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सिर्फ संसद की राजनीति काफी नहीं

संसद के बजट सत्र में ब्रेक चल रहा है। सत्र का दूसरा हिस्सा नौ मार्च से शुरू होगा और दो अप्रैल तक चलेगा। बजट सत्र का पहला हिस्सा बहुत हंगामे वाला रहा। वैसे तो हर सत्र ही हंगामे वाला होता है लेकिन इस बार कुछ अनोखी चीजें हुईं। जैसे स्पीकर ने प्रधानमंत्री को सुझाव दिया कि वे राष्ट्रपति के अभिभाषण पर हुई एक अधूरी चर्चा का जवाब देने लोकसभा में नहीं आएं क्योंकि कुछ ‘अप्रत्याशित’ घट सकता है। प्रधानमंत्री मान भी गए। पहली बार ऐसा हुआ। ऐसे ही पहली बार हुआ कि नेता प्रतिपक्ष को बोलने नहीं दिया गया और बदले में विपक्ष ने प्रधानमंत्री को नहीं बोलने दिया। पहली बार विपक्ष की महिला सांसदों से प्रधानमंत्री को खतरा होने की बात हुई। पहली बार नेता प्रतिपक्ष के खिलाफ सब्सटेंसिव मोशन पेश किया गया। पूर्व प्रधानमंत्रियों की नीतियों की आलोचना तो पहले भी होती थी लेकिन इस बार की नई गिरावट यह थी कि पूर्व प्रधानमंत्रियों की जीवनी या उनके ऊपर लिखी गई किताबों में से यहां वहां के उद्धरण छांट कर उनको ‘गद्दार’, ‘अय्याश’ आदि सदन के अंदर कहा गया। पहली बार ऐसा हुआ कि संसदीय कार्य मंत्री ने विपक्षी सांसदों पर आरोप लगाया कि उन्होंने स्पीकर के चैम्बर में जाकर गाली गलौज की। करीब चार दशक बाद पहली बार स्पीकर के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया। य़ह सब कुछ दो से 13 फरवरी के बीच हुआ।

यह 12 दिन का समय राहुल गांधी की राजनीति के लिए बहुत अच्छा रहा। वे इस 12 दिन की राजनीति के केंद्र में रहे। दो फरवरी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर उनके भाषण देने से विवाद शुरू हुआ और उनके खिलाफ मोशन लाए जाने के बाद सदन की कार्यवाही आठ मार्च तक स्थगित हुई। सत्र शुरू होने से एक दिन पहले यूरोपीय संघ के साथ व्यापार संधि हुई और सत्र के बीच अमेरिका के साथ संधि की घोषणा हुई। इसी बीच एपस्टीन फाइल्स के पन्ने खुले, जिसमें एक केंद्रीय मंत्री और एक कारोबारी के एपस्टीन से संपर्कों की कहानियां आईं। इन तमाम घटनाओं ने राहुल गांधी को मौका दिया कि वे केंद्र सरकार पर हमलावर रहें। कुछ अंतरराष्ट्रीय हालात और कुछ राहुल गांधी के तेवर से सरकार बैकफुट पर रही। प्रधानमंत्री से लेकर मंत्री तक बचाव की मुद्रा में दिखे। राहुल गांधी के खिलाफ प्रस्ताव लाना भी घबराहट का ही संकेत है। सोशल मीडिया में नैरेटिव है कि राहुल ने कमाल कर दिया।

इस पूरे घटनाक्रम से राहुल का आत्मविश्वास भी बढ़ा, जिसमें उन्होंने दो बड़ी गलतियां कीं। आत्मविश्वास और अति उत्साह में उन्होंने संसद की सीढ़ियों पर अपने एक साथी सांसद और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू को ‘गद्दार दोस्त’ कहा। यह राहुल गांधी की अपनी छवि के बिल्कुल उलट बात थी। दूसरी गलती उन्होंने यह कर दी कि दो केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव और प्रहलाद जोशी की मीडिया से बातचीत के बीच में घुस गए और बोलने लगे। उन्होंने प्रहलाद जोशी का हाथ पकड़ कर उनको रोकने का प्रयास भी किया। इन दोनों घटनाओं को कांग्रेस इकोसिस्टम के लोगों ने खूब प्रचारित किया। उन्होंने इसे ऐसे प्रस्तुत किया, जैसे राहुल के डर से दो मंत्री भाग गए और राहुल ने ठीक किया, जो कांग्रेस छोड़ने वाले बिट्टू को गद्दार कहा। लेकिन ये दोनों घटनाएं सामान्य संसदीय आचरण के अनुरूप नहीं हैं।

बहरहाल, संसद के बजट सत्र में राहुल गांधी चर्चा के केंद्र में रहे। वे एजेंडा सेट करते रहे, जिस पर सरकार जवाब देती रही और बैकफुट पर रही। लेकिन यह पहला सत्र नहीं है, जिसमें राहुल ने महफिल लूटने वाला काम किया है। इससे पहले भी डोकलाम का घटनाक्रम हो या हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट हो, हर बार सत्र में राहुल गांधी हीरो होते हैं। वे अच्छे और लंबे भाषण करते हैं और संसद के पूरे सत्र का एजेंडा सेट कर देते हैं। लेकिन क्या संसद सत्र के दौरान उनके द्वारा की जाने वाली राजनीति चुनाव के मैदान में कांग्रेस को लाभ पहुंचाती है? क्या संसद में वे जो राजनीति करते हैं उससे कांग्रेस संगठन को ताकत मिलती है? यह सही है कि इससे राहुल गांधी की साहसी और निर्भीक नेता की छवि को मजबूती मिलती है और कांग्रेस की चर्चा होती है। लेकिन सत्र समाप्त होने के साथ ही ये चर्चाएं भी समाप्त हो जाती हैं। राहुल गांधी को यह ध्यान रखने की जरुरत है कि राजनीति बिट्स एंड पैचेज में होने वाली चीज नहीं है। संसद सत्र में उनके उठाए मुद्दों से जो माहौल बनता है उसे जनता के बीच ले जाना होता है। इसके लिए पार्टी संगठन को मजबूत करने की जरुरत होती है ताकि मुद्दों पर जमीनी स्तर पर राजनीति हो सके। अफसोस की बात है कि राहुल गांधी यह काम नहीं कर पाते हैं। उन्होंने सत्र के बीच एक दिन किसान बन कर मनरेगा बचाओ आंदोलन में हिस्सा लिया लेकिन 45 दिन का कांग्रेस का मनरेगा बचाओ अभियान कब शुरू हुआ और कब समाप्त हो गया, यह न तो जमीनी स्तर पर दिखा और न दिल्ली में दिखा।

संसद का मौजूदा बजट सत्र चल रहा होगा उसी बीच पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की घोषणा होगी। अप्रैल में पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में चुनाव होना है। इन पांच राज्यों में पिछले छह महीने में राहुल गांधी सिर्फ एक बार तमिलनाडु और संभवतः एक या दो बार केरल गए हैं। प्रियंका गांधी वाड्रा भी सिर्फ केरल गई हैं क्योंकि वे वहां की वायनाड सीट से सांसद हैं। इसके उलट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस साल के पहले डेढ़ महीने में दो-दो बार पश्चिम बंगाल और असम जा चुके हैं और एक-एक बार तमिलनाडु और केरल का दौरा कर चुके हैं। अमित शाह इन पांचों राज्यों का कम से कम एक-एक दौरा कर चुके हैं। बजट सत्र में ब्रेक होने के साथ ही प्रधानमंत्री असम के दौरे पर गए और अमित शाह पुडुचेरी पहुंचे। इसी हफ्ते अमित शाह असम जाने वाले हैं। एक महीने में यह उनका दूसरा दौरा होगा। लेकिन राहुल और प्रियंका के मोर्चे पर अचानक शांति छा गई। राहुल ने सोशल मीडिया में जरूर अमेरिका और भारत की व्यापार संधि को लेकर पोस्ट किए। लेकिन कांग्रेस की ओर से व्यापार संधि, किसानों के मुद्दे, मनरेगा बचाने आदि के मोर्चे पर कोई राजनीतिक अभियान नहीं चलाया जा रहा है।

क्या इस समय राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा व्यापार संधि से किसानों को होने वाले नुकसान की जो बात सोशल मीडिया में लिख रहे हैं या मीडिया के सामने बोल रहे थे उन बातों को लेकर जनता के बीच नहीं जाना चाहिए? क्या इस समय इन दोनों को चुनावी राज्यों के तूफानी दौरे पर होना चाहिए? ध्यान रहे दोनों के पास कोई और काम नहीं है। दोनों फुल टाइम नेता हैं। ये दोनों ही चेहरे हैं, जिनको मोदी और शाह के खिलाफ लड़ना है। मोदी और शाह को प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के तौर पर भी काम करना है लेकिन दोनों राजनीतिक काम के लिए जितनी मेहनत कर रहे हैं राहुल और प्रियंका उसका 10 प्रतिशत भी नहीं कर रहे हैं। सवाल है कि दोनों अपने को किस समय के लिए बचा रहे हैं? संसद की राजनीति से राहुल को जो बढ़त मिलती है उसको चुनावी राज्यों में जाकर इस्तेमाल करें और जमीन की राजनीति करें तभी उसका कोई अर्थ होगा। अन्यथा पहले की तरह वे संसद की राजनीति में और सोशल मीडिया में हीरो बनते रहेंगे और भाजपा चुनाव जीतती रहेगी।

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