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विपक्षी सरकारें असुरक्षित क्यों हैं?

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अभी यह सवाल इसलिए है क्योंकि कम से कम तीन राज्य सरकारों को लेकर ऐसी खबरें आई हैं कि उनके ऊपर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। पंजाब में आम आदमी पार्टी के छह राज्यसभा सांसदों के पाला बदलने के बाद से विधायक दल में टूट की भी चर्चा चल रही है। हालांकि विधानसभा चुनाव में अब बहुत कम समय रह गया है इसलिए शायद ऐसा नहीं हो। दूसरा राज्य तमिलनाडु है, जहां की टीवीके और कांग्रेस सरकार के नेताओं ने कहा है कि उनके विधायकों को 35 से 50 करोड़ रुपए तक का लालच दिया जा रहा है। टीवीके की ओर से डीएमके नेताओं का नाम लिया गया है। गौरतलब है कि राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी डीएमके लगातार दावा कर रही है कि सरकार ज्यादा नहीं चलेगी। यह भी ध्यान रखने की जरुरत है कि पिछले कुछ दिनों से डीएमके और भाजपा की नजदीकी बढ़ी है। तीसरा राज्य जम्मू कश्मीर है, जहां के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा है कि उनके जम्मू के एक विधायक को पार्टी छोड़ने के लिए 20 से 30 करोड़ रुपए का लालच दिया गया।

अब सवाल है कि क्या इन आरोपों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए? अगर भारत में पिछले एक दशक से ऐसी प्रैक्टिस नहीं चल रही होती तो शायद गंभीरता से नहीं लिया जाता। लेकिन पिछले 10 साल से लगातार विपक्षी पार्टियों की सरकारें गिरी हैं और हर बार लालच या भय की वजह से विधायकों के पाला बदलने की खबरें आई हैं। पिछले छह से सात साल में विपक्ष की तीन सरकारें गिरी हैं। पहले 2019 में कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस की सरकार गिरी। उसके बाद 2020 में मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरी और फिर 2022 में महाराष्ट्र में कांग्रेस, शिव सेना और एनसीपी के महाविकास अघाड़ी की सरकार गिरी।

2024 में हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरते गिरते बची। बहुमत से करीब 10 सीट ज्यादा होने के बावजूद विधायकों की दलबदल के कारण कांग्रेस के राज्यसभा प्रत्याशी अभिषेक सिंघवी हार गए थे। उसके बाद बड़ी मुश्किल से सरकार बची और उपचुनाव में फिर कांग्रेस ने ठोस बहुमत हासिल किया।

तभी तमिलनाडु से लेकर जम्मू कश्मीर तक जो आरोप लगे हैं उनको गंभीरता से लेने की जरुरत है। हो सकता है कि ये सरकारें न गिरें और अपना कार्यकाल पूरा करें। लेकिन अगर चुनी हुई सरकार को अस्थिर करने का प्रयास किया जाता है और उसके लिए लालच या भय की टेक्निक का प्रयोग किया जाता है तो यह देश के लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

यह चिंता इसलिए भी ज्यादा गंभीर हो जाती है कि भारत में पार्टियां खुद ही पहले के मुकाबले ज्यादा सिद्धांतहीन राजनीति करने लगी हैं। पार्टियां, जिसके खिलाफ लड़ती हैं उसी के साथ सरकार बना लेती हैं। लेकिन जहां ऐसा नहीं होता है वहां पार्टियों के नेता यानी विधायक या सांसद सिद्धांतहीन राजनीति करते हैं। सोचें, यह महात्मा गांधी का देश है, जिन्होंने सार्वजनिक जीवन के सात पापों में सबसे पहला पाप सिद्धांतहीन राजनीति को बताया था। उसी देश में बेहद सांस्थायिक और व्यापक रूप से सिद्धांतहीन राजनीति हो रही है।

सवाल है कि क्या इसके लिए सिर्फ पाला बदलने वाले नेता यानी विधायक और सांसद ही जिम्मेदार हैं? ऐसा नहीं है। पहले भी पार्टियों के नेता पाला बदलते थे। उसके पीछे भी सत्ता का लोभ होता था लेकिन कहीं न कहीं वैचारिकता का आग्रह भी होता था। अब तो विशुद्ध रूप से सत्ता के लालच या सत्ता के भय से दलबदल किया जा रहा है। तभी सिर्फ विधायकों या सांसदों को जिम्मेदार ठहरा कर इस मामले की व्याख्या नहीं की जा सकती है। इसमें केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की भूमिका सबसे पहले रेखांकित करने की जरुरत है। अ

सल में भाजपा ने दलबदल कराने और विपक्ष की सरकारों को अस्थिर करने की सांस्थायिक व्यवस्था विकसित की है। भजनलाल जैसे एकाध अपवाद को छोड़ दें तो इंदिरा और राजीव गांधी के जमाने में सरकारों को अस्थिर करने का एकमात्र हथियार संविधान का अनुच्छेद 356 था, जिसके तहत राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया जाता था। उसके लिए केंद्र की बड़ी आलोचना होती थी और आज तक भाजपा की ओर से गिनती कराई जाती है कितनी बार कांग्रेस की सरकारों ने राज्यों में विपक्षी पार्टियों की सरकारें गिराईं।

कांग्रेस ने जो किया उसका बचाव नहीं किया जा सकता है। लेकिन वह संविधान के प्रावधानों के तहत किया गया। लेकिन अब जो सांस्थायिक व्यवस्था विकसित की गई है वह विशुद्ध रूप से गैरलोकतांत्रिक और संविधान विरोधी है। यह व्यवस्था सत्ता के दुरूपयोग और धन बल पर आधारित है। इस व्यवस्था ने भ्रष्टाचार के ऐसे व्यापक इकोसिस्टम को जन्म दिया है, जिसकी कल्पना कुछ समय पहले तक नहीं की जा सकती थी। इस व्यवस्था ने भारत की राजनीति और समूची लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रदूषित किया है। सोचें, भारत में 99 करोड़ मतदाता हैं। इनमें से बड़ी संख्या में मतदाता विपक्ष यानी भाजपा विरोधी पार्टियों को वोट करते हैं। कई राज्यों में वे भाजपा विरोधी पार्टियों को सरकार चलाने या विपक्ष में बैठने के लिए चुनते हैं। लेकिन उनके वोट से मिला जनादेश भी अगर चुनावी मैदान से बाहर धनबल और राजनीतिक तिकड़म से बदल दिया जाए तो क्या कहा जा सकता है?

दूसरी चिंता की बात यह है कि अब विपक्ष की सिर्फ सरकार नहीं गिराई जा रही है, बल्कि विपक्ष को विपक्ष में भी कमजोर किया जा रहा है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिव सेना के साथ ऐसा ही हुआ है। दोनों हार कर और कमजोर होकर विपक्ष में हैं फिर भी पार्टी तोड़ी गई है। अगर ऐसे ही चलता रहा तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया से लोगों का विश्वास कम होगा। एक समय ऐसा भी आ सकता है, जब किसी को इस पर भरोसा ही न रह जाए। मजाक में तो ऐसी बातें कही जाने लगी हैं। सोशल मीडिया में मजाक में तीन बातें कही जाती हैं। पहला, ‘ईवीएम में बटन किसी के आगे दबाइए, वोट भाजपा को जाएगा’। दूसरा, ‘वोट किसी को दीजिए, जीतेगी भाजपा ही’। और तीसरा, ‘जीते कोई भी सरकार बनाएगी भाजपा ही’। अब यह मजाक की बात नहीं रह गई दिखती है। पहली दो बातों में संदेह का लाभ दें तब भी तीसरी बात यानी ‘जीते कोई भी सरकार बनाएगी भाजपा ही’ के उदाहरण कई राज्यों में दिखे हैं। मणिपुर से लेकर गोवा और मध्य प्रदेश तक कई मिसालें हैं।

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