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दुनिया में जंगल राज लाने पर आमादा ट्रंप

ट्रंप का यह आकलन कि अमेरिकी प्रभुत्व को मजबूत करने के लिए वे किसी भी सैन्य, आर्थिक या राजनीतिक शक्ति का स्वतंत्र रूप से उपयोग कर सकते हैं, उनके विश्व दृष्टिकोण की सबसे स्पष्ट स्वीकारोक्ति है। इसके मूल में यह विचार है कि जब शक्तियां टकराती हैं तो निर्णायक तत्व कानून, संधियां और परंपराएं नहीं, बल्कि राष्ट्रीय ताकत होना चाहिए।

डॉनल्ड ट्रंप ने दो-टूक एलान किया है कि अमेरिकी फौज के सर्वोच्च सेनापति के रूप में उनकी शक्ति पर केवल उनकी “अपनी नैतिकता” ही अंकुश लगा सकती है।

न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय कानून और अन्य नियंत्रणों को दरकिनार करते हुए कहा कि दुनिया भर में सैन्य शक्ति के जरिए आक्रमण करने या दूसरे राष्ट्रों को बाध्य करने की उनकी क्षमता पर कोई “बाहरी” रोक नहीं है।

जब उनसे पूछा गया कि क्या उनकी वैश्विक शक्तियों पर कोई सीमा है, तो ट्रंप ने कहा: “हां, एक चीज़ है। मेरी अपनी नैतिकता। मेरा अपना मन। यही एकमात्र चीज़ है, जो मुझे रोक सकती है।” उन्होंने आगे कहा: “मुझे अंतरराष्ट्रीय कानून की ज़रूरत नहीं है।” जब न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकारों ने जोर देकर पूछा कि क्या उनके प्रशासन को अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करना चाहिए, तो ट्रंप ने कहा- “हां।” लेकिन लगे हाथ उन्होंने स्पष्ट किया कि यह तय करने वाले वे ही होंगे कि ऐसे प्रतिबंध अमेरिका पर कब लागू होंगे।

ट्रंप ने यह इंटरव्यू न्यूयॉर्क टाइम्स के चार पत्रकारों की टीम को दिया। उसका सार पेश करते हुए अखबार ने लिखा- ‘ट्रंप का यह आकलन कि अमेरिकी प्रभुत्व को मजबूत करने के लिए वे किसी भी सैन्य, आर्थिक या राजनीतिक शक्ति का स्वतंत्र रूप से उपयोग कर सकते हैं, उनके विश्व दृष्टिकोण की सबसे स्पष्ट स्वीकारोक्ति है। इसके मूल में यह विचार है कि जब शक्तियां टकराती हैं तो निर्णायक तत्व कानून, संधियां और परंपराएं नहीं, बल्कि राष्ट्रीय ताकत होना चाहिए।’ (Trump Addresses Venezuela, Greenland and Presidential Power in New York Times Interview – The New York Times)

साफ है, ट्रंप के काल में अमेरिका ने खुल कर शक्ति- यानी जिसकी लाठी, उसकी भैंस- के सिद्धांत का एलान कर दिया है। इसका अर्थ है कि दुनिया की सबसे बड़ी सैनिक शक्ति ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों और बहुपक्षीय सहयोग की परंपराओं को सिरे से ठुकरा दिया है। ट्रंप ने उपरोक्त उसी हफ्ते इंटरव्यू दिया, जिसमें उनके प्रशासन ने 66 अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से अमेरिका को अलग करने का फैसला किया। इनमें अनेक संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएं हैं। उसके पहले भी ट्रंप प्रशासन कई महत्त्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संधियों, समझौतों और संस्थानों से अपने देश को हटा चुका है। यानी अब यह कहने का आधार है कि अमेरिका ने अपनी तमाम अंतरराष्ट्रीय वचनबद्धताओं से खुद को ज़ुदा कर लिया है।

इसके साथ ही, सिर्फ अगर नए साल की घटनाओं की पर गौर करें, तो ऐसा मालूम पड़ता है कि डॉनल्ड ट्रंप पर इस समय युद्ध-उन्माद छाया हुआ है। वेनेजुएला पर हमला कर वहां के राष्ट्रपति और प्रथम महिला का अपहरण करवाने के बाद उन्होंने क्यूबा, कोलंबिया, मेक्सिको, ईरान, और ग्रीनलैंड पर कब्जा करने के लिए डेनमार्क पर हमले की धमकी दे रखी है। ग्रीनलैंड पर कब्जा करने के अपने जुनून में उन्होंने पूरे यूरोप को अनिश्चय एवं अस्थिरता में डाल रखा है। इनमें कई कार्रवाइयां उन्होंने चीन या रूस के कथित खतरे को दिखाते हुए आगे बढ़ाई हैं। संदेश यह है कि अपनी सैन्य शक्ति के प्रदर्शन से वे ऐसी परिस्थिति बनाएंगे, जिससे गुजरे दशकों में खासकर चीन से अमेरिकी वर्चस्व के लिए जो चुनौतियां पेश आईं, उनका निवारण हो जाएगा।

ट्रंप प्रशासन ने अपनी नई राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति में भी इसी मकसद का एलान किया। उसके मुताबिक सोच यह है कि पहले पश्चिमी गोलार्द्ध यानी लैटिन अमेरिका में अमेरिकी वर्चस्व को वापस कायम किया जाए। उसके बाद अगली चुनौतियों की ओर बढ़ा जाएगा। वेनेजुएला पर हमले को इस रणनीति पर अमल की शुरुआत माना गया। कहा गया कि इसके जरिए लैटिन अमेरिका में चीन के फैले कदम को लौटाने की शुरुआत कर दी गई है।

मगर क्या इस आक्रामकता के जरिए ट्रंप “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन”- यानी अपने देश का विश्व वर्चस्व पुनर्स्थापित करने का मकसद सचमुच हासिल कर पाएंगे? इस सवाल पर आगे बढ़ने से पहले अमेरिका-चाइना वॉचर नामक एक सोशल मीडिया हैंडल द्वारा की गई इस टिप्पणी पर गौर करना माकूल होगाः

‘अमेरिका अब चीन को लैटिन अमेरिका से बाहर नहीं निकाल सकता। ट्रंप का नया ‘मुनरो सिद्धांत’ बहुत देर से आया है।

जब ट्रंप लैटिन अमेरिका को “वापस लेने”, मुनरो सिद्धांत को पुनर्जीवित करने, वेनेजुएला, पनामा, ब्राजील और पूरे महाद्वीप को वापस अमेरिका के विशेष अधिकार क्षेत्र में खींच लाने की बात करते हैं, तो बहुत से लोग इसे ताकत समझते हैं।

लेकिन यह ताकत नहीं है। यह कमजोरी का प्रदर्शन है। केवल वही व्यक्ति खेल के बीच मेज पलट देता है, जिसके पास फेंकने के लिए कोई पत्ता न बचा हो। केवल ऐसा जुआरी ही डकैती का रास्ता अख्तियार करता है, जो दिवालियापन के कगार पर हो।

अगर अमेरिकी प्रतिबंध अब भी काम करते, अगर डॉलर का वर्चस्व अब भी कायम होता, अगर राजनीतिक दबाव, वित्तीय युद्ध और कूटनीतिक अलगाव अब भी परिणाम दे रहे होते, तो अमेरिका को खुद इस कीचड़ में कूदने की जरूरत नहीं पड़ती- खुलेआम अपहरण करने, सरकार बदलने की धमकियां देने, या संसाधनों को जब्त करने की आवश्यकता उसे नहीं होती।

यह ताकत का प्रदर्शन नहीं है। यह साम्राज्य की अवसान अवस्था की लपटें हैं।

इस संघर्ष का परिणाम इस बात पर निर्भर नहीं करता कि निकोलस मदुरो बचते हैं या नहीं-  या कोई सरकार गिरती है या नहीं। यह कहीं अधिक सामान्य और भौतिक चीजों पर निर्भर करता है। जब अमेरिका उस क्षेत्र (लैटिन अमेरिका) को हेय दृष्टि से देखते हुए उसे अपना “पिछवाड़ा” (backyard) कहता है, तो उसे वहां अब अमेरिकी भूमि नजर नहीं आती। उसे खेतों में चीनी सोयाबीन उगा नजर आता है। बंदरगाहों में चीनी क्रेन कंटेनर लादते दिखते हैं। चीनी पावर ग्रिड, दूरसंचार प्रणालियां, सड़कें और रेलवे रोजमर्रा की जिंदगी में स्थिरता से काम करती नजर आती हैं।

यह परिघटना किसी विचारधारा से अधिक शक्तिशाली है। यह आधारभूत संरचना है, जो अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। आधारभूत संरचना किसी के आदेश मात्र से गायब नहीं हो जाती। चीन को लैटिन अमेरिका से निकालना, उस आधारभूत संरचना को निकालना और नाजुक अर्थव्यवस्थाओं को ढहा देना होगा।

इस परिघटना की परिणति कथा के पात्र हैः संसाधन, भौतिक संपत्तियां (Collateral), और डॉलर पर बढ़ता दबाव।

ट्रंप की वेनेजुएला संबंधी जिद लोकतंत्र, मानवाधिकार- और पारंपरिक अर्थों में तेल के बारे में भी नहीं है। यह Collateral के बारे में है। अमेरिका अपने ही बैलेंस शीट से घिर गया है। अकेले आने वाले वर्ष में कर्ज चुकाने के लिए उसे लगभग पांच ट्रिलियन डॉलर के नए ट्रेजरी ऋण जारी करने होंगे। लेकिन अब कम देश ही बड़े पैमाने पर अमेरिकी ऋण खरीदने को तैयार हैं। दुनिया का कॉमोडिटी व्यापार धीरे-धीरे डॉलर से मुक्त हो रहा है। अगर अमेरिका को नोट छापकर अपने ही ट्रेजरी बॉन्ड्स को वापस खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा, तो मुद्रास्फीति अनियंत्रित हो जाएगी। वह रास्ता अपनाना कठिन है।

इसलिए वाशिंगटन में यह नया सिद्धांत उभरा है: वास्तविक संपत्तियों के विशाल भंडार- तेल, गैस, रेयर अर्थ खनिज- पर कब्जा करो, उन्हें फिर से डॉलर से जोड़ो, और उसे आधार बना कर अपनी मुद्रा में भरोसा बहाल करो।

वेनेजुएला।

ग्रीनलैंड।

लैटिन अमेरिका।

कागज पर वेनेजुएला के तेल भंडार का मूल्य दसियों ट्रिलियन डॉलर है। लेकिन हकीकत में वेनेजुएला के तेल को इतनी आसानी से बिक्री योग्य नहीं बनाया जा सकता। इस रूप में वेनेजुएला का तेल एक किस्म का जाल है।

वेनेजुएला का कच्चा तेल दुनिया में सबसे मुश्किल से रिफाइन्ड होने वाले तेलों में से एक है। यह अत्यधिक भारी है और जमीन के अंदर गहराई में दबा है। इसे निकालने, परिशोधन एवं परिवहन के लिए अत्यंत परिष्कृत आधारभूत संरचना की आवश्यकता है। धरती पर केवल दो देशों के पास इतनी तकनीकी और औद्योगिक क्षमता है कि वे ऐसी प्रणालियों का बड़े पैमाने पर निर्माण और संचालन कर सकें: चीन और अमेरिका।

चीन पहले ही वहां ऐसा कर चुका है। चीन वेनेजुएला के लगभग 70 फीसदी  तेल का खरीदार है। चीन ने उस अधिकांश आधारभूत संरचना को बनाने और संचालन में धन लगाया है। उससे ही वहां का तेल उपयोग और निर्यात के योग्य बनता है। अगर चीन को बाहर धकेला गया, तो उसकी जगह कौन लेगा?

अमेरिकी तेल कंपनियों- शेवरॉन, एक्सॉन मोबिल, कोनोको फिलिप्स (सीओपी)- के पास पांच वर्ष में सौ बिलियन डॉलर वहां खर्च करने को लेकर कोई उत्साह नहीं है। इसकी वजह यह भी है कि राजनीतिक हवा का रुख बदलते ही फिर से वहां तेल कारोबार का राष्ट्रीयकरण हो सकता है। और अगर अमेरिकी कंपनियां आ भी गईं, तो वे तेल बेचेंगी किसे?

चीन ही एकमात्र ऐसा खरीदार है, जिसके पास इस तेल की खपत के लिए उतनी विशाल अर्थव्यवस्था और उसके इस्तेमाल के लिए तकनीकी क्षमता है। साथ ही जिसे इस तेल को उपयोग योग्य बनाने का धीरज है। अगर चीन की परिसंपत्तियों को वेनेजुएला में जब्त किया जाता है और उसे प्रतिबंधित कर दिया जाता है, तो फिर चीन बदले की कार्रवाई जरूर करेगा। उससे आपूर्ति शृंखलाएं बाधित होंगी। बाजार प्रभावित होंगे। आखिर प्रतिबंध दोनों तरफ से लगेंगे। ये वो तर्क हैं, जिनके तले अमेरिका के वेनेजुएला संबंधी ख्वाब दबकर धराशायी हो जाते हैं।’

हमने इस पोस्ट का इतने विस्तार से हवाला इसलिए दिया, क्योंकि वह दशकों के घटना- विकास को पलटने की ट्रंप की जिद का सही चित्रण करता है। आखिर जो स्थितियां वेनेजुएला में हैं, ग्रीनलैंड या अन्य क्षेत्रों के हालात उससे थोड़े-बहुत ही अलग हैं। वहां की हकीकतें भी अमेरिका के अनुकूल नहीं हैं। इन हकीकतों पर नजर डालते हुए अवश्य ही अमेरिकी साम्राज्य के संचालकों की छाती पर सांप लोटते होंगे। ये कांटे हर गुजरते वर्ष के साथ अधिक धारदार होते गए हैं।

मार्के की बात यह है कि अमेरिका का विश्व वर्चस्व जिन शक्तियों से बना था, उनमें से सिर्फ सैन्य शक्ति उसके पास रह गई है। उत्पादक अर्थव्यवस्था से संपन्नता एवं खुशहाली का जो सपना उसकी छवि से जुड़ा था, वह ध्वस्त हो चुका है। वहां यह कैसे हुआ, इसका एक उम्दा चित्रण हाल में ऑस्ट्रेलियाई निवेशक क्रेग टिंडेल ने किया। उन्होंने लिखा- ‘अर्थव्यवस्था के वित्तीयकरण ने ऐसी विश्व दृष्टि फैलाई, जिसमें पूंजी प्रवाह को वास्तविक आर्थिक शक्ति से अधिक अहम समझा जाने लगा, वित्तीय संपत्तियों को उत्पादन पर तरजीह दी जाने लगी, अटकलबाजी (speculation) को उत्पादन क्षमता से श्रेष्ठ माने जाने लगा। इस क्रम में शेयर बाईबैक को ब्लास्ट फर्नेस से अधिक सम्मानजक समझते हुए उसे प्रगति बताया जाने लगा। लेकिन यह असल में खुद को निरस्त्र करना था। अब भ्रम टूट रहा है।’ ((1) 🇦🇺Craig Tindale on X: “Critical Materials: A Strategic Analysis ” / X)

किसी साम्राज्य के लिए अपने पांव के नीचे से खिसकी जमीन को स्वीकार करना आसान नहीं होता। अमेरिकी शासक वर्ग आज इसी मनोदशा से गुजर रहा है। कहा जा सकता है कि वह Thucydides Trap का शिकार है, जिसका नतीजा सारी दुनिया को भुगतना पड़ रहा है। Thucydides Trap एक सिद्धांत है, जिसकी व्याख्या प्राचीन यूनानी चिंतक थ्यूसीडाइड्स ने की थी। उसके मुताबिक जब कोई उभरती शक्ति (rising power) तेज़ी से बढ़ती है और मौजूदा स्थापित शक्ति (established power) को चुनौती देती है, तो दोनों के बीच टकराव या युद्ध की संभावना बढ़ जाती है। जाहिरा तौर पर स्थापित शक्ति अमेरिका को चुनौती आज की उभरती शक्ति चीन से मिल रही है।

मगर जैसाकि क्रेग टिंडेल ने व्याख्या की है, चीन उस मैदान पर मुकाबला नहीं कर रहा है, जहां अमेरिका अभी भी ताकतवर है। उसकी रणनीति सीधे सैन्य युद्ध में ना उलझने की है। इसके बदले उसने इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण, व्यापार, आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग आदि के जरिए मुकाबले की अलग जमीन तैयार की है, जहां अमेरिकी ताकत नाकाफी हो चुकी है। उस रणनीति से मिली ताकत के आधार पर चीन अपने सॉफ्ट पॉवर का निर्माण कर रहा है, जो उससे अलग किस्म का है, जिससे एक समय अमेरिकी का रुतबा बनता था। अमेरिका का सॉफ्ट पॉवर लोकतंत्र, मानव अधिकार, सांस्कृतिक खुलापन आदि के पहरुए के कथानक से बना था। लेकिन कुछ तो खुद उसके अपने व्यवहार और कुछ सोशल मीडिया के प्रसार के कारण वह अमेरिकी सॉफ्ट पॉवर क्षीण होता चला गया है। दूसरी तरफ खुशहाली साझा करने की सोच, अभिवाज्य सुरक्षा (indivisible security) और सभ्यताओं की समानता की पैरोकारी करते हुए चीन ने उन क्षेत्रों में अपने लिए सद्भावना पैदा की है, जो पहले खुद को उपेक्षित महसूस करते थे।

इन परिस्थितियों में अमेरिकी शासकों का भरोसा सिर्फ सैन्य बल पर टिक गया है, तो उसे समझा जा सकता है। मगर इस बल के जरिए विनाश के अलावा कुछ हासिल नहीं हो सकता। अमेरिकी शासक आत्म-निरीक्षण करें, तो उन्हें अहसास होगा कि वियतनाम से लेकर अफगानिस्तान तक और सीरिया से लेकर लीबिया और सोमालिया तक- और वेनेजुएला में भी- उन्होंने सैन्य कार्रवाइयों से तहस-नहस तो बहुत कुछ किया, लेकिन कहीं भी अपने घोषित सैन्य उद्देश्य की प्राप्ति नहीं कर पाए। जाहिर है, आगे भी वे ऐसा नहीं कर पाएंगे। उनके वश में सिर्फ अब यह रहा गया है कि कुछ समय के लिए वे दुनिया में जंगल राज जैसे हालात बना दें। मगर देर-सबेर व्यवस्था फिर से कायम होगी- और तब दुनिया देखेगी कि एक समय का सम्राट क्षत-विक्षत पड़ा है, जैसाकि अतीत में अनेक साम्राज्यों के साथ हुआ है!

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