कृष्ण की विशेषता यह है कि वे धर्म को अंधे आग्रह के रूप में नहीं देखते। उनके निर्णयों में परिस्थिति की समझ, समय की पहचान और परिणामों का आकलन दिखाई देता है। यही उनकी नीति को विशिष्ट बनाता है। महाभारत में कृष्ण ने युद्ध को अंतिम विकल्प के रूप में देखा। उन्होंने पहले शांति का प्रयास किया। पांडवों के लिए न्यूनतम अधिकार तक स्वीकार करने की बात सामने रखी गई
श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष
अजीत दुबे
भारतीय चिंतन परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व जितना विराट है, उतना ही बहुआयामी भी। वे एक ओर प्रेम, करुणा और लोकमंगल के प्रतीक हैं, तो दूसरी ओर वे अद्भुत राजनीतिक दूरदर्शिता, कूटनीति, नेतृत्व और शौर्य के आदर्श भी हैं। महाभारत और श्रीमद्भगवद्गीता में कृष्ण की नीति का मूल आधार धर्म है, लेकिन उनका धर्म पलायन का धर्म नहीं, बल्कि अन्याय के प्रतिकार और सत्य की स्थापना का धर्म है। यही कारण है कि कृष्ण की नीति में धर्म-बोध के साथ शौर्य-बोध का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
कृष्ण के लिए धर्म का अर्थ केवल धार्मिक कर्मकांड या पूजा-पद्धति नहीं है। धर्म वह है जो व्यक्ति, समाज और व्यवस्था को धारण करता है। जब सत्ता अन्याय का माध्यम बन जाए, जब निर्दोषों पर अत्याचार हो और जब सत्य को दबाने का प्रयास किया जाए, तब उस अन्याय का प्रतिरोध करना भी धर्म का ही हिस्सा बन जाता है।
श्रीमद्भगवद्गीता में कृष्ण अर्जुन को उसके स्वधर्म और कर्तव्य का बोध कराते हैं। अर्जुन युद्धभूमि में अपने संबंधियों, गुरुजनों और मित्रों को देखकर मोहग्रस्त हो जाते हैं। वह युद्ध से पीछे हटना चाहते हैं। कृष्ण उन्हें समझाते हैं कि व्यक्तिगत मोह और व्यापक कर्तव्य के बीच अंतर करना आवश्यक है।
उनका संदेश स्पष्ट है, व्यक्ति को अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए, विशेषकर तब जब उसके सामने अन्याय और अधर्म खड़ा हो।
कृष्ण की विशेषता यह है कि वे धर्म को अंधे आग्रह के रूप में नहीं देखते। उनके निर्णयों में परिस्थिति की समझ, समय की पहचान और परिणामों का आकलन दिखाई देता है। यही उनकी नीति को विशिष्ट बनाता है। महाभारत में कृष्ण ने युद्ध को अंतिम विकल्प के रूप में देखा। उन्होंने पहले शांति का प्रयास किया। पांडवों के लिए न्यूनतम अधिकार तक स्वीकार करने की बात सामने रखी गई। कृष्ण स्वयं हस्तिनापुर शांति-दूत बनकर गए, लेकिन जब दुर्योधन ने न्यायपूर्ण समाधान स्वीकार नहीं किया, तब संघर्ष अपरिहार्य हो गया। इससे कृष्ण की नीति का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामने आता है, जहां संभव हो, शांति का प्रयास होना चाहिए, लेकिन शांति के नाम पर अन्याय स्वीकार्य नहीं।
अगर श्रीकृष्ण के शौर्य-बोध की बात करें तो उसे केवल युद्ध और हथियारों से जोड़ना उचित नहीं होगा। उनके लिए शौर्य का अर्थ सत्य के पक्ष में खड़े होने का साहस भी है। अर्जुन के हाथ में गांडीव था, लेकिन युद्धभूमि में उसके मन में संशय था। कृष्ण ने सबसे पहले उनके भीतर का भय और मोह दूर किया। उन्होंने उसे आत्मज्ञान, कर्मयोग और कर्तव्य का बोध कराया। इस प्रकार कृष्ण ने अर्जुन के बाहरी शौर्य से पहले उसके आंतरिक शौर्य को जागृत किया।
वास्तविक वीर वही है जो कठिन परिस्थिति में भी विवेक नहीं खोता और धर्म के पक्ष से विचलित नहीं होता।
गीता का प्रसिद्ध संदेशः “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” है, जिसका अर्थ है कि मनुष्य को अपने कर्म पर अधिकार है, उसके फल पर नहीं। यह शिक्षा शौर्य को अहंकार से अलग करती है। कर्म करना वीरता है, लेकिन फल की चिंता में कर्तव्य छोड़ देना दुर्बलता है।
महाभारत में कृष्ण ने स्वयं शस्त्र न उठाने का संकल्प किया, फिर भी वे पांडवों की विजय के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिकार बने। उन्होंने यह दिखाया कि युद्ध केवल बाहुबल से नहीं, बल्कि बुद्धिबल, समय-बोध, नेतृत्व और रणनीति से भी जीता जाता है। भीष्म, द्रोण, कर्ण और दुर्योधन जैसे शक्तिशाली योद्धाओं के सामने पांडवों की स्थिति सरल नहीं थी। कृष्ण ने परिस्थितियों के अनुरूप रणनीति बनाई। जयद्रथ-वध से लेकर द्रोणाचार्य के प्रसंग और कर्ण के विरुद्ध युद्ध तक, कृष्ण की रणनीतिक भूमिका निर्णायक रही।
महाभारत का मूल प्रश्न यह है कि जब अधर्म स्वयं नियमों और शक्ति का दुरुपयोग कर रहा हो, तब धर्म की रक्षा किस प्रकार की जाए? कृष्ण का उत्तर था, धर्म की रक्षा के लिए नीति और रणनीति आवश्यक हैं। “अहिंसा” और “प्रतिरोध” का संतुलन भी आवश्यक है। भारतीय संस्कृति में अहिंसा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है, लेकिन कृष्ण की शिक्षा यह भी बताती है कि अहिंसा का अर्थ अन्याय के सामने निष्क्रिय खड़े रहना नहीं हो सकता. यदि किसी निर्दोष पर अत्याचार हो रहा हो और सामर्थ्यवान व्यक्ति केवल अपनी व्यक्तिगत शांति के लिए मौन रहे, तो उसका मौन भी अन्याय को शक्ति दे सकता है।
कृष्ण का शौर्य-बोध प्रतिशोध की भावना पर आधारित नहीं है वह धर्म-संरक्षण पर आधारित है। गीता में वे कहते हैः “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥” अर्थात सज्जनों की रक्षा, दुष्कर्मियों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए ईश्वर का अवतरण होता है। कृष्ण स्वयं राजा बनकर महाभारत का नेतृत्व नहीं करते, वे सारथी बनते हैं। यह भारतीय नेतृत्व-दर्शन का अत्यंत महत्वपूर्ण उदाहरण है। सारथी का स्थान रथी से नीचे माना जा सकता है, लेकिन कृष्ण दिखाते हैं कि महान नेतृत्व पद से नहीं, दिशा देने की क्षमता से पैदा होता है।
वे अर्जुन को आदेश मात्र नहीं देते; उनके संशय का समाधान करते हैं, उनके प्रश्नों का उत्तर देते हैं और उसे स्वयं निर्णय लेने योग्य बनाते हैं। यही सच्चे नेतृत्व की पहचान है। आज के समय में कृष्ण की नीति का अर्थ युद्ध को बढ़ावा देना नहीं है। इसका आधुनिक संदेश है, धर्म अर्थात न्याय और नैतिकता के प्रति प्रतिबद्धता, तथा शौर्य अर्थात अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस।
व्यक्ति के जीवन में भी अनेक कुरुक्षेत्र आते हैं। कभी परिवार और कर्तव्य के बीच संघर्ष होता है, कभी सत्य और सुविधा के बीच। कभी व्यक्तिगत लाभ सामने होता है और कभी सामाजिक उत्तरदायित्व। ऐसे प्रत्येक अवसर पर कृष्ण का संदेश प्रासंगिक हो उठता है, मोह से ऊपर उठकर विवेक से निर्णय लो, अपने कर्तव्य को पहचानो और परिणाम के भय से सत्य का मार्ग मत छोड़ो।
कृष्ण हमें सिखाते हैं कि बुद्धि शौर्य को दिशा दे, शौर्य धर्म की रक्षा करे और धर्म लोकमंगल का आधार बने। इसीलिए कृष्ण केवल महाभारत के एक पात्र नहीं हैं। वे भारतीय सभ्यता के उस जीवन-दर्शन के प्रतीक हैं जिसमें नीति और नैतिकता, बुद्धि और बल, करुणा और प्रतिरोध तथा शांति और शौर्य, इन सभी का संतुलित समन्वय दिखाई देता है।
कृष्ण की नीति का अंतिम संदेश यही है, जहां धर्म है, वहीं विजय की संभावना है; लेकिन धर्म की विजय के लिए जाग्रत विवेक, दृढ़ संकल्प और आवश्यक शौर्य अनिवार्य है। (लेखक विश्व भोजपुरी सम्मेलन संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं मैथिली भोजपुरी अकादमी दिल्ली के पूर्व उपाध्यक्ष हैं।)
