अशोक की महत्ता इस बात में है कि उन्होंने शासन को नैतिकता से जोड़ा। उन्होंने सिद्ध किया कि सच्ची महानता साम्राज्य के विस्तार में नहीं, बल्कि प्रजा के चरित्र के उत्थान में है। वे आज भी भारतीय चेतना के ऐसे प्रतीक हैं, जो शक्ति और करुणा के संतुलन की प्रेरणा देते हैं। …भारतीय कला को पत्थरों पर अमर करने का श्रेय भी अशोक को जाता है। उनके बनाए एकाश्म स्तंभ और शिलालेख केवल स्थापत्य के सुंदर नमूने नहीं हैं, बल्कि वे इतिहास के जीवित दस्तावेज भी हैं।…
भारतीय इतिहास के विशाल फलक पर सम्राट अशोक एक ऐसे चमकते नक्षत्र हैं, जिनका प्रभाव केवल सीमाओं को जीतने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने मनुष्य के हृदय को जीतने का रास्ता दिखाया। मौर्य वंश के तीसरे शासक के रूप में अशोक का महत्व सिर्फ एक चक्रवर्ती सम्राट होने में नहीं, बल्कि एक धम्म-विजयी सुधारक के रूप में है। अशोक का सबसे बड़ा महत्व उनके जीवन में आए परिवर्तन में छिपा है। कलिंग युद्ध के भयानक रक्तपात ने उन्हें विजय की पुरानी परिभाषा बदलने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने भेरीघोष यानी युद्ध का नाद छोड़कर धम्मघोष यानी नैतिकता का मार्ग अपनाया। इतिहास में यह बहुत दुर्लभ उदाहरण है, जब कोई विजेता अपनी शक्ति के चरम पर पहुँचकर हिंसा का त्याग कर दे।
अशोक ने धम्म के रूप में एक साझा नैतिक व्यवस्था दी। यह कोई संकीर्ण धर्म नहीं था, बल्कि माता-पिता की सेवा, बड़ों का सम्मान, जीवों के प्रति दया और सहिष्णुता जैसे मानवीय मूल्यों का संगम था। भारत जैसे विविध देश में उन्होंने भाषा और संस्कृति के स्तर पर एकता को बढ़ावा दिया। अशोक ने राजसत्ता को भी नया अर्थ दिया। उन्होंने घोषणा की—“सबे मुनिसे पजा ममा”, अर्थात सभी मनुष्य मेरी संतान हैं। सड़कों के किनारे छायादार पेड़ लगवाना, कुएँ खुदवाना और मनुष्यों के साथ-साथ पशुओं के लिए भी चिकित्सालय बनवाना उनकी दूरदर्शी सोच को दिखाता है। वे जनकल्याणकारी राज्य के एक प्रारंभिक रूप के निर्माता थे, जिसे आज हम वेलफेयर स्टेट कहते हैं।
भारतीय कला को पत्थरों पर अमर करने का श्रेय भी अशोक को जाता है। उनके बनाए एकाश्म स्तंभ और शिलालेख केवल स्थापत्य के सुंदर नमूने नहीं हैं, बल्कि वे इतिहास के जीवित दस्तावेज भी हैं। सारनाथ का सिंह-शीर्ष आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है और उनके धम्मचक्र को तिरंगे में स्थान मिलना उनकी स्थायी प्रासंगिकता का प्रमाण है। अशोक के बिना बौद्ध धर्म शायद एक सीमित क्षेत्रीय परंपरा बनकर रह जाता। उन्होंने इसे विश्व स्तर पर फैलाने के लिए अपने पुत्र महेंद्र और पुत्री संघमित्रा को विदेश भेजा। उन्होंने शांतिपूर्ण सहअस्तित्व और सांस्कृतिक प्रभाव के माध्यम से भारत की पहचान को मध्य एशिया से लेकर दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुँचाया।
अशोक की महत्ता इस बात में है कि उन्होंने शासन को नैतिकता से जोड़ा। उन्होंने सिद्ध किया कि सच्ची महानता साम्राज्य के विस्तार में नहीं, बल्कि प्रजा के चरित्र के उत्थान में है। वे आज भी भारतीय चेतना के ऐसे प्रतीक हैं, जो शक्ति और करुणा के संतुलन की प्रेरणा देते हैं। लेकिन यह विडंबना है कि जिस सम्राट ने भारत को एक सूत्र में पिरोया, वह सदियों तक भारतीय विमर्श और इतिहास की मुख्यधारा से लगभग गायब रहा। 19वीं सदी में जेम्स प्रिंसेप द्वारा उनके शिलालेख पढ़े जाने से पहले अशोक का नाम केवल पुरानी कथाओं तक सीमित था।
उनकी इस उपेक्षा के कई कारण थे। अशोक द्वारा बौद्ध धर्म को संरक्षण देने और पशु बलि पर रोक लगाने से उस समय की ब्राह्मणवादी व्यवस्था के हित प्रभावित हुए। इसी कारण पुराणों जैसे ग्रंथों में मौर्य वंश का उल्लेख तो मिलता है, लेकिन अशोक को उनके योग्य स्थान नहीं दिया गया। उन्हें अक्सर केवल एक शासक के रूप में बताया गया, न कि एक बड़े सुधारक के रूप में। समय के साथ जब भारत में बौद्ध धर्म का प्रभाव घटने लगा, तो अशोक की स्मृति भी धीरे-धीरे धुंधली पड़ गई। उनके शिलालेख पाली और प्राकृत भाषाओं में थे, और ब्राह्मी व खरोष्ठी लिपियों को पढ़ने वाले लोग भी खत्म हो गए। लोग स्तंभों को देखते थे, पर यह नहीं जानते थे कि ये “देवानांपिय दसी” यानी देवताओं के प्रिय राजा के हैं। इन्हें समझने के प्रयास में फिरोज शाह तुगलक ने कुछ स्तंभ दिल्ली मंगवाए थे।
मध्यकाल में इतिहास लेखन का ध्यान मुख्यतः दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य पर रहा। अहिंसा और धम्म पर आधारित शासन को राजनीतिक दृष्टि से उतना महत्व नहीं मिला। भारतीय इतिहास में महानता को अक्सर युद्ध और विजय से आँका गया, जैसे समुद्रगुप्त या चंद्रगुप्त मौर्य। अशोक ने अपने जीवन के अंतिम दौर में युद्ध छोड़ दिया था, जिसे कुछ इतिहासकारों ने कमजोरी मानकर उनकी छवि एक मजबूत शासक के बजाय एक भिक्षु राजा की बना दी। उनकी वास्तविक पहचान आधुनिक काल में तब सामने आई, जब औपनिवेशिक काल के विद्वानों ने उनके शिलालेख पढ़े। आज वे अशोक चक्र और सिंह-शीर्ष के रूप में भारतीय गणतंत्र के प्रतीक हैं।
फिर भी यह दुखद है कि आज तक राष्ट्रीय स्तर पर सम्राट अशोक की जयंती नहीं मनाई जाती और न ही उस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। इसका कारण ऐतिहासिक अस्पष्टता और आधुनिक राजनीतिक प्राथमिकताएँ हैं। अशोक की जन्म तिथि का कोई निश्चित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। बौद्ध ग्रंथों और शिलालेखों में उनके शासन का विवरण मिलता है, लेकिन जन्म तिथि को लेकर मतभेद हैं। बिना सर्वमान्य तिथि के सरकारी स्तर पर जयंती तय करना कठिन रहा है। आधुनिक काल में उनका इतिहास 1837 में ब्राह्मी लिपि पढ़े जाने के बाद सामने आया, तब तक शिवाजी और महाराणा प्रताप जैसे नायकों की तिथियाँ लोक स्मृति में स्थापित हो चुकी थीं। अशोक को इतिहास की पुस्तकों में स्थान मिला, लेकिन वे लोक-उत्सव का हिस्सा नहीं बन पाए।
किसी महापुरुष की जयंती और अवकाश अक्सर सामाजिक आंदोलनों या राजनीतिक दबाव से तय होते हैं। लंबे समय तक अशोक को केवल एक प्राचीन राजा के रूप में देखा गया। हालांकि हाल के वर्षों में बिहार सहित कुछ राज्यों में चैत्र शुक्ल अष्टमी को अशोक जयंती मनाने की शुरुआत हुई है, लेकिन यह राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य नहीं बन पाई है। स्वतंत्र भारत ने अशोक को व्यक्ति रूप में पूजने के बजाय उनके प्रतीकों—अशोक चक्र और सिंह-शीर्ष—को राष्ट्र का आधार बनाया। माना गया कि उनके आदर्श संविधान और राष्ट्रीय ध्वज में समाहित हैं, इसलिए अलग से जयंती या अवकाश पर कम ध्यान दिया गया। साथ ही, कार्यदिवस बढ़ाने की नीति के कारण नई छुट्टियाँ घोषित करने में भी सरकारें संकोच करती हैं।
आज भी विभिन्न सामाजिक संगठनों की मांग पर कुछ राज्यों में अशोक जयंती पर अवकाश घोषित किया गया है, और अन्य राज्यों में भी इसके लिए प्रयास हो रहे हैं। सम्राट अशोक केवल एक नाम नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास का गौरवपूर्ण अध्याय हैं। उनके प्रतीक आज भी राष्ट्रीय पहचान का हिस्सा हैं। ऐसे में उनके जन्मोत्सव पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
उनकी जन्म तिथि को लेकर इतिहास में स्पष्टता नहीं है। तीन प्रमुख मान्यताएँ प्रचलित हैं। सबसे अधिक मान्य तिथि भारतीय पंचांग के अनुसार चैत्र शुक्ल अष्टमी है, जिसे अशोकाष्टमी कहा जाता है। कई संगठनों का मानना है कि इसी दिन उनका जन्म हुआ था। वर्ष 2026 में यह तिथि 26 मार्च को पड़ी थी। इस दिन अशोक वृक्ष की पूजा और व्रत रखा जाता है, जिसे लोक परंपरा में अशोक की स्मृति से जोड़ा जाता है। बिहार सरकार ने 2015 में 14 अप्रैल को उनकी जयंती घोषित की, हालांकि इतिहासकार इसे अधिक प्रशासनिक निर्णय मानते हैं। अधिकांश विद्वानों के अनुसार अशोक का जन्म लगभग 304 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र में हुआ था, जिसका अनुमान उनके राज्याभिषेक और समकालीन यूनानी शासकों के संदर्भ से लगाया गया है।
दिव्यावदान और अशोकावदान जैसे ग्रंथों में उनके जीवन का वर्णन है, लेकिन तिथियों पर स्पष्टता नहीं है। उनके अपने शिलालेख भी जन्म तिथि का उल्लेख नहीं करते। लोककथाओं के अनुसार कलिंग युद्ध के बाद जब उन्होंने शस्त्र त्यागकर बुद्ध का मार्ग अपनाया, तो उसी दिन को उनके धम्म-जन्म के रूप में देखा जाता है। अशोकाष्टमी पर जीव दया और सात्विक पूजा की परंपरा इसी से जुड़ी है। उड़ीसा के भुवनेश्वर में इसी दिन भगवान लिंगराज की रथयात्रा निकलती है। कलिंग की भूमि, जिसने अशोक को बदला, वहाँ इस तिथि का विशेष महत्व होना उनके प्रभाव को दर्शाता है।
यद्यपि यह पर्व पहले से मनाया जाता था, लेकिन इसे औपचारिक रूप से अशोक जयंती के रूप में पहचान हाल के वर्षों में मिली है। सामाजिक आंदोलनों ने इसे एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व को पुनः स्थापित करने का माध्यम बनाया। अशोकाष्टमी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि उस समाज की स्मृति है, जो अशोक के ‘अ-शोक’ यानी शोक रहित जीवन के आदर्श को याद करता है।
