हिन्दू ग्रंथों की निन्दा करने वाले उसे शायद ही पढ़ते हैं। मनुस्मृति के राज्य-शासन संबंधी तीनों अध्याय गंभीर ज्ञान-भंडार हैं। अधिकांश आज भी मूल्यवान। तब सोचें, तीन हजार वर्ष पहले इतना गहन चिंतन विश्व में कहाँ था! तब यहाँ ऐसे शास्त्र रचे गए, जिन की बातें आज भी चमत्कृत करती है। … निंदक लोग केवल सुनी-सुनाई पर चलते हैं कि उस में ‘शूद्रों या स्त्रियों के बारे में कुछ आपत्तिजनक है।’ वस्तुतः मनुस्मृति में वैसा भी कुछ नहीं है।.. स्वामी दयानन्द सरस्वती ने मनुस्मृति को अपने समाज-सुधार का आधार बनाया था। यदि मनुस्मृति जातिवादी या स्त्री-विरोधी होती, तो वे संपूर्ण भारत में इतना बड़ा आधुनिक, व्यापक प्रभावशाली सुधार आंदोलन चलाने में कैसे सफल हुए होते?
प्रायः लगता है, कि अंग्रेजों ने इस देश को अधिक सहानुभूति से समझा था। लोगों की ही नहीं, अपितु यहाँ के ज्ञान, इतिहास, विरासत, धर्म और संस्कृति के प्रति भी सच्ची देख-भाल की प्रवृत्ति उन में थी। यह बात एकबारगी विचित्र लगे, किंतु ठोस पैमानों पर — सामाजिक, आर्थिक, प्रशासनिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक एवं व्यवहारिक — परखने से सोचने पर विवश होना पड़ेगा।
शिक्षा का उदाहरण लें। अंग्रेजों ने यहाँ अपने बनाए स्कूलों, कॉलेजों में यूरोप के सर्वश्रेष्ठ ज्ञान से भारतीय बच्चों, युवाओं को शिक्षित किया। साहित्य और दर्शन में महान भारतीय रचनाओं को भी वही स्थान दिया। यह पुराने पुस्तकालयों में रखी उस जमाने की पाठ्य सामग्रियों तथा उस युगीन हमारे विद्वानों के लेखन के माध्यम से भी जाना जा सकता है।
पर देशी राज की शिक्षा ने क्या किया? इस ने जल्द ही शिक्षा का राजनीतिकरण, मतवादीकरण कर दिया!
पूरे ब्रिटिश राज में शायद ही स्कूलों में कभी ब्रिटिश सम्राटों या वायसरायों की विरुदावली रटाने, फैलाने का काम हुआ। देशी राज में अपने चालू नेताओं को दैवी, ज्ञानी, चिंतक, विश्वनेता, आदि बताना नीचे से ऊपर सभी कक्षाओं में एक सामान्य तत्व बन गया। यह प्रवृत्ति शिक्षा के विरुद्ध कुशिक्षा को प्रश्रय देना था। अनजाने होने से उस की हानि कम नहीं हुई! बल्कि फिर उस का प्रतिफलन, विस्तार, आदि अन्य क्षेत्रों में भी होना ही था।
जैसे, शिक्षा में सच्चे सिद्धांत पढ़ने के बजाए वैसे मतवादों, विचार पढ़ाना जो उन नेताओं को पसंद थे। या जो उन की अपनी झक थी। तदनुसार, विद्वानों के बदले उन भक्तों और रट्टू तोतों को आचार्य, अध्यापक, संचालक बनाना जो उन मतवादों का प्रचार करें। इसी तरह, फिर शोध के नाम पर उन्हीं बातो, आग्रहों, दुराग्रहों की पुष्टि कराने वाले विचार को शोध-विषय बनाकर शुद्ध प्रोपेगंडा को शोध, ज्ञान, शिक्षा, और उच्च-शिक्षा का नाम दे देना।
उक्त सभी प्रवृत्तियों को आज विकराल व दयनीय रूप में चारो तरफ देख सकते हैं। बीमारी इतनी व्यापक हो चुकी, कि बीमारी नहीं लगती! मानो जहाँ सभी अंधे हों, वहाँ अंधकार और प्रकाश में नामालूम अंतर रहता है। सो, सचमुच ज्ञान की बातें, ज्ञान पुस्तकें, और सच्चे शिक्षक आज के शैक्षिक बौद्धिक वातावरण में नक्कू हैं। उन के लिए कहीं स्थान नहीं। यह भी सरसरी अवलोकन से देखा जा सकता है।
वर्तमान मुहावरे में कहें, तो ‘जेनरल कैटेगरी’ के प्रतिभाशाली विद्यार्थी या अध्यापक विदेशों में जगह ढूँढने के लिए अभिशप्त हैं। देश में उन के लिए कोई चिन्ता करने वाला नहीं! इस प्रकार, देसी राज को ज्ञान, प्रतिभा, योग्यता, कुशलता तथा इस से होने वाले लाभ, और इन की अनुपस्थिति में होने वाली हानि — दोनों में से किसी का बोध तक नही है!
तुलना कीजिए, ब्रिटिश राज की तमाम छात्रवृत्तियों, सम्मानों, प्रोत्साहनों, और पदवियों से। कहीं भी उस में लेशमात्र भी मिलावट, प्रोपेगंडा, भेद-भाव, मिथ्याचार, या दिखावे का संकेत नहीं मिलेगा! इस का प्रत्यक्ष प्रमाण यह भी है कि किसी कट्टर से कट्टर राष्ट्रवादी भारतीय ने अंग्रेज शासकों, प्रशासकों, अधिकारियों पर सामान्य पक्षपात या भ्रष्टाचार का आरोप कभी नहीं लगाया। उन का नियमित कामकाज इतनी पारदर्शिता और गुणवत्ता से चलता था।
अतः क्या आश्चर्य कि आज देश के सर्वोच्च नेतागण भी भारतीय ज्ञान-ग्रंथों के बारे में शून्य जानकारी रखते हैं। यदि कोई संस्था सर्वेक्षण करे (जो ‘प्यू रीसर्च’ जैसी कोई विदेशी ही हो सकती है, देश में अब ऐसी कोई संस्था ही नहीं बची! जो यह करती हो) तो हमारे तमाम मंत्रियों, सासंदों में भारतीय ज्ञान ग्रंथों के पाँच नाम भी बता सकने वाले बिरले ही मिलेंगे। वही देश की शिक्षा, संस्कृति, और विज्ञान, सब के कर्णधार हैं! कहने की जरूरत नहीं कि आम अन्धत्व की स्थिति में इस हाल का मतलब समझने वाले भी बहुत कम हैं। और जो हैं वे असहाय दर्शक भर।
अब इस नये प्रसंग को देखें, जो ‘मनुस्मृति’ को फिर दो लात लगाने से जुड़ी है। एक महान ज्ञान-ग्रंथ — जिस ने ब्रिटिश राज के दौर में स्वामी दयानन्द और स्वामी विवेकानन्द जैसे महापुरुषों को प्रेरित किया, जिन्होंने देश-विदेश में अनगिनत लोगों को अपनी सीख से लाभान्वित किया। उस ग्रंथ का स्थान देसी राज में यह है कि हर नेता उसे गाली देकर, या जला कर अपने को देश का कर्णधार समझता है! किसी को उसे पढ़ने की जरूरत नहीं। बस, गाली देना पर्याप्त है। जिस से वह प्रगतिशील, बहुजन-हितैषी, समाज सेवक, आदि कहलाने का हकदार हो जाता है।
यह है देसी राज की शिक्षा का नतीजा, जिस में पैदा हुए और पले-बढ़े लोग ही आज देश भर में सत्तासीन हैं। वे न केवल यह दृश्य सहज रूप से देखते हैं, अपितु इसी को प्रोत्साहन देते हैं। मामूली खोजबीन से ऐसे उच्च पदस्थ लोग मिल जाएंगे जो मनुस्मृति को जलाकर, या उसे अपशब्द कह कर ऊपर स्थापित हुए। साथ ही, ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो जटिल विषयों के अच्छे ज्ञाता हैं, इसीलिए कहीं भूखे, बेघर उपेक्षित पड़े हैं। जो किन्ही मित्रों के अनुदान और सहयोग से जीवन चला रहे हैं। क्योंकि वे उस ‘केटेगरी’ के हैं जिन की जरूरत देसी राज को नहीं है।
सो, देसी राज में महान पुस्तकें शिक्षा से क्रमशः बाहर होती गईं। उन्हें तुच्छ या अप्रासंगिक मान लिया गया। बिना पढ़े। मनुस्मृति की नियमित भर्त्सना इसी का उदाहरण है। जबकि यदि शीर्षक हटाकर इसे किन्हीं भी दस समझदार लोगों को पढ़ने को दें, और फिर मंतव्य लें, तो सभी उसे महान ग्रंथ मानेंगे। अतः निंदक लोग केवल सुनी-सुनाई पर चलते हैं कि उस में ‘शूद्रों या स्त्रियों के बारे में कुछ आपत्तिजनक है।’
वस्तुतः मनुस्मृति में वैसा भी कुछ नहीं है। यदि होता, तब भी आज के नजरिए से किसी पुरानी पुस्तक में कोई नापसंद बात मिलने पर भी उसे अपमानित करना मूर्खता है। इसीलिए ‘ओल्ड टेस्टामेंट’ या ‘कुरान’ जैसे प्राचीन ग्रंथों को सम्मान दिया जाता ह। जबकि उस में पगान, आइडोलेटर, काफिर, यानी दूसरे धर्म-विश्वासियों के लिए अत्यंत अपमानजनक बातें लिखी हुई हैं। उस दृष्टि से आज दुनिया में कम से कम तीन अरब लोग आइडोलेटर और काफिर हैं। तो मनुस्मृति को गाली देने की तर्ज पर आइडोलेटरों को क्या इन्हें उन पुस्तकों को अपशब्द कहने का अधिकार है? पूछ कर देखिए, मनुस्मृति को जलाने का दंभ रखने वाले बगलें झाँकने लगेंगे! देसी राज की शिक्षा ने ऐसे ही मतिहीन नेता बनाए हैं। जो अपनी ही दलील से दो कदम भी सुसंगत नहीं चल सकते। पर वही हमारे कर्ता-धर्ता और मार्गदर्शक हैं।
मनुस्मृति में सृष्टि, दर्शन, धर्म-चिंतन, जीवन के विधि-विधान, गृहस्थ-जीवन, स्त्री, विवाह, राज्य-राजा संबंधी परामर्श, वैश्य-शूद्र संबंधी कर्तव्य, प्रायश्चित, कर्मफल विधान, मोक्ष और परमात्मा चिंतन है। विविध प्रकाशनों में मनुस्मृति में डेढ़ से लेकर ढाई हजार श्लोक मिलते हैं। उन में सैकड़ों प्रक्षिप्त श्लोक माने गए हैं। यानी जो मूल श्लोकों से विसंगत लगेंगे। उन पर विद्वानों में मतभेद हैं। अतः किसी एक मात्र प्रमाणिक प्रति पर असहमति है।
फिर भी, ध्यान देना चाहिए कि स्वामी दयानन्द सरस्वती और स्वामी विवेकानन्द की तमाम शिक्षाओं और जीवन-कर्म का आधार वेद, उपनिषद और मनुस्मृति हैं। इस प्रकार, भारतीय समाज की जो सेवा इन महापुरुषों ने की, उस की प्ररेणा उन्हें मनुस्मृति से भी मिली। तब स्वामी विवेकानन्द ने मनुस्मृति को अधिक समझा था या आज के हमारे कर्णधार जो समाज को तोड़ने, लड़ाने, वोट बटोरने के लिए मनुस्मृति पर कालिख पोतते रहते हैं?
जबकि वही लोग कुरान पर मुँह सी लेते हैं, जिस में लिखे आदेश आज भी दुनिया के हजारों नेता अपना स्थाई कानून समझते हैं। तदनुरूप काफिरों का संहार करना, उन्हें छल-बल से धर्मांतरित कराना, या अपमानित करते रहना अपना खुदाई अधिकार और धर्म समझते हैं! ऐसा धर्म जिस में रुकावट डालने पर आसमान सिर पर उठा लेते हैं। केवल वही नेता नहीं, उन की कौम के वोटों की नजरे-इनायत के लालची काफिर नेता भी कुरान के सम्मान में झुके रहते हैं।
फिर, तुलना में मनुस्मृति का रचनात्मक प्रभाव देखें। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने मनुस्मृति को अपने समाज-सुधार का आधार बनाया था। यदि मनुस्मृति जातिवादी या स्त्री-विरोधी होती, तो वे संपूर्ण भारत में इतना बड़ा आधुनिक, व्यापक प्रभावशाली सुधार आंदोलन चलाने में कैसे सफल हुए होते? यह प्रमाणिक इतिहास भुलाकर, केवल अपने लोभ और राजनीतिक प्रोपेगंडा के असर में यहाँ अनेक लोगों ने भ्रमवश या जान-बूझकर मनुस्मृति को निशाना बना रखा है। यहाँ तक कि ‘मनुवाद’ नामक गाली तक गढ़ ली!
यह देसी राज की वह दुर्दशा है जो मुगल राज में भी नहीं थी। हिन्दू ग्रंथों की निन्दा करने वाले उसे शायद ही पढ़ते हैं। मनुस्मृति के राज्य-शासन संबंधी तीनों अध्याय गंभीर ज्ञान-भंडार हैं। अधिकांश आज भी मूल्यवान। तब सोचें, तीन हजार वर्ष पहले इतना गहन चिंतन विश्व में कहाँ था! तब यहाँ ऐसे शास्त्र रचे गए, जिन की बातें आज भी चमत्कृत करती है।
पर यह कैसी विडम्बना है कि वर्तमान युग में यूरोपीयनों ने हिन्दू ज्ञान ग्रंथों का शोध और प्रकाशन, प्रसार, प्रचार किया। जो काम देसी राज ने फौरन ही उपेक्षित करना आरंभ किया। उसी क्रम में आगे बढ़ कर अब तो वे ग्रंथ निंदित भी हो रहे हैं। या फिर, खाली डींग हाँकने के विषय जिस के बहाने केवल अपना, अपने दल का उत्थान करना मुख्य लक्ष्य है।
इसीलिए यह आज भारत में ज्ञान और शिक्षा की असलियत का संकेत है कि एक ओर कोई ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ की शेखी बघारता है, तो कोई किसी ज्ञान ग्रंथ को जली-कटी सुनाता है। ज्ञान ग्रंथों को पढ़ना, पढ़ाना और उन से सीखना न इधर है, न उधर। कुछ यही सब देखकर देसी राज के एक दशक बाद ही हमारे अनेक बुजुर्ग कहते थे कि यहाँ अंग्रेजों का राज बेहतर था। उन्होंने दोनों को देखकर ऐसा कहा था।
