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राहुल का साथ देगा विपक्ष

यह बात पक्के तौर पर नहीं कही जा सकती है कि सभी विपक्षी पार्टियां कांग्रेस और राहुल गांधी का साथ देंगी। लेकिन अभी जो हालात दिख रहे हैं उसमें लग रहा है कि राहुल के प्रति सद्भाव बढ़ा है। कांग्रेस के साथ विपक्ष की दूसरी पार्टियों के संबंधों में संशय का कारण यह है कि खुद विपक्षी पार्टियों के नेता अलग अलग सिगनल देते रहते हैं। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव छह अक्टूबर को निर्वाचन सदन के घेराव के कार्यक्रम में खोए खोए से दिख रहे थे। वे प्रदर्शन में शामिल तो हुए लेकिन राहुल से दूर दूर रहे। बाद में जब राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा आकाशवाणी भवन में धरने पर बैठ गए तो अखिलेश वहां से चले गए। इसी तरह तेजस्वी यादव एक प्रदर्शन में शामिल हुए तो दूसरे में नदारद रहे। सीपीएम के महासचिव एमए बेबी कांग्रेस से ज्यादा आम आदमी पार्टी और कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शनों को सफल बनाने में मेहनत कर रहे थे। परंतु 10 और 11 अक्टूबर के कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बाद जब 12 अक्टूबर को राहुल गांधी ने ‘चलो दिल्ली मार्च’ के लिए बुलाया और सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया तो सभी विपक्षी नेता न सिर्फ उसमें शामिल हुए, बल्कि बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया।

राहुल गांधी जिस ट्रक पर सवार थे, उस पर अखिलेश यादव और तेजस्वी यादव के साथ एमए बेबी भी थे। सीपीआई एमएल के छात्र संगठन आईसा की नेता और हाल के दिनों में छात्र राजनीति का सबसे चर्चित चेहरा रहीं नेहा बोरा भी ट्रक पर थीं। सब हाथ हिला कर जनता का अभिवादन कर रहे थे। ममता बनर्जी उस ट्रक पर इसलिए नहीं दिखाई दीं क्योंकि शाम साढ़े पांच बजे उनकी फ्लाइट थी कोलकाता की। कांग्रेस ने प्रयास किया था कि ट्रक पर राहुल के साथ ममता बनर्जी और अखिलेश यादव दोनों साथ दिखें लेकिन यह संभव नहीं हो पाया क्योंकि अखिलेश यादव की फ्लाइट ढाई बजे दिल्ली पहुंची। वे जब तक प्रदर्शन में शामिल होने पहुंचते तब तक ममता बनर्जी निकल गई थीं। लेकिन इस बार यह स्पष्ट था कि दोनों बड़ी विपक्षी पार्टियों, सपा और तृणमूल के सबसे बड़े नेता कांग्रेस और राहुल के साथ प्रदर्शन में शामिल हुए। दोनों पार्टियों के अन्य नेता व कार्यकर्ता भी प्रदर्शन में शामिल हुए और इसे सफल बनाने के लिए काम किया।

हो सकता है कि कांग्रेस और राहुल गांधी से थोड़ी दूरी, थोड़ी नजदीकी दिखाने की राजनीति आगे भी चलती रहे। लेकिन अब देश के राजनीतिक हालात जैसे बन रहे हैं और उसमें राहुल गांधी जो भूमिका निभा रहे हैं उसे सभी विपक्षी पार्टियां स्वीकार करने को तैयार दिख रही हैं। इसके कुछ कारण बहुत स्पष्ट हैं।

पहला कारण तो यह है कि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से भाजपा के विकल्प के तौर पर मुख्य विरोधी पार्टी के रूप में कांग्रेस ज्यादा मजबूती से स्थापित हुई है। उससे पहले के दो चुनावों में कांग्रेस और कई अन्य प्रादेशिक पार्टियों के लोकसभा सांसदों की संख्या में बहुत कम अंतर रह गया था। 2014 में कांग्रेस ने 44 सीटें जीती थीं और तृणमूल कांग्रेस को 33 सीटें मिली थीं। य़ह स्थिति 2019 में थोड़ी बदली लेकिन कई विपक्षी पार्टिय़ां अपने को कांग्रेस के विकल्प के रूप में देखने लगी थीं। उसके बाद एक समय ऐसा था, जब कांग्रेस तीन राज्यों में सरकार में थी और आम आदमी पार्टी दो राज्यों में। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अब कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियों में फासला बहुत हो गया है। कांग्रेस चार राज्यों में सरकार में है और उसके एक सौ लोकसभा सांसद हैं।

दूसरा कारण यह है कि आम भारतीय नागरिकों का रूझान कांग्रेस की ओर दिख रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर कांग्रेस को पसंद करने वालों की संख्या बढ़ रही है। ऐसा लग रहा है कि भाजपा विरोधी मतदाता समूहों ने इस सचाई को स्वीकार कर लिया है कि अखिल भारतीय स्तर पर कांग्रेस ही भाजपा से लड़ सकती है। इसलिए भले प्रादेशिक राजनीति में वे क्षेत्रीय पार्टियों को पसंद करें लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में उनकी पसंद कांग्रेस है। क्षेत्रीय पार्टियों के लिए इसका संदेश यह है कि वे कांग्रेस के साथ रहें। प्रादेशिक पार्टियां मतदाताओं की इस इच्छा को समझ रही हैं। कांग्रेस भी इसको समझ रही है लेकिन मुश्किल यह है कि उसको लग रहा है कि मतदाताओं की इस इच्छा के दम पर वह प्रादेशिक पार्टियों को दबा कर मनमाने तरीके से समझौता कर सकती है। अपनी इच्छा उन पर आरोपित कर सकती है। कांग्रेस को इससे बचना होगा।

तीसरा कारण यह है कि राहुल गांधी के प्रति आम मतदाताओं के मन में नकारात्मकता कम हुई है। हालांकि भाजपा का अपना तंत्र और सोशल मीडिया का राइटविंग इकोसिस्टम राहुल को पहले जैसा ही टारगेट कर रहा है लेकिन उसकी धार कमजोर हो गई है। उनकी बातों को ऐसे लोगों ने कम महत्व देना शुरू कर दिया है, जो भाजपा के हार्डकोर समर्थक नहीं हैं। यानी तटस्थ समूहों में राहुल की स्वीकार्यता बढ़ी है। इसमें कांग्रेस के अपने तंत्र और कांग्रेस व लेफ्ट के इकोसिस्टम का भी योगदान है। इसके जरिए यह बात लोगों के दिल दिमाग में बैठाई गई है कि अर्थव्यवस्था से लेकर विदेश नीति तक राहुल गांधी जो आशंका जताते रहे हैं वह सही साबित हो रही है। भाजपा और उसके तंत्र ने पहले राहुल को ‘पप्पू’ के रूप में स्थापित किया लेकिन अब उनको शातिर, देश विरोधी और बाहरी ताकतों से संचालित होने वाला बता रहे हैं। लोगों के लिए यह समझना मुश्किल नहीं है कि ये दोनों चीजें एक साथ नहीं हो सकतीं। वे ‘पप्पू’ होंगे या ‘शातिर’ होंगे। सो, राहुल की छवि बिगाड़ने के अभियान की सचाई भी काफी हद तक सामने आ गई है।

चौथा कारण राहुल की सामने से टकराने वाली राजनीतिक शैली है। इस शैली के गुणदोष पर चर्चा करने की जरुरत नहीं है। इसमें निश्चित रूप से कमियां हैं। लेकिन इस शैली से लोगों के मन में खास कर भाजपा विरोधी और तटस्थ समूहों में राहुल एक ऐसे साहसी नेता के रूप में स्थापित हुए हैं, जो सरकार से नहीं डरता है। इससे लोग यह भी मानने लगे हैं कि राहुल का दामन पाक साफ है इसलिए वे सरकार से टकराव लेने में नहीं घबरा रहे हैं। लोगों ने देखा है कि कैसे कांग्रेस के नेता तोड़े गए और जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे उनको भी भाजपा में शामिल करा कर उच्च पद दिया गया। इससे भाजपा का अपना ग्राफ नीचे गया है। भाजपा का ग्राफ नीचे जाने का सीधा फायदा कांग्रेस को है। चुनावी राजनीति में भाजपा अब भी आगे है लेकिन जिस अनुपात में उसका ग्राफ गिर रहा उसी अनुपात में कांग्रेस का बढ़ रहा है।

पांचवां कारण यह है कि कांग्रेस बहुत सिमटने के बावजूद वास्तविक अर्थों में अखिल भारतीय पार्टी है। उसके पास देश के हर हिस्से में संगठन है, नेता हैं और अखिल भारतीय राजनीति करने के लिए संसाधन व सलाहियात हैं। इसलिए अगर किसी खास मतदाता समूह को भाजपा को हराना है तो स्वाभाविक रूप से उसकी पहली पसंद कांग्रेस पार्टी है। राहुल ने सोमवार को अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में दो शब्दों ‘पेशेंस’ और ‘परसिवियरेंस’ का जिक्र किया। ये दो शब्द उनकी राजनीति को परिभाषित करने वाले हैं। वे 22 साल से लोकसभा सांसद हैं और 12 साल से विपक्ष की राजनीति कर रहे हैं। उनके धैर्य, निरंतरता और दृढ़ता ने उनको एक ताकत दी है और इस मुकाम तक पहुंचाया है, जहां वे अपने को विकल्प के तौर पर पेश कर सकते हैं। विपक्षी पार्टियां भी इस बात को समझ रही हैं।

अंत में तात्कालिक घटनाक्रम का भी इसमें योगदान है। कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी के रूप में एक नए विपक्ष को उभारने की राजनीति को भी विपक्षी पार्टियां समझ रही हैं। युवाओं के प्रतिनिधि के तौर पर सीजेपी की भूमिका पहले सभी पार्टियों ने देखी। लेकिन हर मुद्दे पर उनकी सक्रियता और पारंपरिक विपक्ष से अलग चलने का उनका रवैया संदेह पैदा करता है। इसलिए भी विपक्षी पार्टियां कांग्रेस के आसपास इकट्ठा हो रही हैं। अगर कांग्रेस ढंग से उनके साथ बरताव करे और एक लक्ष्य पऱ ध्यान केंद्रित करे तो आगे बहुत दिलचस्प राजनीति देखने को मिलेगी।

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