अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने लिखा- ‘युवा केवल एक ही चीज़ मांग रहे हैः शिक्षा तक पहुंच और गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन।…पूंजीवाद के नव-उदारवादी संस्करण ने जनता के बीच ऐसे विभाजन पैदा कर दिए हैं, जिनके परिणामों से अब यह व्यवस्था नहीं बच सकती। फिलहाल, ये परिणाम उथल-पुथल के रूप में हैं, लेकिन ऐसे ही हालात से कुछ नया बनने की सूरत भी पैदा होती हैं।
“हम इतिहास के एक महान पल से गुजर रहे हैं। दुनिया के हर कोने में इस समय छात्र आंदोलन हो रहे हैं।… नव-उदारवाद ने हर जगह सार्वजनिक सेवाओं और श्रमिकों की उपलब्धियों को तबाह कर दिया है और आम जन के लिए असहनीय स्थिति पैदा कर दी है। ऐसे आंदोलन तब होते हैं, जब दुनिया भर में आबादी के विशाल बहुमत से अपने दम पर कामयाब होने की उम्मीद छीन ली जाती है”- फ्रांस और दुनिया के अनेक देशों में इस समय युवा/जन आंदोलन से मची उथल-पुथल के बीच यह टिप्पणी फ्रांस की प्रमुख वामपंथी पार्टी ‘अदम्य फ्रांस’ (La France Insoumise- LFI) के नेता ज्यां-लुक मेलेन्शॉ ने की।
तमाम देशों में जारी आंदोलनों के बीच दुनिया का सबसे ज्यादा ध्यान फ्रांस पर केंद्रित हुआ है। फ्रांस में भड़के जन असंतोष के कारणों का जिक्र करते हुए मेलेन्शॉ ने कहा- ‘लोग भूखे हैं। लोगों में इतनी क्षमता नहीं बची कि वे अपने घर पहुंचने लायक अपनी कार में तेल भरवा सकें। 90 लाख लोग गरीबी में जी रहे हैं। छात्रों को एक यूरो कीमत वाले भोजन के लिए कतारों में खड़े होना पड़ रहा है।’
फ्रांस में सितंबर से शुरू हुए आंदोलन के बारे में मशहूर अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने लिखा- ‘युवा केवल एक ही चीज़ मांग रहे हैः शिक्षा तक पहुंच और गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन। यह आंदोलन शायद मौजूदा प्रशासन की सबसे गंभीर विफलताओं को उजागर करता है। यानी, वह विनाशकारी और अभूतपूर्व स्थिति, जिसमें 2017 से प्रति छात्र बजट में 20 प्रतिशत की कमी आई है।’
पिकेटी ने लिखा- शिक्षा के लिए धन के अभाव और प्रति छात्र औसत खर्च में आई कमी को जायज ठहराने के लिए सरकार और उसके समर्थक तर्क देते हैं कि फ्रांस अब और अधिक निवेश का बोझ नहीं उठा सकता। इसके पक्ष में वे फ्रांस की सरकार पर बढ़े कर्ज का हवाला देते हैँ। लेकिन वे दो बातें छिपा जाते हैं- सार्वजनिक ऋण वास्तव में 1970 में सकल घरेलू उत्पाद के 20 फीसदी से बढ़कर आज 120 फीसदी जरूर हो गया है, लेकिन साथ ही निजी संपत्ति में उससे कहीं अधिक नाटकीय वृद्धि हुई है: यह जीडीपी के 300 प्रतिशत से बढ़ कर 600 प्रतिशत हो गई है, जिसमें सबसे अमीर लोगों की वित्तीय संपत्तियां सबसे ज्यादा बढ़ी हैं। दूसरे शब्दों में, फ्रांस की राष्ट्रीय संपत्ति यानी निजी और सार्वजनिक संपत्ति का कुल योग- जिसमें से निजी और सार्वजनिक ऋण घटा दिए गए हों- तो इतनी अधिक कभी नहीं रही, जितनी आज है।
मतलब यह कि फ्रांस पहले कभी इतना अमीर नहीं रहा। अर्थात समस्या केवल वितरण से संबंधित है। पिकेटी के अनुसार 1945 में स्थिति कहीं अधिक कठिन थी, जब सार्वजनिक ऋण आज की तुलना में भी अधिक था और निजी संपत्तियां (दूसरे विश्व युद्ध के कारण) नष्ट हो चुकी थीं। फिर भी तब फ्रांस ने सबसे धनी लोगों पर ऊंची दर से टैक्स लगाया। तब राष्ट्रीय एकजुटता कर (नेशनल सॉलिडेरिटी टैक्स) लगाया गया। उसे आज अपनाया जाए, तो कहीं अधिक राजस्व इकट्ठा हो सकता है।
इन व्याख्याओं ने फ्रांस में जारी आंदोलन के कारणों की तलाश वहां गुजरे चार दशकों में अपनाई गई आर्थिक नीतियों में की है। लेकिन दुनिया भर के शासक वर्ग नहीं चाहते कि ये समझ फैले। तो ताजा आंदोलनों के सिलसिले में भी उन्होंने वही तरीका अपनाया, जिसके जरिए पिछले चार दशकों से उन्होंने राजनीतिक विमर्श को आम जन के वास्तविक मुद्दों पर केंद्रित होने से रोके रखा है।
अक्टूबर के तीसरे हफ्ते में फ्रांस में तेजी से फैले आंदोलन के सिलसिले में जब पूरे देश में विरोध प्रदर्शन और कुछ शहरों में हिंसक दंगे हुए, तब अंतरराष्ट्रीय दक्षिणपंथी समूहों ने इसके बरक्स अपनी नस्लवादी कहानी गढ़ी। उन्होंने इन प्रदर्शनों को मुस्लिम आक्रमणकारियों की करतूत बताया और कहा कि इस्लामी संगठन संगठित वामपंथियों के साथ मिलकर देश को आग के हवाले करने में लगे हैं। शुरुआत अमेरिका से हुई, जिसे प्रचारित करने में भारत सहित तमाम देशों के धुर-दक्षिणपंथी, सांप्रदायिक एवं नस्लवादी पार्टियां/नेता और उनके समर्थक जुट गए।
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने कहा- “फ्रांस जल रहा है! पूरी तरह अलग दुनिया से आए लोगों का आव्रजन, ऐसे लोगों का जिनके दिलों में नफरत भरी हुई है, उस महान देश को तोड़ चुका है। अब फ्रांस अपनी सीमाओं को बंद करें और नियंत्रण अपने हाथ में ले, इससे पहले कि बहुत देर ना हो जाए!”
ट्रंप प्रशासन के उप-राष्ट्रपति जेडी वेंस ने लिखा- “विविधता और करुणा के नाम पर पश्चिमी उदारवादी फ्रांस और अन्य देशों के भीतर तीसरी दुनिया को ले आए।” जेडी वेंस ने लिमोज़ टाउन हॉल के घंटाघर में लगी आग के वीडियो पर टिपप्णी की- “मैं प्रार्थना करता हूं कि फ्रांस, जो अद्भुत लोगों का एक सुंदर देश है, और अधिक स्मारकों के जलने से पहले इस पागलपन को रोक दे।… और मुझे उम्मीद है कि अमेरिकी लोग इस पर ध्यान दे रहे होंगे। यही वो भविष्य है, जिसे डेमोक्रेटिक पार्टी के लोग आपके देश के लिए चाहते हैं।”
इसके पहले ट्रंप कह चुके थे- “फ्रांस में जो हो रहा है, वह अनियंत्रित सामूहिक आव्रजन के परिणाम के अलावा कुछ नहीं है। यह स्कूलों के बारे में नहीं है, यह इस्लाम द्वारा एक कभी महान रहे एक देश पर कब्ज़ा करने की कोशिश के बारे में है!” ट्रंप समर्थक धुर-दक्षिणपंथी रिपब्लिकन सीनेटर टेड क्रूज़ ने कहा- “यूरोप ने अपनी सीमाएं खोल दीं और कट्टरपंथी इस्लाम का सामना करने में विफल रहा। एओसी (अमेरिका की डेमोक्रेट नेता अलेक्जैंड्रिया ओकासियो कॉर्तेज), (जोहरान) ममदानी, अल-सय्यद और टालारिको हमें इसी दिशा में ले जाना चाहते हैं।”
यानी फ्रांस की घटनाओं का इस्तेमाल घरेलू राजनीति में आव्रजकों एवं इस्लाम विरोधी नफरत फैला कर राजनीतिक फायदा उठाने के लिए किया गया। भारत में इस दौरान चली चर्चाओं से परिचित लोगों को ये बात अपने देश के बारे में उतनी ही सच मालूम पड़ेगी। अमेरिका एवं अन्य देशों की तरह भारत में भी भाजपा और उसके समर्थक मीडिया इकॉ-सिस्टम में लगभग सारी चर्चा इस्लाम और उसकी कथित आक्रामकता के इर्द-गिर्द समेट दी गई। यानी ट्रंप का कथानक भारत में भी खूब फैला।
मगर यह कथा आंदोलन की वास्तविक और लोकप्रिय मांगों की पूरी तरह अनदेखी करती है। दरअसल, फ्रांस के आंदोलनकारियों का प्राथमिक निशाना वहां के वर्तमान राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों हैं, जो उचित भी है। मैक्रों अपने पूरे कार्यकाल में अमेरिका की एकाधिकारी पूंजी से जुड़े फ्रांस के पूंजीपतियों के हित में काम करते रहे हैं। मगर मैक्रों को इस बात का श्रेय देना होगा कि उन्होंने इस आंदोलन नस्लवादी नजरिए से पेश करने का आसान तरीका नहीं अपनाया। बल्कि ट्रंप और अन्य धुर दक्षिणपंथी ताकतों ने जो कहानी फैलाई, उसकी उन्होंने आलोचना की। मैक्रों ने कहा- ‘विदेशी नेता फ्रांस में हुए दंगों के बारे में झूठी जानकारी साझा कर फ्रांस की घटनाओं का इस्तेमाल अपने चुनावी अभियान के लिए कर रहे हैं। कुछ लोग फ्रांस की ऐसी गलत छवि फैला रहे हैं, जैसे कि उस पर आव्रजकों और इस्लामी ताकतों ने कब्जा कर लिया हो।’
हकीकत यही है कि फ्रांस में तेजी से बढ़ती जीवन-यापन की लागत, शिक्षा व्यवस्था की गिरती गुणवत्ता, और सितंबर में शुरू हुए हाई स्कूल छात्रों के आंदोलन पर पुलिस की हिंसक कार्रवाइयां वहां भड़के गुस्से का प्रमुख कारण हैं। लेकिन धुर दक्षिणपंथी कथानकों में इन मुद्दों को कोई उल्लेख नहीं होता। बल्कि कहा जा सकता है एक गलत एवं अयथार्थ कथानक के जरिए आम जन के वैध और विस्फोटक आक्रोश को जानबूझ कर छिपाने की कोशिश की गई है। लेकिन उससे यह हकीकत नहीं छिप सकती कि (सिर्फ पिछले दो महीनों पर गौर करें, तब भी) ऐसे देशों की संख्या बढ़ती चली गई है, जहां की सड़कों पर लोगों- खासकर युवाओं का आक्रोश उबलता दिखा है।
वैसे उन देशों में भारत भी है, लेकिन यहां कॉकरोच एवं अन्य आंदोलनों का वैसा प्रसार नहीं हुआ, ना ही उनमें वैसी आक्रामकता दिखी है, जैसा फिलहाल फ्रांस सहित कई देशों में दिख रहा है। अन्य देशों में शामिल हैः
– स्पेन, जहां आवास संकट के खिलाफ युवाओं और किरायेदार संगठनों ने बड़े प्रदर्शनों का नेतृत्व किया। इससे बढ़े संकट के बीच प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज को मध्यावधि चुनाव कराने का फैसला करना पड़ा, जिसके लिए 29 नवंबर को मतदान होगा।
– पुर्तगाल, जहां युवा और श्रमिक समूहों ने आवास संकट तथा जीवन-यापन की बढ़ती लागत के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किए हैं।
– अल्बानिया, जहां युवा और छात्र-समर्थित विरोध प्रदर्शनों ने भ्रष्टाचार, शासन व्यवस्था तथा पर्यावरण संबंधी मुद्दों पर उग्र रूप धारण कर लिया।
– ग्रीस और इटली में भी महंगाई और ऊर्जा संकट को लेकर युवाओं की बड़ी भागीदारी वाले आंदोलन जारी हैं।
– सर्बिया, जहां 2024 में एक रेल हादसे के बाद शुरू हुआ छात्र आंदोलन 2026 में भी जारी है। छात्रों ने भ्रष्टाचार, जवाबदेही और शीघ्र चुनाव की मांग की है।
– जापान में अमेरिकी सैन्य ठिकानों का विरोध एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बना है। इसके साथ ही जीवन-यापन की बढ़ती लागत, वेतन वृद्धि की कमी, अस्थायी रोजगार, सामाजिक विषमता, और राजनीतिक जवाबदेही की मांग को लेकर विशाल विरोध प्रदर्शन हुए हैं।
– इंडोनेशिया में छात्रों और युवाओं ने सरकार की आर्थिक नीतियों, बजट प्राथमिकताओं, भ्रष्टाचार तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता से जुड़े मुद्दों पर प्रदर्शन किए हैं। युवाओं की प्रमुख शिकायत है कि ऊंची आर्थिक वृद्धि दर के बावजूद रोजगार, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा के प्रश्न पर्याप्त रूप से हल नहीं हो रहे हैं।
इस संकट ने खासकर यूरोपीय देशों की लोकतंत्र के प्रति वचनबद्धता की हकीकत को भी बेपर्द कर दिया है। इसकी सबसे नायाब मिसाल फ्रांस ही है। गौर कीजिए, वहां जन प्रदर्शनों से निपटने के लिए क्या कदम उठाए गएः
- सत्ताधारी नेताओं ने देश के मुख्य विपक्षी दल (LFI) को भंग करने की मांग की।
- घरेलू पुलिस निगरानी अभियानों के लिए सेना को तैनात किया गया।
- देश के प्रमुख शहरों में कर्फ्यू लगाए गए।
- सरकार समर्थक एक सांसद की बात का खंडन करने पर एक टीवी टीकाकार को निलंबित कर दिया गया।
- सरकार ने मुख्य विपक्षी दल पर आपराधिक जिम्मेदारी मढ़ने की कोशिश की। इसके लिए खुफिया एजेंसियों का उपयोग किया गया।
- पुलिस ने एक रेलवे स्टेशन पर मुख्य विपक्षी दल के एक सांसद को हिरासत में लेने का प्रयास किया।
- फिलस्तीन समर्थकों को सोशल पर की गई मीडिया टिप्पणियों के लिए निशाना बनाया गया और उन्हें चुप कराने की कोशिश की गई।
स्पष्टतः आंदोलनों के इस दौर ने यह साफ कर दिया है कि नव-उदारवादी नीतियों ने यहां तक कि सबसे धनी समाजों को भी अंदर से खोखल कर दिया है। इन दौर में सरकारों ने जन-कल्याण पर खर्च घटाने की नीतियां अपनाईं और अधिक से अधिक धन का पहले से धनी तबकों के हाथ में ट्रांसफर का रास्ता साफ किया। नया पैदा हुआ धन कुछ हाथों में सीमित हुआ, जिससे गैर-बराबरी बढ़ी। दूसरी तरफ शिक्षा, स्वास्थ्य एवं बुनियादी ढांचा संबंधी खर्चों में कटौती से आम जन का जीवन स्तर गिरने का रुझान आगे बढ़ा। हथियार उद्योग के दबाव में शासक तबकों ने युद्ध उन्मादी नीतियां अपनाईं, लेकिन युद्धों का परिणाम ऊर्जा संकट और तेजी से बढ़ी महंगाई के रूप में सामने आया है। उसका नतीजा पर सड़कों पर दिख रहा है!
बहरहाल, ये सवाल बना हुआ है कि इन आंदोलनों से क्या वास्तविक तस्वीर बदलेगी? या ये आंदोलन लोगों के आक्रोश की क्षणिक अभिव्यक्ति का मौका बन कर रह जाएंगे? फिलहाल सूरत यह है कि फ्रांस के अलावा आंदोलन वाले किसी अन्य देश ऐसा राजनीतिक समूह मजबूत हाल में नहीं है, जो नई बन रही परिस्थितियों को टिकाऊ बदलाव में परिवर्तित कर पाने में सक्षम हो। फ्रांस में भी विकल्प के तौर पर मेलेन्शॉ ही हैं, लेकिन फ्रांस का पूरा शासक वर्ग उनके खिलाफ लामबंद हो गया है। तमाम संकेत हैं कि उसने धुर-दक्षिणपंथी नेता मेरी ला पेन पर अपना दांव लगा दिया है। इसलिए अगले साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव में मेलेन्शॉ की राह आसान नहीं होगी।
बहरहाल, मेलेन्शॉ की भी जो समझ है, उस पर गौर करना उचित होगा। एक हालिया इंटरव्यू में हुए संवाद पर ध्यान देः
प्रश्नः आपके लिए क्रांति का क्या अर्थ है? क्या जो हम अभी देख रहे हैं, वह क्रांति है या नहीं?
मेलेन्शॉ: नहीं। यह हमें उन चर्चाओं में ले जाता है, जो वामपंथ में दशकों से चली आ रही हैं। मेरा मानना है कि यह ऐसी प्रक्रिया है, जो समय के साथ आगे बढ़ती है, जिसमें एक व्यवस्था की जगह दूसरी व्यवस्था ले लेती है। पूरी कला उस बदलाव (संक्रमण) को संभालने में निहित है।
….कुछ लोग बल प्रयोग के ज़रिए मामलों को सुलझाना चाहते हैं। यह मेरी सोच नहीं है। मैं चुनावों में विश्वास रखता हूं, मैं संवाद में विश्वास रखता हूं, मैं मतदान में विश्वास रखता हूं। एक बहुमत होता है, एक अल्पसंख्यक होता है। यह व्यवस्था इसी तरह काम करती है।
… कुछ अन्य लोगों का मानना है कि प्रत्यक्ष कार्रवाई (डायरेक्ट एक्शन) से बदलाव संभव होता है। इस रूप में यह बहस आज भी जारी है।
… और यहां मैं आपके सामने बैठा हूं, और मुझे उन कृत्यों और व्यवहारों (जन प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा और तोड़फोड़) के लिए जवाब देना पड़ रहा है, जिनका मैंने कभी समर्थन नहीं किया और जिन्हें मैं आज भी स्वीकार नहीं करता।”
जाहिर है, मेलेन्शॉ भी सिस्टम के अंदर के नेता हैं। फ्रांस में एक ऐसे ही नेता फ्रांक्वां मित्तरां थे, जिन्हें कम्युनिस्ट बताया जाता था। वे राष्ट्रपति चुने गए, लेकिन उसके बाद सिस्टम से ऐसे घिरे कि दो साल के अंदर उनके सारे क्रांतिकारी तेवर हवा हो गए। मेलेन्शॉ (अगर जीते भी, तो) का भविष्य उससे कुछ अलग नहीं होगा।
लेकिन इससे फ्रांस सहित तमाम देशों के ताजा विरोध प्रदर्शनों की अहमियत कम नहीं होती। इस घटनाक्रम ने यह तो अवश्य जाहिर किया है कि पूंजीवाद के नव-उदारवादी संस्करण ने जनता के बीच ऐसे विभाजन पैदा कर दिए हैं, जिनके परिणामों से अब यह व्यवस्था नहीं बच सकती। फिलहाल, ये परिणाम उथल-पुथल के रूप में हैं, लेकिन ऐसे ही हालात से कुछ नया बनने की सूरत भी पैदा होती हैं। इसलिए मौजूदा घटनाक्रम को संभावनाओं के एक स्रोत के रूप में देखना फिलहाल एक उचित नजरिया होगा।
