नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भारतीय जनता पार्टी ने 2014 में कांग्रेस को बुरी तरह हराने के बाद भी उसको उसके हाल पर नहीं छोड़ा। उलटे उसके बाद तो कांग्रेस और उसके भूत, वर्तमान और भविष्य के नेताओं की साख खराब करने का ज्यादा बड़ा और व्यवस्थित अभियान चला। भाजपा ने देश में व्यापक रूप से यह धारणा बनाई है कि कांग्रेस बहुत खराब पार्टी है, उसके पास देश के लिए कोई दृष्टि नहीं है और देश के लोग जो समस्याएं झेल रहे हैं उनके लिए जिम्मेदार कांग्रेस की पहले की सरकारें हैं। इस नैरेटिव को स्थापित करने के लिए कुछ सांसदों और नेताओं से 2014 में देश को असली आजादी मिलने वाली बात कहलवाई गई।
पिछले 12 साल में यह धारणा भी स्थापित कराई गई कि राहुल गांधी स्वाभाविक नेता नहीं हैं। उनको जोर जबरदस्ती राजनीति में लाया गया है। इसके बाद यह धारणा बनाई गई कि वे नासमझ हैं, ‘पप्पू’ हैं। तीसरे चरण में उनको भारत विरोधी ताकतों के हाथों का मोहरा साबित करने का व्यापक अभियान चला। उनकी हर विदेश यात्रा को इसी नैरेटिव से जोड़ा जाता है।
भाजपा की इस रणनीति का मकसद देश में विकल्पहीनता की स्थिति पैदा करना था। वह काफी हद तक इसमें कामयाब रही है। तभी आज तमाम किस्म की मुश्किलें झेल रहे लोगों से पूछा जाए कि आप भाजपा से इतने नाराज हैं या सरकार से इतनी शिकायतें हैं तो उसे हरा क्यों नहीं देते हैं तो लोगों का जवाब होता है कि उसे हरा दें तो किसको चुन दें? वे पूरे कन्विक्शन के साथ कहते हैं कि मोदी या भाजपा को वोट नहीं दें तो क्या इनको यानी राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव आदि को वोट दे दें? हालांकि वे बहुत विश्वसनीय तरीके से यह नहीं बता पाते हैं कि इन लोगों में क्या खराबी है। उनके पास सिर्फ व्हाट्सऐप से फॉरवर्ड किया गया मैसेज होता है, जिनमें इन नेताओं और इनके पूर्वजों के बारे में अऩाप शनाप तथ्यहीन बातें लिखी होती हैं।
देश और दुनिया के ज्ञानीजन यह भी बताते हैं कि कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां इसलिए हार रही हैं क्योंकि वे जिस स्पेस में राजनीति करती हैं उस स्पेस में कई पार्टियां आपस में लड़ती हैं, जिससे उनका वोट बंट जाता है। दूसरी ओर भाजपा अपने ब्रांड की राजनीति अकेले करती है। अपने ब्रांड का मतलब है कि हिंदुत्व और राष्ट्रवाद की राजनीति करने वाली वह इकलौती पार्टी है। इसके साथ ही वह विकास का तड़का लगा कर चुनाव जीत रही है। दूसरी ओर कई पार्टियों के आपस में लड़ने से भाजपा विरोधी वोट बंट जाता है। यह बात आंशिक रूप से ही सही है। क्योंकि देश में हमेशा ऐसा ही होता रहा है।
भारत ही नहीं दुनिया के किसी भी देश में, जहां ‘फर्स्ट पास द पोस्ट’ का सिद्धांत है यानी ‘जिसे सबसे ज्यादा वोट मिलेंगे वह जीतेगा’ का सिद्धांत है वहां ऐसी ही स्थिति रहती है। आजादी के बाद कांग्रेस को भी कभी 50 फीसदी वोट नहीं मिले। 1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को 415 सीटें मिली थीं तब भी कांग्रेस का वोट प्रतिशत 50 फीसदी की सीमा को पार नहीं कर सका था। जाहिर है कांग्रेस जब अकेली सबसे बड़ी ताकत थी तब भी उसकी विरोधियों के वोट ज्यादा थे लेकिन वे बंट जाते थे इसलिए कांग्रेस जीतती थी। आज भी अगर भाजपा विरोधी वोट ज्यादा हैं लेकिन वो बंट जाते हैं तो भाजपा जीतती है, इसमें कोई नई बात नहीं है।
तभी यह समझने की जरुरत है कि भाजपा विरोधी वोटों का ध्रुवीकरण करके चुनाव जीतने की रणनीति मौजूदा स्थिति में कामयाब नहीं होगी। पिछले चुनाव में यह मौका था। आगे मौका तभी बन सकता है, जब 1977 जैसा या 1989 जैसा कोई आंदोलन खड़ा हो, कोई भावनात्मक मुद्दा हो, सरकार विरोधी माहौल बने और उसमें विपक्षी पार्टियां एकजुट होकर लड़ें। हालांकि 1989 में भी कांग्रेस ही सबसे बड़ी पार्टी बनी थी लेकिन चूंकि उसकी सीटें 1984 के मुकाबले आधे से भी कम हो गई थीं इसलिए राजीव गांधी ने सरकार बनाने का न्योता स्वीकार नहीं किया था। तभी कोई बड़ा भावनात्मक मुद्दा खड़ा किए बगैर विपक्ष का जीतना मुश्किल है।
विपक्ष की एकजुटता बना कर और भाजपा विरोधी वोटों के ध्रुवीकरण से चुनाव जीतने की रणनीति की बजाय कांग्रेस के लिए बेहतर रास्ता यह है कि वह धारणा बदलने के लिए काम करे। अगर धारणा बदलती है। लोग यह कहना बंद करते हैं कि भाजपा या मोदी को नहीं तो क्या कांग्रेस और राहुल को वोट दे दें तभी कांग्रेस की वापसी संभव होगी। कहने का आशय यह है कि भाजपा के अपने वोट टूटेंगे, उसके समर्थकों में निराशा बनेगी और वे कांग्रेस की ओर लौटेंगे तभी कांग्रेस चुनाव जीत सकेगी। इसमें भी यह तय मानें कि वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध जो वोट नरेंद्र मोदी के राष्ट्रीय राजनीतिक क्षितिज पर आने से पहले से भाजपा को मिलता रहा है, उसका टूटना थोड़ा मुश्किल है। मोदी ने आकांक्षी वर्ग का जो वोट जोड़ा है वह जरूर एक समय के बाद अलग हो सकता है।
बहरहाल, अब सवाल है कि क्या निकट भविष्य में यह धारणा बदल सकती है? क्या कांग्रेस स्वतंत्र रूप से राजनीति कर सकती है? पिछले कुछ दिनों में राजनीति में ऐसे बदलाव हुए हैं, जिनसे लग रहा है कि कांग्रेस के प्रति धारणा बदल रही है और कांग्रेस भी प्रादेशिक पार्टियों से अलग स्वतंत्र राजनीति कर रही है। वह अपने को भाजपा के मजबूत और बेहतर विकल्प के तौर पर पेश कर रही है। वह भाजपा के लिए चुनौती बन रही है और कई जगह ऐसा लग रहा है कि स्थितियां भी कांग्रेस के अनुकूल हुई हैं। अब कांग्रेस उन स्थितियों का कितना लाभ ले पाती है यह देखने वाली बात होगी।
कांग्रेस के प्रति धारणा बदलने का एक बड़ा कारण तो यह है कि भाजपा की सरकार को सत्ता में लंबा समय हो गया और 12 साल की अवधि में लोगों के जीवन में कोई वास्तविक बदलाव नहीं दिखा है। सब कुछ लगभग वैसा ही है, जैसा पहले से चल रहा था देश मजबूत हुआ है या दुनिया भारत की बात ज्यादा सुनती है या भारत विश्वगुरू बन रहा है या दुनिया में मोदी का बड़ा मान है आदि बातें अमूर्त हैं। जनता अपने जीवन में वास्तविक बदलाव देखना चाहती है। अगर महिलाओं को डेढ़ से ढाई हजार रुपया महीना देने या किसानों के खाते में पांच सौ रुपया महीना डालने को बदलाव कहा जाएगा तो उससे भाजपा लंबे समय तक एडवांटेज नहीं ले पाएगी क्योंकि बाकी पार्टियों की सरकारें भी ऐसे ही पैसे बांट रही हैं।
भाजपा की एक ताकत उसकी वैचारिक स्पष्टता और प्रतिबद्धता रही थी। भाजपा पहले अपने को पार्टी विद डिफरेंस कहती थी। हालांकि अब तो नहीं कहती है। फिर भी यह धारणा थी कि भाजपा वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध है और आर्थिक रूप से ईमानदार है। ये दोनों धारणाएं बदल गई हैं। भाजपा अब बाहर से आए ऐसे लोगों से भर गई है, जिनका वैचारिक आग्रह बिल्कुल भिन्न रहा है और जिनके ऊपर भाजपा ने तुष्टिकरण से लेकर भ्रष्टाचार तक के गंभीर आरोप लगाए थे। हालांकि इसके बावजूद भाजपा जीत रही है लेकिन वह अब दावा करने की स्थिति में नहीं है कि वह अलग पार्टी है। जब लोगों को यह लगने लगेगा कि भाजपा भी कांग्रेस या दूसरी विपक्षी पार्टियों जैसी ही पार्टी है तो फिर लोग क्यों उसको वोट देंगे? जब लोग यह सोचने लगेंगे कि सब एक ही जैसी पार्टी है तो क्यों एक ही पार्टी को चुनें, दूसरे को आजमा कर देखते हैं। भाजपा को लग रहा होगा कि दूसरी पार्टी के मजबूत नेताओं या भ्रष्टाचार के आरोपियों को पार्टी में लाकर उसने बड़ी सफलता हासिल की है। तो यह सफलता अस्थायी है। लंबे समय में इससे धारणा के स्तर पर नुकसान होगा। इससे कांग्रेस के प्रति बनवाई गई धारणा बदलेगी।
