पिछले वित्त वर्ष 2025-26 के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के आंकड़े बहुत अच्छे रहे। देश की अर्थव्यस्था 7.7 फीसदी की रफ्तार से बढ़ी। वित्त वर्ष की आखिरी तिमाही यानी जनवरी से मार्च के महीने में विकास की दर 7.8 फीसदी रही। ध्यान रह इस तिमाही का आखिरी महीना यानी मार्च का महीना पश्चिम एशिया की जंग वाला था। अमेरिका और इजराइल ने 28 फरवरी को ईरान के ऊपर हमला किया था और पूरे मार्च महीने में भीषण जंग चल रही थी। मार्च के महीने में होर्मुज की खाड़ी पूरी तरह से बंद थी, जिसकी वजह से भारत को कच्चा तेल और अपनी ऊर्जा जरुरत पूरा करने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ रही थी। गैस की आपूर्ति खासतौर से प्रभावित हुई थी, जिसका असर आर्थिक गतिविधियों पर पड़ा। फिर भी 7.8 फीसदी की विकास दर काफी प्रभावशाली कही जाएगी।
तभी सवाल है कि क्या जीडीपी के 7.7 फीसदी के आंकड़े या आखिरी तिमाही के 7.8 फीसदी के आंकड़ों पर जैसी वाहवाही की जा रही है और साबित किया जा रहा है कि जैसे देश के सामने कोई आर्थिक संकट नहीं है, उसे सही माना जा सकता है? इन आंकड़ों से राजनीतिक नैरेटिव बनाने या उसे प्रभावित करने की कोशिश करना अपनी जगह है। मीडिया की ओर से इसकी तरह तरह की व्याख्या की जा रही है और अर्थव्यवस्था की स्थिति पर सवाल उठाने वालों का मजाक बनाया जा रहा है। वह भी अपनी जगह है। लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि देश के नीति नियंता इस ट्रैप में नहीं फंसेंगे और भले कुछ भी कह रहे हों वास्तविक स्थिति को वस्तुनिष्ठ ढंग से देख रहे होंगे। अगर जीडीपी के इस आंकड़े को ही बारीकी से देखेंगे तो कोई चीजें स्पष्ट हो जाएंगी।
जिस दिन भारत सरकार के सांख्यिकी विभाग ने जीडीपी के आंकड़े जारी किए उसी दिन भारतीय रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष यानी 2026-27 के लिए विकास दर का अनुमान भी जारी किया। इसमें कहा गया कि चालू वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी 6.6 फीसदी की रफ्तार से बढ़ेगी। कई दूसरी संस्थाएं इससे भी कम विकास दर रहने का अनुमान जता रही हैं। फिंच ने 6.4 फीसदी की विकास दर का अनुमान लगाया है। लेकिन अगर रिजर्व बैंक के अनुमान को ही मानें तो विकास दर में पिछले साल के मुकाबले इस साल 1.1 फीसदी की कमी आएगी। अगर भारत की अर्थव्यवस्था चार सौ लाख करोड़ रुपए की ही रहती है तब भी इस आंकड़े हिसाब से चार लाख 40 हजार करोड़ रुपए का कम उत्पादन होगा।
सोचें, यह कितनी बड़ी रकम है। भारत सरकार की मुफ्त अनाज बांटने जैसी कई लोक कल्याण की योजनाओं का बजट साढ़े तीन लाख करोड़ रुपए से कुछ ज्यादा है। यानी उससे ज्यादा की कमी आएगी भारत के सकल घरेलू उत्पादन में। बिहार जैसे बड़े राज्य का सालाना बजट सवा तीन लाख करोड़ रुपए का है। उससे ज्यादा की कमी देश की जीडीपी में आ सकती है। ध्यान रहे कोरोना महामारी के समय मनमोहन सिंह ने दो फीसदी कमी का अनुमान लगाया था, जो सही साबित हआ था और देश को उससे उबरने में कितना समय लगा था यह सब जानते हैं।
अगर पिछले साल के आंकड़ों को भी थोड़ी बारीकी से पढ़ेंगे तो खतरे का संकेत मिलेगा। बताया गया है कि आखिरी तिमाही में विकास दर 7.8 फीसदी रही और इसके आधार पर यह धारणा बनाई गई जैसे भारत की अर्थव्यवस्था पर युद्ध का कोई असर नहीं हुआ। लेकिन ऐसा नहीं है। एक महीने के युद्ध का असर यह हुआ कि भारत की अर्थव्यवस्था अनुमान से कम हो गई। ध्यान रहे उससे पहले वाली तिमाही यानी अक्टूबर से दिसंबर 2025 में विकास दर 8.1 फीसदी रही थी और जनवरी से मार्च का अनुमान भी आठ फीसदी का था। लेकिन वास्तव में जीडीपी बढ़ी 7.8 की रफ्तार से।
इसका अर्थ है कि अनुमान से 0.2 फीसदी और उससे पहले वाली तिमाही से 0.3 फीसदी कम रही जीडीपी बढ़ने की रफ्तार। यह भी ध्यान रखने की बात है कि मार्च का महीना होने के बावजूद ये कमी रही। ध्यान रहे मार्च में क्लीयरिंग होती है, जिससे अर्थव्यवस्था के आंकड़े हमेश ऊंचे रहते हैं। मार्च में भारत सरकार को जीएसटी के मद में अब तक का रिकॉर्ड 2.87 लाख करोड़ रुपए की कमाई हुई थी फिर भी उस तिमाही की जीडीपी सरकारी अनुमान से और पिछली तिमाही से कम रही।
इसी तरह इन आंकड़ों में चिंता की दूसरी बात यह है कि कृषि सेक्टर की विकास दर 4.3 से घट कर 3.5 फीसदी पर आ गया। इस साल सुपर अल नीनो की आशंका को देखते हुए यह चिंता बहुत बड़ी है। ध्यान रहे पिछले साल मानसून सामान्य से बेहतर रहा था। दक्षिण पश्चिम मानसून के समय बारिश 108 फीसदी हुई थी। इसके बावजूद अगर कृषि उत्पादन में कमी आई तो सोच सकते हैं कि इस साल जब सामान्य से कम बारिश की आशंका जताई जा रही है तो क्या हो सकता है। इस साल मौसम विभाग ने 90 फीसदी बारिश की संभावना जताई है।
इसका असर इस साल खरीफ से लेकर अगले साल रबी की फसल पर पड़ेगी। अगर इसमें युद्ध के असर को जोड़ दें तो ज्यादा गंभीर तस्वीर उभरती है।
ध्यान रहे युद्ध की वजह से डीजल की कीमत तो बढ़ी है साथ ही रासायनिक खाद की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी हुई है। उपलब्धता कम है वह अपनी जगह है। ऐसे में देश में सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले सेक्टर में सुस्ती आती है तो उसका असर बड़ा हो सकता है। वैसे भी जीडीपी और जीवीए यानी ग्रॉस वैल्यू एडेड दोनों में कृषि का हिस्सा 20 फीसदी से काफी कम हो गया है और सेवा क्षेत्र का हिस्सा 54 फीसदी के करीब पहुंच गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक वैश्विक बाजार में उर्वरक की कीमतें दोगुनी हुई हैं, जिससे भारत की उर्वरक सब्सिडी इस साल दोगुनी हो सकती है। पिछले साल 1.70 लाख करोड़ रुपए की सब्सिडी थी, जो इस साल 3.40 लाख करोड़ की हो सकती है। बाकी शेयर बाजार, मुद्रा बाजार, मुद्रास्फीति, विदेशी निवेश, व्यापार घाटा आदि की जो स्थिति है वह बड़े खतरे का संकेत है। इन वास्तविकताओं को ध्यान में रख कर आर्थिक बंदोबस्त करने की आवश्यकता है।
