एजेंसियों ने किस तरह से मुकदमा बनाया, किस तरह से केस डायरी तैयार की, कैसे सबूत जुटाए, कैसे गवाह इकट्ठा किए और फिर क्या हुआ कि एक एक करके सारे सबूत बेकार साबित होते गए और कैसे एक एक करके गवाह मुकरते चले गए और अंततः पुलिस व जांच एजेंसियों का केस पूरी तरह से ध्वस्त हो गया? मालेगांव मामले में 39 गवाह अपनी पुरानी गवाही से मुकर गए।

सोचें, जेसिका लाल मामले में 32 गवाह मुकरे थे और तब अदालत ने गवाहों की बड़ी लानत मलानत की थी। मालेगांव मामले में 39 गवाह मुकर गए और कोई सवाल नहीं उठाया गया! क्या ऐसे गवाहों पर झूठी गवाही देने का मुकदमा नहीं चलना चाहिए या उनसे यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि वे क्यों अपनी गवाही से मुकरे? दुनिया के दूसरे सभ्य देशों में विटनेस प्रोटेक्शन जांच एजेंसियों और अभियोजन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है लेकिन भारत में गवाह और उसकी गवाही की पवित्रता या उसकी सुरक्षा का  कोई ध्यान नहीं रखा जाता है। जिस गवाह को जो मन होता है या कई मामलों में पुलिस जो बताती है वह अदालत में खड़े होकर कह देता है और फिर उससे मुकर भी जाता है। इससे पूरा मुकदमा मजाक बन कर रह जाता है।

यह मामला सिर्फ झूठी गवाही या गवाह के मुकरने का नहीं है, बल्कि जांच में जुटाए गए सबूतों और केस की टाइमलाइन का भी है। अदालतों को उसमें भी खामी दिखी है। तभी सवाल है कि क्या यह खामी पुलिस की खराब जांच की वजह से आई या जान बूझकर जांच को बेपटरी किया गया? इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत में अपराध अनुसंधान की अच्छी व्यवस्था नहीं है। पुलिस को इसका प्रशिक्षण नहीं है और न अच्छे फॉरेंसिक लैब्स हैं। दुनिया भर में कानून व्यवस्था, अपराध अनुसंधान और अभियोजन की पुलिस अलग अलग होती है। लेकिन भारत में जिस पुलिसकर्मी को कानून व्यवस्था संभालने का जिम्मा है उसी को अपराध का अनुसंधान भी करना है। इसलिए भी भारत में सजा होने की दर बहुत कम है।  और शायद यही कारण है कि भारत में ट्रायल के दौरान ही आरोपी को जेल में रख कर उसको कुछ सजा दे दी जाती है क्योंकि सबको पता है कि बाद में ज्यादातर को बरी हो ही जाना है। यही कारण है कि भारत में अनिवार्य जमानत का सिद्धांत कारगर नहीं हो सका।

बहरहाल, पुलिस और जांच की कमजोरी के साथ साथ अदालतों में लगने वाला लंबा समय भी एक कारण है, जिससे मुकदमे की सुनवाई बेपटरी होती है। अब सोचें, मुंबई बम धमाके  का पहला फैसला नौ साल के बाद आया था और हाई कोर्ट का फैसला 19 साल के बाद आया। इसी तरह मालेगांव मामले का पहला ही फैसला 17 साल के बाद आया है। इतने लंबे समय तक मुकदमे का चलते रहना अपने आप में एक बड़ा सवाल है।

मुंबई और मालेगांव मामले में एक और बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीतिक सत्ता बदलने से मुकदमे की सुनवाई पर असर होता है? क्या राजनीतिक सत्ता ऐसे मामलों की जांच को प्रभावित करती हैं? यह सवाल इसलिए है क्योंकि मालेगांव केस के फैसले के बाद आरोपियों की ओर से लगातार कहा जा रहा है कि उस समय की सरकार की वजह से जांच एजेंसियों ने उनको टॉर्चर किया और मोहन भागवत से लेकर नरेंद्र मोदी व योगी आदित्यनाथ तक का नाम लेने के लिए दबाव बनाया। इसमें संदेह नहीं है कि यह मामला काफी पहले राजनीतिक रंग ले चुका था और मुकदमे की सुनवाई के दौरान इतना गंभीर मामला होने के बावजूद भाजपा ने एक आरोपी साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को लोकसभा चुनाव को टिकट दिया और उनको सांसद बनाया।

जो हो इन दोनों घटनाओं ने भारत की अपराध न्याय प्रणाली की फॉल्टलाइन को उजागर कर दिया है। इससे यह जाहिर हुआ है कि बड़ी से बड़ी घटना की जांच भी वस्तुनिष्ठ तरीके से नहीं होती है। राजनीतिक हालात, पीड़ित और आरोपी का धर्म, जांच एजेंसी की लापरवाही, अदालत की सुस्ती जैसी अनेक चीजें हैं, जिनसे मुकदमों का भविष्य प्रभावित होता है। कभी कोई गलत मुकदमा बनवा देता है तो कभी कोई सही मुकदमे के सही आरोपी को भी बचा लेता है। ये दोनों मामले वेकअप कॉल की तरह हैं। इनसे सबक लेकर जरूरी सुधार किए जाने की सख्त जरुरत है।

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