मुद्गल पुराण में गणेश के आठ अवतारों का वर्णन मिलता है, जो किसी असुर को मारने के लिए नहीं, बल्कि मानव मन के भीतर छिपे आठ मानसिक विकारों का शमन करने के लिए अवतरित हुए थे। वक्रतुण्ड, मत्सरासुर अर्थात मत्सर, ईर्ष्या के शमन हेतु अवतरित हुए थे, यह सोशल मीडिया पर दूसरों की प्रगति देखकर होने वाली हीनभावना के समान है।
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी का महापर्व केवल एक धार्मिक कर्मकांड या उत्सव नहीं है, यह मानव चेतना को विक्षेप से विवेकानंद की ओर ले जाने वाली एक अत्यंत वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक उपचार पद्धति है। महा गणपति का संपूर्ण विग्रह, उनके सम्मुख की जाने वाली साधना और उनसे जुड़े शास्त्र वचन मूलतः स्थिर प्रज्ञा और मानसिक स्वास्थ्य के वे कालजयी सूत्र हैं, जिनकी आज की खंडित जीवनशैली को सबसे अधिक आवश्यकता है। मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध हमारी चित्त की वृत्तियों से है। महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के प्रारंभ में ही योग की परिभाषा देते हुए स्पष्ट किया है-
योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।
-पातंजल योगसूत्र, समाधिपाद, सूत्र 2
चित्त की चंचल वृत्तियों का निरोध ही योग है, और इन वृत्तियों के नियमन के जो अधिष्ठाता देव हैं, वही गणपति हैं। उपनिषदों की दृष्टि में गणेश कोई बाह्य सत्ता नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर अवस्थित मूलाधार चक्र की नियामक ऊर्जा हैं। गणेश अथर्वशीर्ष, जो माण्डूक्य उपनिषद के अंतर्गत आता है, में ऋषि इस सत्य को निर्विवाद रूप से स्थापित करते हैं-
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्। त्वं शक्तित्रयात्मकः।
त्वाम्योगिनो ध्यायन्ति नित्यम्।।
-गणेशअथर्वशीर्ष, मंत्र 6
मनोविज्ञान की दृष्टि से मूलाधार चक्र मानव चेतना का वह आधारभूत केंद्र है, जो व्यक्ति को मानसिक सुरक्षा, जीवन के प्रति विश्वास और भावनात्मक स्थिरता प्रदान करता है। जब किसी व्यक्ति का मूलाधार चक्र विक्षुब्ध होता है, तभी उसके भीतर भय, असुरक्षा की भावना और अनिश्चितता का जन्म होता है, जो आगे चलकर गंभीर अवसाद का रूप ले लेता है। गणपति का नित्य मूलाधार में स्थित होना यह सिद्ध करता है कि वे मानव मस्तिष्क और स्नायु तंत्र को स्थिरता प्रदान करने वाले आदि तत्व हैं। जो साधक गणेश तत्व का अनुसंधान करता है, उसका चित्त स्वतः ही बाह्य झंझावातों से अप्रभावित रहकर तटस्थ हो जाता है।
प्राचीन ग्रन्थों में अंकित गजास्य विग्रह अर्थात शारीरिक प्रतीकों का समीचीन अध्ययन से वहां आधुनिक जीवन प्रबंधन और मानसिक स्वास्थ्य के अंतर्निहित सूत्र प्रदीप्त हो उठते हैं। गणेश का मस्तक हाथी का है और धड़ मनुष्य का है, जो यह दर्शाता है कि श्रेष्ठ मानसिक स्वास्थ्य के लिए बौद्धिक विशालता और जैव संतुलन अनिवार्य हैं। आधुनिक युग की सबसे बड़ी मानसिक समस्या यह है कि लोग सुनना नहीं चाहते, हर व्यक्ति केवल अपनी बात थोपना चाहता है। इसके विपरीत, गणेश के सूप जैसे विशाल कान उत्कृष्ट श्रवण क्षमता के प्रतीक हैं। सनातन मनीषा कहती है कि ज्ञान और मानसिक शांति का प्रारंभ श्रवण से होता है। उपनिषदों में ऋषि प्रार्थना करते हैं-
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः।
अर्थात- हे देवों! हम कानों से सदा भद्र अर्थात कल्याणकारी वचन ही सुनें।
जो व्यक्ति दूसरों को धैर्यपूर्वक सुनता है, उसका आधा मानसिक तनाव स्वतः ही समाप्त हो जाता है क्योंकि वह प्रतिक्रिया देने में जल्दबाजी नहीं करता। हाथी की आंखें अत्यंत छोटी होती हैं, किंतु उनकी दृष्टि अत्यंत दूरगामी और एकाग्र होती है। यह प्रतीक आधुनिक मनुष्य को सूक्ष्म विश्लेषण की सीख देता है। आज सोशल मीडिया के स्क्रॉलिंग कल्चर ने हमारी एकाग्रता की अवधि को न्यूनतम कर दिया है। गणेश जी की आंखें हमें सिखाती हैं कि बाह्य चकाचौंध से हटकर भीतर की ओर देखना और किसी भी परिस्थिति का सतही नहीं, बल्कि गहरा और एकाग्र अवलोकन करना ही मानसिक स्वास्थ्य की कुंजी है।
गणेश की वक्रतुण्ड अर्थात लम्बी और लचीली सूंड अत्यंत संवेदनशील और शक्तिशाली होती है। वह इतनी सूक्ष्म है कि जमीन पर गिरे छोटे से सिक्के को भी उठा सकती है और इतनी बलशाली है कि विशाल वृक्ष को भी उखाड़ सकती है। मानसिक स्वास्थ्य की भाषा में इसे भावनात्मक लचीलापन कहा जाता है। आधुनिक जीवनशैली में जो व्यक्ति परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल नहीं पाता, वह मानसिक रूप से टूट जाता है। गणेश की सूंड हमें सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में कब कोमल होना है और संकट के समय कब सुदृढ़ और कठोर हो जाना है।
लम्बोदर अर्थात विशाल पेट इस बात का दार्शनिक संकेत है कि संसार में मिलने वाली प्रशंसा और आलोचना, सुख और दुःख, सूचना और अपवाह, इन सबको पचाने की क्षमता मनुष्य के भीतर होनी चाहिए। आज के दौर में लोग छोटी सी आलोचना या असफलता को पचा नहीं पाते और आत्मघाती कदम उठा लेते हैं। लम्बोदर का संदेश है- जीवन के हर कड़वे और मीठे सच को अपने भीतर समाहित करो, विचलित मत हो।
मनुष्य के जीवन में आने वाले संकट, असफलताएं और मानसिक तनाव ही वस्तुतः विघ्न हैं। सनातन मनीषा ने इन विघ्नों को केवल बाह्य बाधाएं नहीं माना, बल्कि उन्हें आंतरिक अशुद्धियों का प्रकटीकरण स्वीकार किया है। मुद्गल पुराण में गणेश के आठ अवतारों का वर्णन मिलता है, जो किसी असुर को मारने के लिए नहीं, बल्कि मानव मन के भीतर छिपे आठ मानसिक विकारों का शमन करने के लिए अवतरित हुए थे।
वक्रतुण्ड, मत्सरासुर अर्थात मत्सर, ईर्ष्या के शमन हेतु अवतरित हुए थे, यह सोशल मीडिया पर दूसरों की प्रगति देखकर होने वाली हीनभावना के समान है।
एकदन्त, मदासुर, मद, अहंकार के मर्दन के लिए अवतरित हुए थे, अपनी उपलब्धियों या पद-प्रतिष्ठा का अतिअभिमान जो पतन का कारण बनता है।
महोदर, मोहासुर अर्थात मोह,आसक्ति के मर्दन हेतु अवतरित हुए थे, जो किसी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति से अत्यधिक चिपकाव जो अवसाद लाता है।
गजानन, लोभासुर (लोभ, लालच) के शमन के लिए अवतरित हुए थे, जो अंतहीन भौतिक इच्छाएं और उपभोक्तावादी अंधी दौड़ है।
लम्बोदर, क्रोधासुर (क्रोध, गुस्सा) के दमन के लिए अवतरित हुए थे, यह है- आवेश में आकर विवेक खो देना और रिश्तों को नष्ट करना।
विकट का अवतरण कामासुर (काम, वासना) के दमन के लिए हुआ था, जो वासनाओं की अनियंत्रित ललक जो मानसिक एकाग्रता को भंग करती है।
विघ्नराज का अवतरण ममतसुर (ममता, मेरा-तेरा का भाव) के शसन के लिए हुआ था, जैसे- संकीर्ण दायरों में जीना और व्यापक समाज से कट जाना।
धूम्रवर्ण का अवतार अभिमानासुर (अभिमान, गर्व) आत्म मुग्धता के नाश के लिए हुआ था, जो व्यक्ति को सत्य से दूर ले जाती है।
गणेश चतुर्थी के अवसर पर विघ्नहर्ता की आराधना करते समय वास्तव में हम अपने भीतर के इन आठ असुरों को पहचानने और उनके शमन का संकल्प लेते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन को मानसिक व्याधियों से मुक्ति का जो मार्ग बताते हैं, वही मार्ग साक्षात गणपति का स्वरूप है-
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।।
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।।
-श्रीमद्भगवद्गीता 2/62-63
विषयों का निरंतर ध्यान करने से आसक्ति, काम, क्रोध और अंततः बुद्धि का नाश होता है। गणेश बुद्धि विधाता हैं, अर्थात वे बुद्धिनाश के इस चक्र को तोड़कर मनुष्य को व्यवसायात्मिका बुद्धि (निर्णयात्मक और स्थिर बुद्धि) प्रदान करते हैं।
ऋग्वेद का यह मंत्र चित्त की शुचिता और कल्याणकारी विचारों के आमंत्रण का उद्घोष करता है-
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरीतास उद्भिदः।
-ऋग्वेद 1/89/1
अर्थात- हमारे पास चारों ओर से ऐसे कल्याणकारी विचार आएं जो किसी से दबे न हों और जो उन्नति करने वाले हों। जब मनुष्य डिजिटल स्क्रीन की आभासी दुनिया से कटकर सामूहिक उत्सव, कीर्तन और ध्यान में लीन होता है, तो उसके मस्तिष्क को वह आवश्यक विश्राम मिलता है जिसकी खोज में वह मनोचिकित्सकों के चक्कर काटता रहता है। उत्सव का उद्देश्य मनोरंजन नहीं, बल्कि मन का रंजन (परिशोधन) होना चाहिए।
गणेश का वाहन मूषक (चूहा) है। एक अत्यंत विशालकाय और बुद्धि के अधिष्ठाता देव का एक तुच्छ और छोटे से जीव को अपना वाहन चुनना, आधुनिक स्टेटस सिंबल और अहंकारवादी जीवनशैली पर सबसे करारा प्रहार है। आज के मनुष्य का मानसिक तनाव इस बात से तय होता है कि उसके पास कौन सी गाड़ी है, उसका मकान कितना बड़ा है और उसका समाज में क्या रूतबा है। वह अपनी पहचान बाह्य वस्तुओं से जोड़ लेता है, और यही उसकी मानसिक गुलामी की शुरुआत है। गणेश का मूषक वाहन सिखाता है कि विनम्रता ही मानसिक स्वास्थ्य का परम रक्षक है। जिसके भीतर अहंकार नहीं है, जो सबसे छोटे और उपेक्षित जीव को भी सम्मान देना जानता है, उसका मानसिक संतुलन कभी डगमगा नहीं सकता।
चूहा मूलतः मानव मन की चंचलता और इच्छाओं के कुतरने के स्वभाव का भी प्रतीक है। यदि मन की इस चंचलता को अनियंत्रित छोड़ दिया जाए, तो यह जीवन के सारे सुख, चैन को कुतर डालती है। गणेश (विवेक) का उस पर बैठना यह दर्शाता है कि जब व्यक्ति के भीतर विवेक जाग्रत होता है, तो मन की चंचलता स्वतः ही उसके नियंत्रण में आ जाती है और वह उसका सही दिशा में उपयोग करना सीख जाता है।
गणेश चतुर्थी केवल बप्पा की मूर्ति लाकर नाच-गाकर विसर्जित कर देने का नाम मात्र नहीं है। यह अपने भीतर विघ्नहर्ता विवेक को स्थापित करने का महापर्व है। इस उत्सव पर समूचे वैश्विक समाज को अपने मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने के लिए गणेश से सम्बंधित सूत्रों को जीवन में उतारना होगा। इसके लिए प्रतिदिन कम से कम कुछ समय अपनों को, परिवार को और मित्रों को बिना किसी पूर्वाग्रह के धैर्यपूर्वक सुनने के लिए समर्पित करें। प्रतिदिन कुछ क्षण शांत बैठकर गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ या ओंकार का ध्यान करें, ताकि सूचनाओं के बोझ से दबे मस्तिष्क को शांति मिल सके। मूर्ति विसर्जन के साथ-साथ अपने भीतर के कम से कम एक विकार अर्थात क्रोध, ईर्ष्या या सोशल मीडिया की लत को सदा के लिए विसर्जित करने का दृढ़ संकल्प लें।
समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति के प्रति करुणा और विनम्रता का भाव रखें, क्योंकि महा गणपति वहीं वास करते हैं। जब मनुष्य का मानस स्वस्थ होगा, तभी एक स्वस्थ परिवार, स्वस्थ समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव होगा। आइए, इस गणेश चतुर्थी पर हम अपनी बुद्धि और चित्त को महा गणपति के चरणों में अर्पित करते हुए प्रार्थना करें-सच्चिदानन्दरूपाय परब्रह्मणे नमः, सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलोगजकर्णकः। लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः।।
