एक ओर मिट्टी के दीयों का पारंपरिक, स्निग्ध और प्राणवान उजाला है, तो दूसरी ओर लिक्विड क्रिस्टल डिस्प्ले और ऑर्गेनिक लाइट एमिटिंग डायोड की नीली स्क्रीनों से उत्सर्जित होने वाला कृत्रिम, संवेगहीन प्रकाश है। प्राचीन भारतीय मनीषा ने प्रकाश को कभी भी केवल दृश्यता का साधन नहीं माना। ऋग्वेद के अक्ष सूक्त से लेकर उपनिषदों की दार्शनिक ऋचाओं तक, प्रकाश ज्ञान और आत्मिक जागृति का संवाहक रहा है।
उपनिषद वचन तमसो मा ज्योतिर्गमय मात्र एक प्रार्थना नहीं, अपितु मानव चेतना की ऊर्ध्वगामी यात्रा का शाश्वत मानचित्र है। सनातन संस्कृति मूलतः प्रकाश की आराधिका है। यहां प्रकाश जड़ भौतिकता का पर्याय नहीं, बल्कि चैतन्य का स्फुरण है। जब हम दीपावली की बात करते हैं, तो यह केवल एक कालगणना आधारित पर्व नहीं, अपितु समष्टि (ब्रह्मांड) और व्यष्टि (पिंड) के अंतःसंबंधों का महाउत्सव है। कार्तिक की अमावस्या, जो नैसर्गिक रूप से सघन अंधकार की पराकाष्ठा है, उस रात्रि को कोटि-कोटि दीपशिखाओं से आलोकित कर देना मनुष्य के अदम्य संकल्प का प्रतीक है। परंतु, इक्कीसवीं शताब्दी के तृतीय दशक में, जब सूचना प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने मानवीय जीवन के प्रत्येक आयाम को पुनर्रेखांकित कर दिया है, प्रकाश की परिभाषा और उसकी अनुभूति दोनों में एक युगांतरकारी विवर्तन आया है। आज का मानव दो प्रणालियों के संधिकाल पर खड़ा है- एक ओर मिट्टी के दीयों का पारंपरिक, स्निग्ध और प्राणवान उजाला है, तो दूसरी ओर लिक्विड क्रिस्टल डिस्प्ले और ऑर्गेनिक लाइट एमिटिंग डायोड की नीली स्क्रीनों से उत्सर्जित होने वाला कृत्रिम, संवेगहीन प्रकाश है। प्राचीन भारतीय मनीषा ने प्रकाश को कभी भी केवल दृश्यता का साधन नहीं माना। ऋग्वेद के अक्ष सूक्त से लेकर उपनिषदों की दार्शनिक ऋचाओं तक, प्रकाश ज्ञान और आत्मिक जागृति का संवाहक रहा है। ऋग्वेद के प्रथम सूक्त का प्रथम मंत्र ही अग्नि को समर्पित है-
अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्।
यहां अग्नि केवल भौतिक पावक नहीं है, बल्कि वह चेतना की प्रथम रश्मि है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार “अग्निर्वा एतस्य लोकस्य प्रदीपकः” अर्थात अग्नि इस लोक को प्रदीप्त करने वाली शक्ति है। मिट्टी का दीया इसी आधिभौतिक अग्नि का लौकिक और सुलभ रूप है। तैत्तिरीय उपनिषद में प्रकाश को ब्रह्म का स्वरूप माना गया है- ॐ खं ब्रह्म। जब हम दीपावली पर मिट्टी का दीपक प्रज्वलित करते हैं, तो हम वास्तव में ब्रह्मांडीय ऊर्जा के एक अंश को अपने आंगन में प्रतिष्ठित करते हैं। स्कंद पुराण के काशी खंड में कार्तिक मास में दीपदान की महिमा गाते हुए कहा गया है कि जो भी जीव, चाहे वह कीट हो, पतंग हो, वृक्ष हो या जल-स्थल का कोई प्राणी, इस पावन दीपज्योति का दर्शन करता है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने की ओर अग्रसर होता है। यह श्लोक यह प्रमाणित करता है कि पारंपरिक दीप का प्रकाश केवल मानव केंद्रित नहीं था, वह संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को स्पंदित करता था। वर्तमान युग स्क्रीन प्रधान हो चुका है। स्मार्टफोन, टैबलेट, लैपटॉप और टेलीविजन की स्क्रीनों ने हमारी आंखों को एक ऐसे प्रकाश से बांध दिया है, जो अनवरत है परंतु अचेतन है। इस प्रकाश को वैज्ञानिक शब्दावली में शॉर्ट वेवलेंथ विजिबल लाइट या ब्लू लाइट कहा जाता है। वेदांत दर्शन में माया को परिभाषित करते हुए कहा गया है-
या मा सा माया ।
अर्थात- जो वास्तव में नहीं है, पर प्रतीत होती है।
स्क्रीन की रोशनी इसी दार्शनिक माया का भौतिक अवतार है। स्क्रीन पर दिखने वाले रंग, उत्सव के दृश्य, डिजिटल दीये और हैप्पी दिवाली के जगमगाते एनिमेशन हमें एक क्षणिक आह्लाद तो देते हैं, परंतु वे हृदय को स्पर्श नहीं कर पाते। वे केवल चक्षु इंद्रिय (आंखों) को भ्रमित करते हैं। डिजिटल प्रकाश एकाकीपन को जन्म देता है। मिट्टी का दीया पूरे परिवार को, समाज को एक सूत्र में पिरोता था- तेल डालना, बत्ती बनाना, पंक्तियों में सजाना। इसके विपरीत, स्क्रीन की रोशनी व्यक्ति को आत्म केंद्रित बनाती है। व्यक्ति त्योहार के दिन भी समाज से कटकर अपनी स्क्रीन की कृत्रिम आभा में खोया रहता है। यह प्रकाश जोड़ता नहीं, बल्कि आभासी जुड़ाव का भ्रम पैदा करके वास्तविक अलगाव को गहरा करता है।
उल्लेखनीय है कि पारंपरिक दीयों के प्रकाश और आधुनिक स्क्रीन की रोशनी के बीच बहुआयामी अंतर है। पारंपरिक दीयों का उजाला (स्निग्ध प्रकाश) भौतिक प्रकृति पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का जीवंत संयोजन है, वहीं आधुनिक स्क्रीन की रोशनी (डिजिटल आभा) दुर्लभ मृदा तत्वों और सिलिकॉन की यांत्रिक अभिव्यक्ति है। पारंपरिक दीयों का उजाला का जैविक प्रभाव जहां मेलाटोनिन हार्मोन को संतुलित करता है, आंखों को शीतलता प्रदान करता है। वहीं आधुनिक स्क्रीन की रोशनी सार्केडियन रिदम को नष्ट करती है, अनिद्रा और तनाव उत्पन्न करती है। स्निग्ध प्रकाश का पारिस्थितिकीय मूल्य पूर्णतः पर्यावरण-अनुकूल, मिट्टी में विलीन होने वाली है, वहीं डिजिटल आभा ई कचरा और कार्बन फुटप्रिंट में अनियंत्रित वृद्धि करने वाली है। पारंपरिक दीयों का उजाला सामाजिक चेतना सामुदायिक सहभागिता, श्रम की प्रतिष्ठा और समरसता का प्रतीक है, वहीं आधुनिक स्क्रीन की रोशनी वैयक्तिक संकीर्णता, सोशल मीडिया आधारित दिखावा और एकाकीपन का प्रतीक है। स्निग्ध प्रकाश का आध्यात्मिक स्पंदन अंतर्मुखी चेतना का जागरण करता है, वहीं डिजिटल आभा बहिर्मुखी वासनाओं और उपभोक्तावाद का विस्तार।
प्राचीन ऋषियों ने अहोरात्र (दिन और रात) के चक्र को प्रकृति का अचूक नियम माना था। ऋग्वेद के मंत्र- ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत, के अनुसार प्रकृति की व्यवस्था ऋत पर टिकी है। हमारा शरीर भी इसी ऋत से संचालित होता है, जिसे आधुनिक विज्ञान सार्केडियन रिदम कहता है। मिट्टी के दीपक से निकलने वाला प्रकाश स्पेक्ट्रम के लाल और पीले छोर पर होता है। यह प्रकाश सूर्यास्त के बाद हमारे मस्तिष्क की पीनियल ग्रंथि से स्रावित होने वाले मेलाटोनिन हार्मोन के मार्ग में बाधा नहीं बनता। इसके विपरीत, यह आंखों की सीलिएरी मांसपेशियों को शिथिल करता है और मन को ध्यान की अवस्था में ले जाता है। इसके विपरीत, स्क्रीनों से निकलने वाली नीली रोशनी मस्तिष्क को यह भ्रम देती है कि अभी भी मध्याह्न (दोपहर) का समय है। इसके कारण मेलाटोनिन का स्राव रुक जाता है। दीपावली की रात्रि को जब लोग दीये बुझाकर देर रात तक स्मार्टफोन पर रील्स या सोशल मीडिया पोस्ट देखते हैं, तो वे अपनी जैविक घड़ी को विकृत कर रहे होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह प्रज्ञापराध है, अर्थात जानते हुए भी बुद्धि का अपराध करना, जो अंततः वात, पित्त और कफ के असंतुलन के रूप में शारीरिक और मानसिक रोगों को जन्म देता है।
दीपावली केवल एक धार्मिक कृत्य नहीं है, वरन यह भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का रीढ़ की हड्डी रही है। ऋग्वेद का पुरुष सूक्त समाज को एक आंगिक इकाई के रूप में देखता है। समाज का हर वर्ग एक-दूसरे पर आश्रित है। जब एक नागरिक कुम्हार से मिट्टी के दीये, तेली से सरसों का तेल, और बुनकर से सूती बत्ती खरीदता है, तो वह धन का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करता है। ईशोपनिषद् का पहला ही वाक्य है-
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।
अर्थात- त्यागपूर्वक उपभोग करो।
मिट्टी का दीया इसी त्याग और सह-अस्तित्व का प्रतीक है। दूसरी ओर, स्क्रीन की रोशनी और डिजिटल उत्पाद बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पूंजीवादी साम्राज्य को सुदृढ़ करते हैं। जब हम चीनी लाइटें या महंगे गैजेट्स खरीदते हैं, तो देश की संपदा का संकेंद्रण कुछ गिने-चुने हाथों में हो जाता है। स्क्रीन हमें उपभोक्ता बनाती है, जबकि दीया हमें दाता और सहयोगी बनाता है। डिजिटल युग की दीपावली में बाज़ार ने भाव का स्थान ले लिया है, जिससे त्योहार की आत्मा ही संकुचित हो गई है। हम न तो अतीत के अंधानुकरण में जिएं और न ही आधुनिकता की अंधी दौड़ में अपनी जड़ों को काट लें। सत्य हमेशा मध्य में प्रतिष्ठित होता है-
अति सर्वत्र वर्जयेत्।
तकनीक और स्क्रीन हमारे जीवन का अपरिहार्य हिस्सा बन चुके हैं। हम चाहकर भी सूचना युग से पीछे नहीं लौट सकते और न ही हमें लौटना चाहिए। परंतु, चुनौती यह है कि हम तकनीक के दास न बनें, बल्कि उसके स्वामी रहें। दीपावली के पावन पर्व पर हमें डिजिटल उपवास का संकल्प लेना होगा। लक्ष्मी पूजा और दीप प्रज्वलन के समय स्क्रीनों को विश्राम देना होगा, ताकि हम उस प्रकाश के वास्तविक स्पंदन को महसूस कर सकें। स्क्रीनों की रोशनी से ज्ञान का संवर्धन अवश्य करें, परंतु मन के अंधकार को मिटाने के लिए मिट्टी के दीये की शरण में ही जाना होगा। जब तक हमारे भीतर करुणा, परोपकार और विवेक का दीपक नहीं जलेगा, तब तक चाहे जितने लुमेन की स्क्रीनें चमका ली जाएं, समाज का अंतस अंधकारमय ही रहेगा। आइए, इस दीपावली पर अपनी जड़ों की ओर लौटें। स्क्रीन की नीली आभा को थोड़ा धीमा करें और मिट्टी के उस छोटे से दीपक की लौ को गौर से देखें, जो हवा के थपेड़ों से लड़ते हुए भी मुस्कुराना सिखाती है। वही लौ शाश्वत सत्य है, वही सनातन प्रकाश है।
