इन दिनों पढ़ाई औऱ परीक्षा के बुरे दिन चल रहे हैं। प्राथमिक विद्यालयों से लेकर उच्च शिक्षण संस्थानों तक शिक्षा की गुणवत्ता गिर गई है और बोर्ड परीक्षा से लेकर दाखिले व नौकरी के लिए होने वाली प्रतियोगिता परीक्षाओं पर संकट है। अगर पढ़ाई की बात करें तो कोविड महामारी के बाद हुए कई सर्वेक्षणों से पता चला कि बच्चों के सीखने की प्रक्रिया यानी लर्निंग प्रोसेस में गड़बड़ी हुई है। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की स्थिति यह है कि छठी या सातवीं के बच्चे हिंदी की 10 पंक्तियों का शुद्ध पाठ नहीं कर पाते हैं। अपने दर्जे से कई क्लास नीचे के गणित के सवाल हल नहीं कर पाते हैं।
दूसरी ओर उच्च शिक्षा का हाल यह है कि पांच साल तक एमबीबीएस की पढ़ाई करने के बाद डॉक्टर लोग एमडी की डिग्री के लिए नीट पीजी की परीक्षा देते हैं तो उनको माइनस 40 तक मार्क्स आ रहे हैं। दो सौ सवाल और आठ सौ अंकों की परीक्षा में इस साल काउंसिलिंग के लिए क्वालिफाइंग परसेंटाइल शून्य कर दिया गया था। चार अंक लाने वालों का तो मेडिकल कॉलेज में दाखिला हुआ, एमडी की पढ़ाई के लिए। समझ सकते हैं कि प्राथमिक कक्षाओं से लेकर मेडिकल की पढ़ाई तक की क्या स्थिति है।
पढ़ाई के साथ साथ परीक्षा के भी बुरे दिन चल रहे हैं। इस साल हुई तीन परीक्षाओं में हुई ग़डबड़ी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार किस तरह से परीक्षा को तदर्थ ढंग से ले रही है और उसका कितना बड़ा नुकसान किशोर व युवा उम्र के छात्रों को भुगतना पड़ रहा है। सबसे ताजा मामला सीबीएसई की 12वीं की परीक्षा का है। इस बार सीबीएसई ने कॉपी जांचने के लिए ऑन स्क्रीन मार्किंग यानी ओएसएम पद्धति अपनाई। इसके तहत 17 लाख से ज्यादा छात्रों की कॉपियों के लाखों पन्ने स्कैन किए गए और उन्हें सिस्टम पर अपलोड किया गया और जांचने वालों ने स्क्रीन पर उन स्कैन की गई कॉपियों को देख कर मार्किंग की।
इतना ही नहीं इस बार ऑन स्क्रीन मार्किंग के साथ साथ मार्किंग के तरीके में भी बदलाव किया गया। पता नहीं किस भावना के तहत यह तय किया गया कि इस बार कॉपी जांचने में सख्ती होगी और मामूली गड़बड़ी पर भी नंबर काटे जाएंगे। जैसे किसी छात्र ने आठ की बजाय छह स्टेप में गणित का सवाल हल कर दिया या सभी स्टेप सही हैं परंतु जवाब में गड़बड़ी है या जवाब सही है और स्टेप्स ठीक नहीं हैं तो उनको बहुत कम अंक मिलें हैं। पहले शिक्षक इसमें थोड़ा लचीला रुख रखते थे। इस बार ऐसा नहीं है। इसको अकादमिक फैसला मान कर स्वीकार किया जा सकता है। माना जा सकता है कि अब सीबीएसई बहुत शुद्धतावादी और कट्टर रुख रखेगा।
परंतु इसके अलावा जो गड़बड़ियां हुई हैं वह व्यवस्थागत हैं। मिसाल के तौर पर लाखों पन्नों को स्कैन करके उन्हें अपलोड करते समय बहुत तरह की गड़बड़ी हुई। कई छात्रों की कॉपी का पहला पन्ना तो उनका था परंतु बाकी पन्ने दूसरे छात्र की कॉपी के थे। कई छात्रों की कॉपी के एक ही पन्ने कई बार अपलोड हो गए थे और कई पन्ने छूट गए थे। कई छात्रों की कॉपी के पन्ने ठीक तरह से स्कैन नहीं हुए और धुंधली कॉपी ही अपलोड कर दी गई। इन सारी गड़बड़ियों के बीच शिक्षकों ने पूरी सख्ती से कॉपी जांची। नतीजे आए तो बच्चों और अभिभावकों के हाथ पांव फूल गए।
हजारों बच्चे ऐसे थे, जिन्होंने इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए जेईई मेन्स की परीक्षा में 85 या 90 या उससे ज्यादा पर्सेंटाइल हासिल किया है और जेईई एडवांस के लिए क्वालिफाई कर गए लेकिन 12वीं में 75 फीसदी अंक नहीं आए, जिसकी वजह से वे आईआईटी में दाखिला के लिए जेईई एडवांस की परीक्षा नहीं दे सकेंगे। उनकी दूसरी मुश्किल यह है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों के अच्छे कॉलेजों में दाखिला लेने के लिए सीयूईटी की परीक्षा होती है। उसमें पर्सेंटाइल टाई होने पर 12वीं के अंक के आधार पर दाखिले में प्राथमिकता मिलती है।
तभी 12वीं बोर्ड की परीक्षा देने वाले छात्रों में से 25 फीसदी यानी चार लाख से ज्यादा छात्रों ने पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन किया। परंतु वह काम उनके लिए दुःस्वप्न की तरह था। कई दिन तक पुनर्मूल्यांकन के आवेदन के लिए बनी वेबसाइट क्रैश होती रही। पहले तो छात्रों को उसका लिंक नहीं मिला। उन्हें सीबीएसई के ट्विट से लिंक खोलना पड़ रहा था। उसके बाद रजिस्ट्रेशन कराने और फीस जमा कराने के बीच साइट क्रैश हो रही थी। ऑनलाइन आवेदन के समय कई छात्रों से बहुत ज्यादा फीस मांगी गई, जिसे लेकर बोर्ड ने कहा कि उनकी साइट हैक कर ली गई थी। अब बच्चों के पैसे लौटाने की प्रक्रिया चल रही है।
आग का दरिया पार करने जैसा काम करके बच्चों ने आवेदन कर दिया और जब कॉपी हाथ में आई तो पता चला कि उनके नाम के साथ दूसरे की कॉपी अपलोड कर दी गई है या खराब ढंग से स्कैन की गई कॉपी अपलोड की गई है या सही जवाब को भी गलत बता कर नंबर काट दिए गए हैं। सोचें, यह सारी तकलीफें जिन बच्चों से झेली है वे 17 या 18 साल के किशोर हैं। उनके कोमल मन पर हुए असर का सिर्फ अनुमान किया जा सकता है। हैरानी की बात है कि ओएसएम की पूरी प्रक्रिया बिना पायलट प्रोजेक्ट के शुरू की गई। शिक्षकों को कहा गया कि वे काम करते हुए सीखें यानी इस बैच के बच्चों को प्रयोग के लिए गिनी पिग बना दिया गया।
इससे पहले मेडिकल में दाखिले के लिए नीट की परीक्षा हुई। तीन मई को परीक्षा हुई और अगले दिन पता चल गया कि पेपर लीक हो गया था। कई दिन की जांच के बाद नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यानी एनटीए ने परीक्षा रद्द कर दी। इसके बावजूद जब एनटीए के चेयरमैन और डीजी की पेशी संसदीय समिति के सामने हुई तो उन्होंने कहा कि उनके सिस्टम से पेपर लीक नहीं हुआ। सोचें, प्रश्न पत्र तैयार करने वाले लोग पेपर लीक में शामिल थे और सीबीआई ने उनको गिरफ्तार किया है। पर एनटीए के अधिकारी कह रहे हैं कि उनके सिस्टम से पेपर लीक नहीं हुआ। क्या प्रश्न पत्र तैयार करने वाले लोग एनटीए के सिस्टम के नहीं थे? असल में नीट यूजी परीक्षा की पूरी व्यवस्था ही तदर्थ है और ठेके पर चल रही है। अब 21 जून को फिर लाखों छात्र नए सिरे से परीक्षा देंगे। ये करीब 23 लाख छात्र भी किशोर व युवा उम्र के हैं और उनके मन पर क्या बीत रही होगी इसका भी अंदाजा लगाया जा सकता है।
तीसरी परीक्षा यूपीएससी की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा है। रविवार, 24 मई को इसकी प्रारंभिक परीक्षा हुई। इसमें ऐसे सवाल पूछे गए हैं, जिससे सब हैरान हैं। कई सवाल तो ऐसे हैं, जिनको देख कर लग रहा है कि रट्टा मार कर पढ़ाई करने वालों को चुनने के लिए ये सवाल तैयार किए गए हैं। कई सवाल तो पूरे के पूरे पन्ने के हैं और उनके विकल्पों को देख कर लग रहा है कि किसी ने इतना लंबा सवाल लिख कर विकल्प तैयार करने में दिमाग नहीं लगाया। कहा जा रहा है कि कोचिंग सेंटर वाले जैसी पढ़ाई कराते हैं उससे अलग सवाल पूछा गया ताकि बच्चों का कोचिंग से मोहभंग हो। क्या इससे भी मूर्खतापूर्ण कोई तर्क हो सकता है? क्या यूपीएससी को पता नहीं है कि जैसा सवाल पूछा जाएगा, कोचिंग वाले वैसी पढ़ाई कराने लगेंगे? क्या उसे यह पता नहीं है कि आईएएस, आईपीएस बनने के लिए छात्र कोचिंग करेंगे ही, चाहे कुछ भी हो जाए?
बहरहाल, पढ़ाई और परीक्षाओं को लेकर जिस तरह की घटनाएं हो रही हैं वह सरकार के तदर्थ रवैए को दिखाती हैं। ऐसा लग रहा है कि सरकार को इनकी परवाह नहीं है। ऐसी मानसिकता दिख रही है कि शिक्षा की गुणवत्ता गिरती है तो गिर जाए और परीक्षा में गड़बड़ियां होती हैं तो हो जाए। न तो स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय और न परीक्षा कराने वाली एजेंसियां संरचनागत कमियों को समझ रही हैं और न उन्हें दूर करने की कोशिश कर रही हैं।
ऐसा लग रहा है कि किशोरों और युवाओं को पढ़ाई और परीक्षा से विरक्त करने का प्रयास चल रहा है। शिक्षकों की नियुक्ति में योग्यता और प्रशिक्षण की बजाय निष्ठा देखी जा रही है। एक खास विचारधारा और किसी खास भाई साहेब के करीबी होने के आधार पर नियुक्तियां हो रही हैं। शिक्षा मंत्री की नियुक्ति भी इस आधार पर है कि वे बहुत कर्मठ राजनीतिक कार्यकर्ता हैं और चुनाव प्रबंधन में उनका जवाब नहीं है। उनको जहां भेजा जाता है वहां पार्टी चुनाव जीतती है। कायदे से शिक्षा जैसा मंत्रालय किसी ऐसे व्यक्ति को मिलना चाहिए, जो शिक्षा के बारे में जानता हो, नई प्रवृत्तियों से परिचित हो और जिसकी प्रतिबद्धता देश का भविष्य गढ़ने के लिए हो।
