आंकड़ों का अंकगणित कुछ भी हो, बीजगणित खुल कर संकेत दे रहा है कि इन सभी प्रदेशों की मौजूदा हुक़ूमतों के लिए अगले चुनावों में अपनी वापसी दर्ज़ कराना मुश्क़िल है। … 2022 के विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनाव नतीज़ों के मद्देनज़र अंकों के पीछे छिपे उस बीजमंत्र को समझिए, जिस की वज़ह से पांचों प्रदेशों में 2027 की शुरुआत वहां के वर्तमान शासकों के लिए मुसीबतों की गठरी और विपक्ष के लिए सौगातों का संदूक ले कर आ रही है।
अगले साल फरवरी-मार्च में पांच राज्यों – उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर – में विधानसभा के चुनाव होंगे। इन में से पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है और बाक़ी चारों में भारतीय जनता पार्टी की। आंकड़ों का अंकगणित कुछ भी हो, बीजगणित खुल कर संकेत दे रहा है कि इन सभी प्रदेशों की मौजूदा हुक़ूमतों के लिए अगले चुनावों में अपनी वापसी दर्ज़ कराना मुश्क़िल है। उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में भाजपा की सरकारें दोबारा नहीं बनेंगी। उत्तर प्रदेश में उसे सरकार बनाने लायक़ स्पष्ट बहुमत हासिल नहीं होगा। पंजाब में ‘आप’ की सरकार का लौटना भी मुमकिन नहीं लगता है।
2022 के विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनाव नतीज़ों के मद्देनज़र अंकों के पीछे छिपे उस बीजमंत्र को समझिए, जिस की वज़ह से पांचों प्रदेशों में 2027 की शुरुआत वहां के वर्तमान शासकों के लिए मुसीबतों की गठरी और विपक्ष के लिए सौगातों का संदूक ले कर आ रही है।
सब से पहले उत्तर प्रदेष। वहां 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा 403 में से 255 सीटें जीती थी। मगर इस जीत के गलीचे के नीचे छिपे इस अपशिष्ट पर ज़रा नज़र डालिए कि जीती गई सीटों में से 23 पर भाजपा पांच हज़ार से कम वोट से, 3 सीटें वह तीन हज़ार से कम वोट के अंतर से, 11 सीटें दो हज़ार से कम वोट से, 11 ही सीटें एक हज़ार से कम वोट से और 7 सीटें पांच सौ से भी कम वोट के अंतर से जीती थी। यानी 55 सीटें ऐसी हैं, जो अगले चुनाव में ढाई सौ से ढाई हज़ार वोट इधर-उधर होते ही भाजपा की झोली से नीचे गिर सकती हैं। स्पष्ट बहुमत 202 सीटों का है। 255 में से 55 खिसक गईं तो योगी आदित्यनाथ को सरकार बनाने लायक़ बहुमत अकेले भाजपा के भरोसे तो मिलेगा नहीं।
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस इस बार पहले से बहुत ज़्यादा अच्छी स्थिति में हैं। इसे समझने के लिए इन तथ्यों पर ध्यान दीजिए। पिछले चुनाव में सपा ने 111 सीटें जीती थीं। 38 और सीटें ऐसी थीं, जो वह बहुत कम वोट के अंतर से हारी थी। 13 सीटों पर उस की हार का फ़र्क़ पांच हज़ार वोट से कम था, 14 पर वह तीन हज़ार से भी कम वोट से, 7 पर एक हज़ार से कम वोट से और 4 पर पांच सौ से भी कम वोट के फ़र्क़ से हारी थी। 2022 का विधानसभा चुनाव सपा और कांग्रेस ने अलग-अलग लड़ा था। सपा ने 347 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और 32 प्रतिशत की सफलता-दर हासिल की थी। सपा-गठबंधन को पिछले विधानसभा चुनाव में 125 सीटों पर जीत मिली थी।
2024 के लोकसभा चुनाव में सपा विधानसभा के 184 क्षेत्रों में आगे रही है। कांग्रेस विधानसभा के 39 क्षेत्रों में पहले क्रम पर रही। यानी दोनों मिल कर 223 सीटों पर भाजपा से आगे रहे हैं। भाजपा के अभी 255 विधायक हैं, मगर लोकसभा के चुनाव में उन में से सिर्फ़ 162 की सीटों पर भाजपा को बढ़त मिल पाई है। अगर एनडीए के बाक़ी दलों को भी शामिल कर लें तो भी यह आंकड़ा 174 पर पहुंचता है। यानी 93 सीटों का नुक़सान तो भाजपा को सीधे-सीधे हो रहा है और एनडीए को मिला कर भी योगी को स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने के लिए 28 विधायकों की ज़रूरत और होगी। युवाओं के देशव्यापी आंदोलन के चलते भाजपा की हालत दिनोंदिन और खराब ही हो रही है। सो, मान कर चलिए कि उत्तर प्रदेश से इस बार भाजपा की विदाई हो रही है।
अब आइए उत्तराखंड पर। वहां भाजपा 70 में से 47 सीटें जीती थी। इन में से 8 सीटें उसे पांच हज़ार से कम वोट के अंतर सें, 4 सीटें तीन हज़ार वोट से कम से और 2 सीेटें पर एक हज़ार वोट से कम के अंतर से मिली थीं। यानी 14 सीटें ऐसी हैं, जो इस बार उस के हाथ से खिसक सकती हैं। स्पष्ट बहुमत का आंकड़ा 36 है। भाजपा उस से 3 अंक पीछे रह सकती है। कांग्रेस को पिछले चुनाव में 19 सीटें मिली थीं। मगर 22 विधानसभा क्षेत्रों में उस की हार का अंतर पांच हज़ार वोट से कम रहा था। 7 सीटें वह तीन हज़ार वोट से कम के अंतर से हारी थी और 2 सीटों पर तो उस की हार का फ़र्क़ एक हज़ार से भी कम वोट का था। अगर इन सभी सीटों पर इस बार कांग्रेस अपनी मजबूती बरकरार रख पाती है तो उसे 41 सीटों पर जीत मिल सकती है। ज़ाहिर है कि उत्तराखंड की सरकार के ख़िलाफ़ स्थानीय क्षोभ के चलते वहां से भी भाजपा की विदाई के बहुत ठोस आसार नज़र आ रहे हैं।
पंजाब में भाजपा की ज़मीनी मौजूदगी न पिछले विधानसभा चुनाव में थी और न इस बार दिखाई दे रही है। आम आदमी पार्टी ने 2022 में 117 में से 92 सीटें जीती थीं ।इन में से 7 सीटें वह पांच हज़ार वोट से कम के अंतर से, 4 सीटें तीन हज़ार वोट से कम से, 1 सीट एक हज़ार वोट से कम से और 1 सीट पांच सौ वोट से भी कम से जीती थी। ये 13 सीटें इस बार उस के पल्लू से छिटक भी जाएं तो भी उसे 59 सीटों के सपष्ट बहुमत से पीछे जाने के लिए 21 और सीटें हारनी होंगी। क्या ऐसा हो पाएगा?
हां, ऐसा होने की संभावना लगातार बढ़ती जा रही हैं। 2022 में कांग्रेस सिर्फ़ 18 सीटों पर सिमट गई थी। मगर बीजगणित यह है कि हारी गई सीटों में से 11 वह पांच हज़ार से कम वोटों से, 5 सीटें तीन हज़ार से कम वोट से, 1 सीट एक हज़ार से कम वोट से और 1 पांच सौ से भी कम वोट से हारी थी। यानी ये 18 सीट ऐसी हैं, जिन्हें वह इस बार जीत सकती है। अगर ऐसा हुआ तो कांग्रेस का आंकड़ा न्यूनतम 36 पर तो पहुंच जाएगा। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को विधानसभा के 37 क्षेत्रों में बढ़त मिली है, जब कि ‘आप’ सिर्फ़ 33 विधानसभा क्षेत्रों में ही आगे रह पाई है। यानी उस के मौजूदा विधायकों में से 59 खतरे में हैं। शिरोमणि अकाली दल भी लोकसभा चुनाव के दौरान महज़ 9 विधानसभा क्षेत्रों में ही आगे रह पाई।
गोवा में भाजपा पिछली बार 40 में से 20 सीटें जीती थी। इन में से 10 पर वह पांच हज़ार से कम वोट से, 7 पर तीन हज़ार से कम वोट से, 4 पर एक हज़ार से कम वोट से और 2 पर पांच सौ से भी कम वोट से जीती थी। तो ये 23 सीटें ऐसी हैं, जो वह इस बार खो सकती है। मतलब साफ़ है कि 2027 में गोवा में भाजपा की सरकार नहीं बन पाएगी। कांग्रेस वहां पिछले चुनाव में 5 सीटें पांच हज़ार से कम वोट से, 4 सीटें तीन हज़ार से कम वोट से और 1 सीट एक हज़ार से कम वोट के अंतर से हारी थी। इन 10 सीटों को वह इस बार अपने दामन में समेट सकती है। पिछली बार कांग्रेस 11 सीटें जीती थी। ये 10 और मिला कर इस बार वह गोवा में सरकार बनाने की स्थिति में आ सकती है।
मणिपुर में 2022 के चुनाव में भाजपा को 60 में से 32 सीटें मिली थीं। इन में से 16 सीटें वह पांच हज़ार से कम वोट से, 10 सीटें तीन हज़ार से कम वोट से, 5 सीटें एक हज़ार से कम वोट से और 2 सीटें पांच सौ से कम वोट से जीती थी। यानी 33 सीटें ऐसी हैं, जो उस के लिए इस बार सुनिष्चित नहीं हैं। कांग्रेस ने पिछली बार 5 सीटें जीती थीं और 12 पर वह दूसरे क्रम पर रही थी। कांग्रेस 8 सीटें पांच हज़ार से कम, 5 सीटें तीन हज़ार से कम, 2 सीटें एक हज़ार से कम और 1 सीट पांच सौ से कम वोट से हारी थी। ये 16 सीटें इस बार उस के खाते में जा सकती हैं। केंद्र सरकार के रवैए से उपजे गुस्से के बाद इस बार मणिपुर से भी भाजपा की डोली उठती दिखाई दे रही है।
