Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

चुनाव खर्च का नियम बदलना चाहिए

देश में इन दिनों चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सबसे ज्यादा सवाल उठ रहे हैं और उसके खिलाफ प्रदर्शन भी हो रहे हैं। विपक्षी पार्टियां चुनाव आयोग और उसमें भी खासतौर से मुख्य चुनाव आयुक्त के रवैए को पक्षपातपूर्ण बता कर हाल के चुनावों की वैधता पर सवाल उठा रही है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई चल रही है। सर्वोच्च अदालत की सुनवाई और विपक्ष के प्रदर्शन से क्या निकलेगा यह बाद में पता चलेगा। लेकिन भारत में चुनावों को स्वतंत्र और निष्पक्ष बनाने के लिए कुछ ऐसे सुधार, जिनको जितनी जल्दी लागू किया जाए, उतना अच्छा होगा। इनमें सबसे पहली और सबसे बड़ी जरुरत है चुनाव खर्च के नियमों को तर्कसंगत बनाने की। मौजूदा नियम पूरी तरह से सत्तारूढ़ दल और अन्य बड़ी पार्टियों को हितों को पूरा करने वाले हैं।

इस बात को हाल में चुनाव आयोग की ओर से सार्वजनिक किए गए एक आंकड़ें से समझा जा सकता है। चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने 286 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा की 294 सीटें हैं। इसका अर्थ है कि भाजपा ने प्रति सीट करीब एक करोड़ रुपया खर्च किया है। यह कितना हास्यास्पद है या कैसी विडम्बना है कि चुनाव आयोग ने तय किया है कि विधानसभा चुनाव में एक उम्मीदवार 40 लाख रुपए से ज्यादा खर्च नहीं कर सकता है। अगर उम्मीदवार इससे ज्यादा खर्च करता है तो उसका चुनाव रद्द किया जा सकता है। हालांकि यह भी लोगों की आंख में धूल झोंकने वाला ही नियम है क्योंकि सबको पता है कि गंभीरता से चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार का खर्च इससे ज्यादा होता है।

कह सकते हैं कि बेइमानियों की शुरुआत यही से होती है। हर गंभीर उम्मीदवार को बाध्य किया जाता है कि वह सीमा के अंदर खर्च दिखाने के लिए झूठ बोले, फर्जी बिल बनवाए और पूरी तरह से झूठा हलफनामा देकर 40 लाख से कम खर्च करने के नियम का पालन होते दिखाए। हो सकता है कि कुछ अपवाद हों और कुछ गंभीर उम्मीदवार इससे कम खर्च में चुनाव लड़ लेते हों लेकिन वास्तविकता यह है कि जो लोग मुख्य मुकाबले में होते हैं वे इससे कई गुना ज्यादा खर्च करते हैं। लेकिन अगर उनका हलफनामा उठा कर देखें तो कमाल के आंकड़े दिखाए देंगे। एक राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ने तो एक बार सिर्फ कुछ हजार रुपए में चुनाव लड़ने का हलफनामा दायर कर दिया था। बाद में यह मामला अदालत में भी पहुंचा था।

अगर किसी तरह से 40 लाख के खर्च की सीमा को स्वीकार कर लिया जाए तब भी पार्टियों के खर्च का क्या होगा? मौजूदा नियम के मुताबिक पार्टियों का खर्च उम्मीदवार के खर्च में नहीं जुड़ता है। ऐसे ही पार्टियों के स्टार प्रचारकों की रैलियों और रोड शो आदि का खर्च भी उम्मीदवार के खर्च में नहीं जुड़ता है। इसका अर्थ है कि अगर पार्टी के पास फंड है तो वह एक विधानसभा सीट पर एक करोड़ या उससे ज्यादा भी खर्च कर सकती है। इसे बंगाल के उदाहरण से ही समझ सकते हैं। बंगाल में अगर भाजपा के एक उम्मीदवार ने तय सीमा के मुताबिक 40 लाख रुपए खर्च किए तो उसमें पार्टी का खर्च जोड़ने पर औसतन एक करोड़ 40 लाख रुपया प्रति सीट का खर्च बैठता है। अगर यह माना जाए कि भाजपा ने 286 करोड़ रुपए खर्च करने का जो आंकड़ा दिया है उसमें उम्मीदवार का खर्च भी शामिल है तब भी प्रति सीट एक करोड़ रुपए का खर्च तय सीमा से ढाई गुना ज्यादा बैठेगा। जाहिर है पार्टियों को बेहिसाब खर्च करने की अनुमति देने का नियम छोटी पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए चुनाव लड़ना मुश्किल बनाता है, जबकि लोकतंत्र में स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की पहली शर्त लेवल प्लेइंग फील्ड यानी सबको बराबरी का मैदान सुनिश्चित करना होता है। इस नियम के चलते मुकाबला बहुत गैरबराबरी का हो जाता है।

चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक मई में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में हुए खर्च के बाद भाजपा के खाते में सात हजार करोड़ रुपए से ज्यादा बचे हैं। इन पांच राज्यों के चुनाव के लिए उसे 14 सौ करोड़ रुपए से ज्यादा का चंदा मिला था। जाहिर है सत्ता में होने के चलते उसे बेहिसाब चंदा मिलता है और नियम ऐसे हैं कि वह बेहिसाब खर्च कर सकती है। ऐसे में दूसरी पार्टियां खास कर छोटी प्रादेशिक पार्टियां या निर्दलीय उम्मीदवार कैसे चुनाव लड़ेंगे? मौजूदा समय में जब प्रचार के नए साधन आ गए हैं और विचारधारा के लिए समर्पित कार्यकर्ता भी बिना भुगतान के प्रचार में नहीं निकलते हैं तब छोटी पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों के पास चुनाव लड़ने के लिए संसाधन कहां से आएंगे?

बरसों से भारत में इस बात की चर्चा हो रही है कि सरकार चुनाव का खर्च उठाए। विचार के तौर पर यह नियम ठीक है लेकिन समस्या यह है कि अगर सरकार भी पैसा दे तो खूब पैसे वाली पार्टी या उम्मीदवार को अतिरिक्त खर्च करने से कैसे रोका जाएगा? इस बात की पूरी संभावना रहेगी कि सरकार से सीमा के बराबर पैसे लेकर उम्मीदवार खुद और उसकी पार्टी अलग से भारी भरकम खर्च करे। इसलिए उम्मीदवारों को सरकार से पैसे दिलाने की बजाय चुनाव खर्च को नियंत्रित करने के नियमों पर विचार करने की जरुरत है। यह इसलिए जरूरी है क्योंकि चुनाव आय़ोग को पता है कि मुख्य मुकाबले वाले ज्यादातर उम्मीदवार सीमा से कई गुना ज्यादा खर्च करते हैं, सरकारों को पता है, पार्टियां जानती हैं, अदालतों को पता है और स्वतंत्र संस्थाएं हर चुनाव के बाद बताती हैं कि सीमा से कितना ज्यादा खर्च हुआ है, इसके बावजूद यह हिप्पोक्रेसी जारी है। चुनाव आयोग या तो यह सुनिश्चित करे उसकी ओर से तय की गई सीमा से ज्यादा कोई खर्च नहीं कर पाए या फिर खर्च की सीमा वाली हिप्पोक्रेसी को खत्म करे।

Exit mobile version