मिर्जा गालिब ने कहा था:
“गर्मी सही कलाम में लेकिन न इस कदर /
की जिस से बात उसने शिकायत जरूर की।”
सो, किसी की निन्दा भी अगर बेतरह करते रहो, तो निन्दक की ही शिकायत होने लगती है। हाल के वर्षों में, संसद से लेकर सार्वजनिक भाषणों में भाजपा के बड़े नेता जिस तरह जवाहर लाल नेहरू की निन्दा कर रहे हैं, उस पर गालिब की बात फिट होती है। अभी 18 अप्रैल को राष्ट्र के नाम संदेश में कहा गया: “कई देश हमारे साथ आजाद हुए… वे हम से आगे निकल गए… इस का कारण कांग्रेस का रवैया रहा…” । उस 28 मिनट के भाषण में 23 बार ‘कांग्रेस’ का नाम लेकर निन्दा थी!
एक आकलन अनुसार पिछले बारह वर्षों में प्रधानमंत्री मोदी ने नेहरू का लगभग दो सौ बार नाम लेकर निन्दा की। यदि इस में परोक्ष निन्दा वाले तमाम उल्लेख भी जोड़ दें, जैसे ‘एक परिवार का राज’, ‘माँ-बेटा’, ‘शहजादे’, ‘आजादी के बाद से नीतियाँ’, ‘सत्तर साल का कांग्रेस शासन’, आदि, तब यह संख्या दो हजार तक पहुँच जाती है! इस तरह अपने सार्वजनिक भाषणों, संसद की चर्चाओं, और चुनावी रैलियों, आदि में भाजपा नेताओं ने नेहरू और कांग्रेस निन्दा की इन्तिहा ही कर दी है। ऐसे बेमतलब, असमय, बिलकुल अनर्गल भी जिस से सामान्य कांग्रेस विरोधियों को भी नेहरू से सहानुभूति हो जाए — ‘अरे, बस करो, दिवंगतों की ऐसी फजीहत अशोभनीय है।’
यह सब इसलिए और बेजा लगता है, क्यों कि नेहरू के जीवित रहते, और तब से इंदिरा, राजीव, नरसिंह राव, मनमोहन सिंह तक के प्रधान मंत्री रहते — संघ-भाजपा नेताओं ने शायद ही कभी ऐसी नेहरू निन्दा की थी। जबकि ये सब प्रधानमंत्री कोई जोसेफ स्टालिन या सद्दाम हुसैन नहीं थे, जो उन के सामने बोलने में जान का खतरा रहा हो! इसीलिए, उसी संघ-भाजपा द्वारा आज नेहरू की आदतन निन्दा एक कायराना प्रदर्शन भी हो जाता है।
क्योंकि यदि नेहरू की नीतियाँ इतनी हानिकारक थी, तो उन के जीवित रहते संघ और जनसंघ के नेताओं ने क्या किया था? यह खोजने पर एक उलटा ही नजारा मिलता है! उस का प्रमाणिक विवरण उपलब्ध है। इतिहासकार सीताराम गोयल ने ‘एकाकी’ उपनाम से 1961-62 में “इन डिफेन्स ऑफ कॉमरेड कृष्ण मेनन” शीर्षक से नेहरू की आलोचना करते हुए एक लेख-माला लिखी थी। वह आरएसएस के साप्ताहिक ‘ऑर्गनाइजर’ में प्रकाशित हो रही थी, तब जिसके संपादक के। आर। मलकानी थे। उस के 5 जून 1961 अंक से वे लेख प्रकाशित हुए थे। उस की बड़ी सराहना और चर्चा हो रही थी, कि सत्रहवें लेख के बाद वह लेख-माला अचानक बंद हो गई!
सीताराम गोयल ने बाद में अपनी आत्मकथा में बताया कि भारतीय जनसंघ के ‘हवाबाज नेता’ (जिस से स्पष्ट आशय अटल बिहारी वाजपेयी था) के हस्तक्षेप पर वह बंद हुई थी। जबकि वे लेख बड़े सटीक थे, जिस की चारो तरफ प्रशंसा हो रही थे। लोग लेखक को जानना चाहते थे जो उपनाम से लिख रहा था। उस के बाद, गोयल के शब्दों में: “इसलिए, मैं आश्चर्यचकित हुआ जब एक दिन बी।जे।एस। के उस हवाबाज ने मुझे पकड़ा, और ‘राष्ट्र के नेता के बारे में वह सब बकवास लिखने’ के लिए मुझे बुरी तरह डाँटा। मैंने संपादक से बात की, जिन्होंने मुझे बताया कि वह उस व्यक्ति से यह रहस्य छिपा नहीं सकते थे, जो बी।जे।एस। का सर्वोच्च नेता था।” (‘हाउ आइ बिकेम अ हिन्दू’, अध्याय 9)।
अतः, यह रिकॉर्ड पर है कि जब नेहरू जीवित थे तब उनके विरुद्ध कोई ‘बकवास’ संघ-परिवार के सर्वोच्च नेता को मंजूर नहीं थी! उसी नेता वाजपेई को वर्तमान भाजपा ने ‘भारत रत्न’ से भी सम्मानित किया। तब सहज प्रश्न उठता है कि नेहरू के बारे में कौन सही है — वाजपेयी या मोदी? यह भारतीय राजनीति का कोई छात्र पूछ सकता है।
हर हाल में, पिछले बारह वर्षों से नेहरू को जब-तब उल्टा-सीधा कहना राजनीति-प्रेरित है और छोटापन भी। फिर, नेहरू पर लगाए जा रहे आरोप एकांगी हैं। उस जमाने में पूरी दुनिया में समाजवाद का बौद्धिक, नैतिक बोलबाला था। तब एशिया-अफ्रीका के नव-स्वतंत्र देश ही नहीं, ग्रेट ब्रिटेन सहित अनेक यूरोपीय देशों में भी कम्युनिज्म से प्रभावित विचारों, नीतियों का प्रभाव था।
अतः नेहरू के जिन विचारों के कारण भारत के पिछड़ने का रोना अब भाजपाई रो रहे हैं, उन विचारों से तो खुद संघ-जनसंघ नेता भी प्रभावित थे! वरना, उन की पार्टी के घोषित सिद्धांत में आज भी ‘समाजवाद’ क्या कर रहा है? जरा देखना चाहिए कि गत बारह वर्षों में भाजपा के किसी भी नेता ने समाजवाद शब्द का कभी उल्लेख भी किया? यदि नहीं, तो यह प्रमाणित करता है कि जिस तरह 46 साल पहले भाजपा द्वारा अपने को ‘समाजवादी’ कहना मतिहीन था (क्योंकि समाजवाद तब दुनिया में अंतिम साँसें गिन रहा था), आज नेहरू की निन्दा करना वही मतिहीनता है! ऊपर से, किसी मरे हुए को मारते रहने की क्षुद्रता भी।
सो, अभी 18 अप्रैल वाला ‘राष्ट्र के नाम संदेश’ राष्ट्र के नेता नहीं, बल्कि पार्टी-नेता का भाषण था। जो चुनाव के समय राजकीय पद के दुरुपयोग का भी एक अपूर्व उदाहरण बना। क्योंकि उसी राष्ट्रीय मंच से, कांग्रेस नेता को भी अपना उत्तर देने की सुविधा नहीं दी गई। इस प्रकार, चुनावी आचार संहिता की दृष्टि से भी वह संदेश अनुचित था। यदि आज टी। एन। शेषन या अब्दुल कलाम अपने-अपने सर्वोच्च पद पर होते तो ऐसा ‘राष्ट्रीय से संदेश’ देने वाले की अच्छी खबर ली गई होती।
फिर, उस संदेश में नेहरू-निन्दा राजनीति प्रेरित भी है। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी ही 11 जून 2014 को संसद में यह कह चुके हैं — “मैं सभी पूर्व प्रधानमंत्रियों और पूर्व सरकारों का आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने देश को यहाँ तक पहुँचाने में योगदान दिया है।” तो उन की कौन सी बात असत्य है? दोनों सत्य नहीं हो सकती। आखिर, ‘देश को यहाँ तक पहुँचाने’ के लिए ‘आभार व्यक्त’ करने का मतलब ही है — सराहनीय योगदान।
तब नेहरू के किन कामों के लिए उन की सराहना है? वह देखा जाना चाहिए। उन में संसद में विरोधी दलों के प्रति सद्भाव, तथा सभी को खुल कर अपनी समझ से बोलने की पूरी स्वतंत्रता थी। नेहरू ने अपने सांसदों पर पार्टी-तानाशाही नहीं थोपी थी। उन में अपने को संपूर्ण देश का प्रतिनिधि मानकर बोलने की गंभीरता भी शामिल थी। नेहरू ने कभी पिछले शासकों या विरोधी दलों को कोसने में अपने को ओछा नहीं बनाया। वे अपने आलोचकों — राजगोपालाचारी, कृपलानी, लोहिया, जेपी, बलराज मधोक, आदि — का सम्मान करते थे। उसी क्रम में, विद्वानों, कलाकारों, और अपने क्षेत्र में अग्रणी लोगों का सम्मान भी शामिल था।
नेहरू और तमाम कांग्रेसी-राज काल में अकादमिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक संस्थाओं में सदैव जाने-माने विद्वान, कलाकार, और कलाप्रेमी ही कर्ताधर्ता होते थे। उन्हें अपने-अपने संस्थानों में पूरी स्वतंत्रता भी थी। तब स्वायत्त संस्थान सचमुच स्वायत्त थे! वहाँ जाकर कोई कांग्रेसी छुटभइया संस्थान पर यह वह करने का दबाव नहीं दे सकता था। यह अनायास न था। तमाम आईआईटी और विविध अकादमियाँ बनाने में नेहरू और इंदिरा ने उन के निर्माण व गुणवत्ता में उच्च अंतरराष्ट्रीय मानदंडों का ध्यान रखा था। तुलना में भाजपा ने गत दशकों में क्या बनाया, और क्या बिगाड़ा — यह पूरे अकादमिक-सांस्कृतिक क्षेत्र का सरसरी पर्यवेक्षण भी दिखा देता है।
बहरहाल, जिस तरह से नेहरू-निन्दा एक स्थाई परियोजना-सी चल रही है — उस से संघ-परिवार की बौद्धिक हालत पर संदेह होता है। क्या वे सचमुच विचारों में इतने खाली हैं? कि अपना कोई काम दिखा कर, या अपनी किसी ठोस योजना से देशवासियों का भरोसा जीत सकें? केवल दूसरे को नीचा कहकर अपने को ऊँचा दिखाने की कल्पना दिमागी खालीपन है। भाजपा के पास अपने तीस, या अठारह वर्षों के शासकीय रिकॉर्ड में, स्वत: भिन्न और श्रेष्ठ किया हुआ दिखाने, उस पर अभिमान करने को कुछ नहीं है?
तब तो, गालिब के सहारे यही उलाहना ठीक है —
“वाइ’ज न तुम पियो न किसी को पिला सको/
क्या बात है तुम्हारी शराब-ए-तहूर की।”
