विपक्षी पार्टियों ने दिल्ली के रामलीला मैदान में जिस एकजुटता का परिचय दिया है उसकी पहली परीक्षा अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में होने वाली है। यह परीक्षा विपक्ष की साझा राजनीतिक ताकत और उसके बनाए नैरेटिव दोनों की है। हालांकि रामलीला मैदान में जिन 20 पार्टियों के नेता इकट्ठा हुए उसमें बसपा और आम आदमी पार्टी शामिल नहीं हैं। अगले साल के चुनाव में इन दो पार्टियों की भूमिका बड़ी होने वाली है। अगले साल सात राज्यों के चुनाव हैं। फरवरी में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में चुनाव होगा तो नवंबर में हिमाचल प्रदेश और गुजरात में विधानसभा के चुनाव हैं।
ये चुनाव विपक्ष और भाजपा दोनों के लिए बहुत अहम हैं। लोकसभा चुनाव 2024 में विपक्षी पार्टियों ने भाजपा को जो झटका दिया था, भाजपा उससे उबर चुकी है। महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में एनडीए की जीत ने लोकसभा चुनाव के खराब प्रदर्शन के असर को समाप्त कर दिया है। झारखंड इकलौता राज्य है, जहां भाजपा का विजय रथ रूका। केरल और तमिलनाडु में भाजपा मुख्य मुकाबले में नहीं थी।
अगले साल जिन सात राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं वहां सभी राज्यों में भाजपा मुख्य मुकाबले में है। पांच राज्यों में तो उसकी सरकार है। इनमें से मणिपुर छोड़ दें तो चार राज्य ऐसे हैं, जहां भाजपा लगातार कम से कम दो बार से जीत रही है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में 10 साल से तो गोवा में 15 साल से और गुजरात में 30 साल से भाजपा की सरकार है। सो, निश्चित रूप से उसके सामने अपनी सरकारें बचाए रखने की चुनौती है। दूसरी ओर उत्तर प्रदेश छोड़ दें तो बाकी छह राज्यों में कांग्रेस भी सीधे मुकाबले में है। इस लिहाज से कांग्रेस को भी अपनी शक्ति दिखानी है। कांग्रेस जीतेगी तभी दूसरी विपक्षी पार्टियां आगे के लिए उसके नेतृत्व को स्वीकार करेंगी।
परंतु मुश्किल यह है कि उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश छोड़ कर बाकी राज्यों आमने सामने का मुकाबला नहीं दिख रहा है। इन राज्यों में भाजपा और विपक्षी गठबंधन के अलावा कोई न कोई तीसरी ताकत है। भाजपा को पहले भी इसका लाभ मिलता रहा है। अगले साल के चुनावों में विपक्षी गठबंधन की मुख्य चुनौती बहुजन समाज पार्टी और आम आदमी पार्टी की वजह से है। ये दोनों पार्टियां विपक्षी गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। सबसे पहले अगर सबसे महत्वपूर्ण राज्य उत्तर प्रदेश की चर्चा करें तो वहां लड़ाई स्पष्ट रूप से त्रिकोणात्मक है। बहुजन समाज पार्टी कितनी भी कमजोर हो गई हो लेकिन उसके राजनीतिक असर को नकारा नहीं जा सकता है। वह हर हाल में 10 फीसदी वोट हासिल करने वाली पार्टी है।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में करीब 20 फीसदी दलित वोट हैं, जिसमें आधे से ज्यादा वोट जाटव समाज का है। यह समाज आज भी भावनात्मक रूप से मायावती और उनकी पार्टी से जुड़ा है। आजाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर इस वोट में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं और कांग्रेस ने भी इसी समाज के राजेंद्र पाल गौतम को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया है। लेकिन इस वोट में बिखराव मुश्किल दिख रहा है।
एक मजबूत वोट आधार वाली पार्टी के तीसरी ताकत के तौर पर मौजूदगी का असर चुनाव नतीजों पर होता है। एक समय ब्राह्मण और मुस्लिम दोनों बसपा के साथ रहे हैं। इसलिए कई क्षेत्रों में मायावती के ब्राह्मण व मुस्लिम उम्मीदवारों को अगर दलित समाज का वोट मिलता है तो उसका नतीजों पर सीधा असर होता है। तभी सपा और कांग्रेस के मिल कर लड़ने के बावजूद त्रिकोणात्मक मुकाबले में भाजपा मजबूत दिखाई देती है।
गठबंधन के लिए अच्छी बात यह है कि बसपा को अब भाजपा विरोधी ताकत के तौर पर नहीं देखा जाता है। इसलिए वह भाजपा विरोधी वोट नहीं ले सकती है। वह वोट पूरी तरह से सपा और कांग्रेस गठबंधन को जाएगा। फिर भी सामाजिक समीकऱण के आधार पर मायावती के उम्मीदवार जो भी वोट लेंगे उसका नुकसान गठबंधन को हो सकता है। विपक्षी गठबंधन की कोशिश हर सीट पर विपक्ष का एक उम्मीदवार देने की है। लेकिन वह यूपी में संभव नहीं है। हालांकि लोकसभा में भी ऐसा नहीं हुआ था फिर भी सपा और कांग्रेस ने 43 सीटें जीत ली थीं। विधानसभा चुनाव में वह प्रदर्शन दोहराने के मामले में बसपा सबसे बड़ी बाधा होगी।
ऐसे ही पंजाब में विपक्ष का गठबंधन नहीं है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होना है, जिसमें भाजपा बड़ी तेजी से तीसरी ताकत के तौर पर उभर रही है। वह अपनी ताकत बढ़ा कर अकाली दल के साथ बड़े भाई के रूप में गठबंधन करना चाहती है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा एक भी सीट नहीं जीत पाई थी लेकिन उसे 18 फीसदी वोट मिले थे। पंजाब में सत्तारूढ़ आप और मुख्य विपक्षी कांग्रेस के साथ साथ भाजपा व अकाली दल और अमृतपाल की पार्टी भी है। बड़ा सवाल यह है कि बहुकोणीय मुकाबले का लाभ किसको मिलेगा? क्या आप या कांग्रेस में से कोई बहुमत हासिल कर पाएगा या त्रिशंकु विधानसभा बनेगी?
गोवा और गुजरात में कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती आम आदमी पार्टी है। पिछले चुनाव में गुजरात में कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी भी नहीं बन पाई। उसने 50 साल में सबसे खराब प्रदर्शन किया तो उसके पीछे आम आदमी पार्टी ही कारण बनी। आप को 13 फीसदी वोट मिले, जो सीधे कांग्रेस से टूट कर गए। ऐसे ही गोवा में पिछली बार आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने 13 फीसदी के करीब वोट हासिल किए थे, जो सीधे कांग्रेस के खाते से गए थे। इस बार तृणमूल कांग्रेस तो विपक्षी गठबंधन के साथ है लेकिन आम आदमी पार्टी साथ नहीं आ सकती है। पंजाब और गोवा का चुनाव साथ ही होगा। इसलिए वह कांग्रेस के साथ दिखने का जोखिम नहीं ले सकती है। उसने वहां गोवा फॉरवर्ड पार्टी के साथ तालमेल किया है। पंजाब और गोवा में तो कांग्रेस और आप एक दूसरे से लड़ेंगे। लेकिन गुजरात का चुनाव साल के अंत में है तो वहां विपक्षी एकता बनने की उम्मीद की जा सकती है।
अगले साल के चुनावों में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश दो ऐसे राज्य हैं, जहां भाजपा और कांग्रेस का सीधा मुकाबला होगा। वहां छोटी पार्टियां हैं भी तो उनका कोई असर नहीं है। गौरतलब है कि उत्तराखंड में पांच साल में सत्ता बदलने का रिवाज था, जिसे पिछली बार भाजपा ने बदल दिया। वह लगातार दूसरी बार जीत गई। लेकिन हिमाचल प्रदेश में भाजपा यह रिवाज नहीं बदल सकी। उसने राज नहीं रिवाज बदलिए का नारा दिया था। लेकिन लोगों ने रिवाज नहीं बदला।
बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार कांग्रेस पांच साल में सत्ता बदलने का रिवाज बदल देगी? कांग्रेस के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को सर्वाइवर माना जाता है। उत्तराखंड में भाजपा के खिलाफ 10 साल की एंटी इनकम्बैंसी और हिमाचल में सुक्खू के कारण कांग्रेस भरोसे में है। अगर वह अपने दम पर चुनाव जीतती है तो गठबंधन के अंदर उसकी स्थिति मजबूत होगी।
