Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

सड़क पर भी राहुल ही नेता प्रतिपक्ष

छह अक्टूबर से शुरू होकर एक नवंबर की रामलीला मैदान की रैली तक के घटनाक्रम के बाद कह सकते हैं कि संसद के बाद राहुल गांधी अब सड़क पर भी नेता प्रतिपक्ष हो गए हैं। विपक्षी पार्टियों ने उनको नेता मान लिया है और उनकी कमान में आगे की राजनीति के लिए तैयार हैं। हालांकि यह एकता कब तक बनी रहेगी और विपक्ष को इसका क्या लाभ मिलेगा यह बाद में देखने की बात होगी। लेकिन देश की राजनीति में एक बड़ा शिफ्ट अभी दिख रहा है कि विपक्ष अपनी तरफ से राहुल गांधी का चेहरा प्रस्तुत कर रहा है।

अब तक भाजपा कहती थी कि राहुल गांधी बनाम नरेंद्र मोदी का चुनाव होना, भाजपा के लिए बहुत फायदेमंद होता है। भाजपा के नेता दावा करते थे कि राहुल ही उनके स्टार प्रचारक हैं। यह भी नैरेटिव था कि भाजपा चाहती है कि राहुल के नेतृत्व में ही विपक्ष चुनाव लड़े क्योंकि वे मोदी के कमजोर प्रतिद्वंद्वी हैं, जिन्हें मोदी आसानी से हरा देते हैं। भाजपा के इस नैरेटिव के ट्रैप में कई विपक्षी नेता भी थे। वे भी कहते थे कि जनता जब देखती है कि मोदी के मुकाबले राहुल हैं तो नाराजगी के बावजूद वह भाजपा को वोट दे देती है।

अब ऐसा लग रहा है कि यह धारणा बदली है। अब राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी का गंभीर ओर मजबूत प्रतिद्वंद्वी माना जाने लगा है। विपक्ष भी इस बात को स्वीकार कर रहा है। इस मामले में सबसे दिलचस्प बात यह है कि राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार करने का कारण राजनीतिक या चुनावी परफॉरमेंस नहीं है। वे इसलिए सर्वमान्य नेता नहीं बन रहे हैं कि वे कांग्रेस या विपक्ष को चुनाव जितवा रहे हैं। चुनाव तो उनकी पार्टी लगातार हार रही है। असल में उनके सर्वमान्य नेता बनने का एक बड़ा कारण यह है कि तमाम प्रयास के बावजूद कोई भाजपा को हरा नहीं पा रहा है। एकाध राज्यों के अपवाद को छोड़ दें तो भाजपा को न कांग्रेस हरा पा रही है और न प्रादेशिक क्षत्रप हरा पा रहे हैं। उलटे एक एक करके क्षत्रप चुनाव हार रहे हैं और कमजोर होकर कांग्रेस की शरण में आ रहे हैं। कह सकते हैं कि सारे दुखिया लोगों का एक ठिकाना कांग्रेस का नेतृत्व और ‘इंडिया’ ब्लॉक है।

जब तक सारे प्रादेशिक क्षत्रप बहुत मजबूत थे तब तक सबको लग रहा था कि वे क्यों नेतृत्व का स्पेस छोड़ें और क्यों राहुल को नेता स्वीकार करें। उस समय सब अपनी ताकत के भरोसे में थे और कहीं न कहीं उनको भाजपा के बनाए इस नैरेटिव पर यकीन था कि राहुल अगंभीर नेता हैं और चुनाव नहीं जीता सकते। 2024 के लोकसभा चुनाव से यह धारणा बदली। यह सत्य स्थापित हुआ कि अगर विपक्षी पार्टियां एकजुट हो जाएं तो लोकसभा चुनाव में भी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले गठबंधन को हराया जा सकता है। अगर 2024 के ऐन चुनाव से पहले नीतीश कुमार गठबंधन छोड़ कर नहीं गए होते और ममता बनर्जी ‘इंडिया’ ब्लॉक के साथ मिल कर चुनाव लड़तीं तो तस्वीर दूसरी हो सकती थी। फिर उस चुनाव में भाजपा ने बहुमत गंवाया।

इससे विपक्षी पार्टियों को अलग किस्म का कॉन्फिडेंस मिला था। परंतु उसके बाद हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने पूरी तस्वीर बदल दी। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में चुनाव हार गईं। एमके स्टालिन तमिलनाडु की सत्ता से बाहर हो गए। कम्युनिस्ट पार्टियों का एकमात्र गढ़ ढह गया। तेजस्वी यादव 80 से 25 सीट पर आ गए। शरद पवार से लेकर उद्धव ठाकरे तक हर क्षत्रप कट टू साइज हो गया। अखिलेश यादव जरूर एक सौ विधायक और 37 लोकसभा सांसद वाली पार्टी के नेता हैं। लेकिन उनको भी लग रहा है कि बिना कांग्रेस के आगे की राजनीति कठिन है। सो, वे भी बाकी क्षत्रपों की तरह कांग्रेस व राहुल गांधी के नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार हैं।

पिछले एक महीने के घटनाक्रम के दौरान कई बार दिखा कि अखिलेश में भी पहले थोड़ी हिचक थी। लेकिन चुनाव आयोग के घेराव से लेकर सुप्रीम कोर्ट मार्च के बाद रामलीला मैदान की रैली तक आते आते ऐसा लग रहा है कि उन्होंने भी राहुल को नेता मान लिया है। राहुल ने भी अखिलेश यादव को अपने गठबंधन में नंबर दो का स्थान दिया है। रामलीला मैदान की रैली में भाषण का जो क्रम था उससे भी यह संकेत मिला। राहुल गांधी आखिरी वक्ता थे लेकिन उनसे ठीक पहले अखिलेश यादव बोले। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के भाषण का क्रम बदला गया। इससे एक दिन पहले जन महाभियोग की कार्यवाही में विपक्ष के आरोप खड़गे ने रखे और उन पर चर्चा के बाद राहुल ने सर्वोच्च नेता के नाते जवाब दिया। उस जन महाभियोग में अखिलेश यादव नहीं थे। रामलीला मैदान मं वे मोजूद रहे तो भाषण का क्रम बदल गया।

सो, अखिलेश यादव ने राहुल को नेता माना तो राहुल ने भी उनके महत्व को स्वीकार किया। ध्यान रहे अखिलेश लोकसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी के नेता हैं और उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी का बहुत बड़ा आधार है इसलिए वे हर हाल में विपक्ष के सेटअप में नंबर दो नेता होंगे। वैसे भी कहते हैं कि दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर आता है। कांग्रेस को लग रहा है कि यह रास्ता अखिलेश की मदद बगैर पार नहीं होगा। सो, रामलीला मैदान की रैली में कितने लोग इकट्ठा हुए इस बहस को छोड़ दें तो मैसेज बहुत स्पष्ट है।

जिस तरह पार्टियों ने लोगों को मोबिलाइज किया और एक दूसरे के लिए पूरक का काम किया उससे लग रहा है कि विपक्ष एकजुट हुआ है और इस एकजुट विपक्ष के नेता राहुल गांधी हैं। हालांकि अब भी कई पार्टियां सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों के गठबंधन से अलग हैं। डीएमके और आम आदमी पार्टी ‘इंडिया’ ब्लॉक से निकल गए हैं तो बसपा, वाईएसआर कांग्रेस, बीजू जनता दल, बीआरएस जैसी पार्टियां भी विपक्षी गठबंधन के साथ नहीं हैं। लेकिन अगर अगले साल के चुनावों में ‘इंडिया’ ब्लॉक का प्रदर्शन सुधरता है तो 2029 के लिए सबके साथ आने की संभावना मजबूत होगी।

Exit mobile version