अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का प्रबंधन संभाल रहे श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पास सोमवार, छह जून को एक मौका था कि वह करोड़ों हिंदू भक्तों का विश्वास जीतने की पहल करे। कायदे से यह पहल तो उसी समय हो जानी चाहिए थी, जब मंदिर के चढ़ावे में चोरी के आरोप लगे थे और आरोप प्रमाणित करने वाले तथ्य सामने आ गए थे। लेकिन उस समय ट्रस्ट की ओर से पूरे मामले पर परदा डालने का प्रयास किया गया। जब इसमें कामयाबी नहीं मिली तब भी मुकदमा दर्ज करके जांच करने की बजाय विशेष जांच टीम यानी एसआईटी का गठन किया गया। इस एसआईटी ने सात दिन की जांच के बाद एक ऐसे अधिकारी को अपनी अंतरिम रिपोर्ट सौंपी, जो खुद ट्रस्ट का पदेन सदस्य है। सोचें, जो सरकार का बड़ा अधिकारी है और ट्रस्ट का सदस्य है और इस नाते मंदिर में जो कुछ भी हुआ उसके लिए अंशतः जिम्मेदार है, उसने एसआईटी बनाई और एसआईटी ने उसको रिपोर्ट सौंपी! इस रिपोर्ट की ईमानदारी पर कितना भरोसा किया जा सकता है? छह जून की बैठक में पदेन सदस्य के तौर पर वह अधिकारी महोदय भी ट्रस्ट की बैठक में शामिल हुए।
बहरहाल, एसआईटी की रिपोर्ट के बाद एक एफआईआर दर्ज हुई, जिसमें ट्रस्ट के किसी भी जिम्मेदार सदस्य का नाम नहीं था। चढ़ावे की रकम गिनने वाले ठेके पर रखे गए छोटे छोटे कर्मचारियों को पकड़ कर जेल में डाल दिया गया। उनसे पूछताछ और उनके घरों से बरामद 20 लाख या 16 लाख या 14 लाख की रकम को ऐसे प्रचारित किया गया, जैसे चढ़ावे में चोरी इतने की ही हुई है और यह कोई उल्लेखनीय गड़बड़ी नहीं है। उल्लेखनीय शब्द का इस्तेमाल ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने किया था। कुल मिला कर एसआईटी की जांच, अयोध्या पुलिस की जांच और उसके बीच हुई ट्रस्ट की बैठक में कुछ भी ऐसा नहीं हुआ, जिससे हिंदू भक्त या देश के आम नागरिक का विश्वास बहाल हो।
यह ध्यान रखने की जरुरत है कि आस्था का मामला बड़ा नाजुक होता है। यहां आस्था पर आघात हुआ है। हालांकि इस अंतर को भी समझने की आवश्यकता है कि भगवान राम के प्रति किसी हिंदू की आस्था इससे प्रभावित नहीं होगी। परंतु भगवान राम के प्रति करोड़ों हिंदुओं की आस्था के आधार पर जो व्यवस्था बनी और उस आस्था से जिन लोगों ने राजनीतिक लाभ प्राप्त किया उनके प्रति आस्था जरूर प्रभावित होगी। हिंदुओं की आस्था भगवान राम में है, जिसका इस्तेमाल करके भाजपा ने राजनीतिक लाभ प्राप्त किया और इसी आस्था के सहारे ट्रस्ट के लोगों ने एक व्यवस्था बनाई, जिसमें लाखों, करोड़ों की लूट और दूसरी कई गड़बड़ियों की खबरें आ रही हैं।
हैरानी की बात है कि ट्रस्ट की ओर से विश्वास बहाली का कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया और न आस्था से लाभान्वित हुई भाजपा की ओर से कुछ किया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अयोध्या में चढ़ावा चोरी को लेकर अभी तक कोई बयान नहीं दिया है। सोचें, केंद्र के एक प्रतिनिधि ट्रस्ट में पदेन सदस्य हैं और प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव रहे नृपेंद्र मिश्रा भी मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष के नाते पदेन सदस्य हैं। ट्रस्ट का गठन केंद्र सरकार द्वारा कराया गया है। इसके बावजूद केंद्र सरकार की ओर से कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है और न कोई बयान दिया जा रहा है। यही हाल राज्य सरकार का है। मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव और राज्य के अपर गृह सचिव संजय प्रसाद ट्रस्ट के पदेन सदस्य हैं। इस तरह राज्य सरकार भी मंदिर प्रबंधन की व्यवस्था में शामिल है। लेकिन उसने भी एक एसआईटी बना कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। केंद्र और राज्य दोनों के पास इतनी एजेंसियां हैं लेकिन किसी को पता नहीं चला कि मंदिर में क्या हो रहा है और जब हो गया तब भी किसी ने कोई ऐसी कार्रवाई नहीं की, जिससे लोगों का विश्वास बहाल हो।
ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास हैं। वे व्हील चेयर पर बैठ कर छह जून की बैठक में शामिल होने पहुंचे थे। उनकी उम्र 88 साल है और वे मंदिर प्रबंधन में किसी तरह की सक्रिय भागीदारी करने में अक्षम हैं। फिर भी वे ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं और इतनी बड़ी घटना के बाद भी अपने पद पर बने हुए हैं। उन्होंने न तो ट्रस्ट के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया और न ट्रस्ट को पूरी तरह से भंग करके नया ट्रस्ट बनाने की कोई पहल की। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ‘यशस्वी’ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम से एक चिट्ठी लिखी, जिसमें उम्मीद जताई कि ये लोग दोषियों को सजा दिलाएंगे। चढ़ावा चोरी की घटना सामने आने के सवा महीने बाद ट्रस्ट के अध्यक्ष की नींद खुली और उन्होंने प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखी। मंदिर आंदोलन में महंत नृत्य गोपाल दास के योगदान पर कोई सवाल नहीं उठाया जा रहा है लेकिन उनकी क्या मजबूरी है कि वे 88 साल की उम्र में और अशक्त होने के बावजूद ट्रस्ट के अध्यक्ष पद पर आसीन हैं और इतनी बड़ी घटना के बाद भी कोई सख्त कार्रवाई नहीं कर रहे हैं?
सोचें, ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास उम्रदराज और अशक्त हैं। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष महंत गोविंद गिरी अयोध्या में नहीं रहते हैं। उन्होंने कहा कि वे बैंकिंग से जुड़े किसी काम में शामिल नहीं होते हैं। संचालन की जिम्मेदारी संभाल रहे महासचिव चंपत राय पर चढ़ावा चोरी के आरोपियों को संरक्षण देने के आरोप लगे हैं। उनके सबसे करीबी सहयोगी और दिन प्रतिदिन का काम देखने वाले ट्रस्टी अनिल मिश्रा के ऊपर संदिग्ध लोगों की भरती करने और दूसरी कई तरह की गड़बड़ियों के आरोप लगे हैं। फिर भी ट्रस्ट की बैठक में ट्रस्ट को भंग करके नए लोग लाने की बजाय सब कुछ ठीक होने का दावा किया जा रहा है। यह इस बात का संकेत है कि ट्रस्ट के लोगों के हित इससे इतने गहरे जुड़ गए हैं कि वे इसे भंग करके कोई नई व्यवस्था बनाने के बारे में नहीं सोच रहे हैं। ट्रस्ट से बाहर के जो लोग हैं, वे ट्रस्ट के लोगों को नाराज नहीं करना चाहते हैं क्योंकि इसका राजनीतिक नुकसान हो सकता है। ट्रस्ट के अंदर राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के लोग हैं तो बाहर भाजपा के लोग हैं। इनके आचरण से ऐसा लग नहीं रहा है कि उनको हिंदुओं की आस्था का कोई ख्याल है या उसे बहाल करने की चिंता है।
अगर सचमुच चिंता होती तो पहले दिन से ऐसी व्यवस्था बनाई जाती, जिसमें चोरी की गुंजाइश नहीं होती। अगर चिंता होती तो चोरी की खबर सामने आने के बाद उसे ढकने, छिपाने की बजाय खुलासा किया जाता। अगर चिंता होती तो नैतिक जिम्मेदारी लेकर ट्रस्ट के लोग इस्तीफा देते। इनमें से कुछ भी नहीं हुआ। उलटे दो लोगों ने इस्तीफा दिया तो ट्रस्ट उनको उत्तरदायी ठहराने की बजाय उनका अभिनंदन कर रहा है और उनके योगदान को याद कर रहा है। इससे भी जाहिर होता है कि सब वहां की भव्य व्यवस्था से आसक्त हैं, जहां लाखों, करोड़ों का चढ़ावा आता है और देश भर के भक्त आते हैं, जिनमें ढेर सारे वीआईपी होते हैं। उनकी सेवा करने और मेवा खाने का अवसर भी मिलता है। इसलिए सब कुछ पहले जैसा ही चलते रहने की संभावना है।
