उम्र में गांधी और टैगोर से बड़ी जोहरा बाई आगरेवाली, बड़ी मलका जान, गौहर जान, जानकी बाई छप्पन छुरी, छमिया बाई, रतन बाई, मुश्तरी बाई, अख्तरी बाई आदि ने उस ज़माने में स्त्री सशक्तीकरण की जो मिसाल कायम की वह अद्भुत है। …. इन गायिकाओं में कई स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ी थीं और गोपनीय ढंग से क्रांतिकारियों को मदद करती थीं। इस संबंध में विद्याधरी बाई के अनेक किस्से प्रचलित हैं।
आज 26 जून है। भारत की पहली ग्रामोफ़ोन गर्ल गौहर जान की 153वीं जयंती। तीन साल पहले उनकी डेढ़ सौवीं जयंती भी अलक्षित चली गई। जब 2014 में बेगम अख्तर की जन्मशती धूमधाम से मनाई गई तो गौहर जान की डेढ़ सौवीं जयंती क्यों नहीं, जबकि गौहर ने बेगम अख्तर से बड़ा इतिहास संगीत में रचा था, अधिक लोकप्रियता हासिल की आपने जमाने में और अधिक धन भी कमाए!
बेगम अख्तर की मां मशरुती बाई अपनी बेटी को गौहर से तालीम दिलाने कोलकत्ता ले गई थीं। प्रसिद्ध इतिहासकार विक्रम सम्पत ने जब उनकी जीवनी लिखी तो देश में उनकी चर्चा शुरू हुई और बाद में उन पर नाटक मंचित हुए और फ़िल्म भी बनी। लेकिन अब भी लोगों को गौहर के स्त्री सशक्तीकरण की कहानी कम पता है और अकादमिक जगत में संगीत से महिला सशक्तीकरण पर कम बातें हुई हैं। गत वर्ष अशोक वाजपेयी ने पहला रामेश्वरी नेहरू स्मृति व्याख्यान भी इसी विषय पर दिया और इनका महत्व बताया। इन नायिकाओं की जीवनियां हिंदी अंग्रेजी में नहीं के बराबर लिखी गईं। जानकी बाई छप्पन छुरी पर कुछ साल पहले अंग्रेजी में एक उपन्यास लिखा गया जिस पर नीलम शरण गौड़ को अंग्रेजी का साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला। उससे पहले हिंदी में बिहार के संगीत विशेषज्ञ गजेंद्र नारायण सिंह ने जोहरा बाई पर हिंदी में एक उपन्यास लिखा जो साहित्य की दुनिया में अलक्षित चला गया।
इस तरह से देखें तो इतिहास में इनके योगदान की विधिवत चर्चा आज तक नहीं हुई है। किसी पाठ्यक्रम में इनकी जानकारी नहीं दी जाती है। शायद इसका कारण यह रहा हो कि वे कोठे की परम्परा से आती थीं। इस वर्ष 11 नवंबर को भारत में ग्रामोफोन रिकर्डिंग के 124 वर्ष पूरे होकर 125 वर्ष शुरू होंगे और यह ऐतिहासिक अवसर होगा कि उन पर चर्चा हो क्योंकि तवायफ़ परम्परा की अधिकतर गायिकाओं के ग्रामोफोन् रिकार्ड बने थे।
भारत में विशेषकर हिंदी, अंग्रेजी जगत में जो स्त्री विमर्श हुआ है, उसमें क्लारा जेटकिन्स, वर्जिनिया वुल्फ, सिमोन द बोवुआ, केट मिलेट, टोनी मोरीसन, जैसी अनेक पश्चिमी स्त्रीवादी विचारकों की चर्चा अधिक हुई है। अब नवजागरणकालीन स्त्री विमर्शकारों सावित्री बाई फुले, पंडित रमाबाई, फातिमा बीबी, महादेवी वर्मा आदि की भी चर्चा जोर शोर से होने लगी है। लेकिन इतिहास में भूली बिसरी नायिकाओं, गायिकाओं और महिला क्रांतिकारियों की चर्चा कम हुई, जिन्होंने अपने जीवन मे ज़मीनी तौर पर स्त्री सशक्तीकरण की मिसाल पेश क़ी खासकर साहित्य पत्रकारिता कला और संगीत क्षेत्र से आनेवाली महिलाओं ने।
उम्र में गांधी और टैगोर से बड़ी जोहरा बाई आगरेवाली, बड़ी मलका जान, गौहर जान, जानकी बाई छप्पन छुरी, छमिया बाई, रतन बाई, मुश्तरी बाई, अख्तरी बाई आदि ने उस ज़माने में स्त्री सशक्तीकरण की जो मिसाल कायम की वह अद्भुत है। उन्होंने अपने हुनर, आत्मविश्वास, लगाव, लगन, प्रतिभा और काम के प्रति समर्पण भाव से स्त्री सशक्तीकरण का एक इतिहास ही रच दिया। इस स्त्री विमर्श का इतिहास लिखा जाना अभी बाकी है। इस पर विस्तृत शोध अध्ययन किया भी बाकी है।
भारतीय समाज में गणिकाओं की लंबी परंपरा रही और उन गणिकाओं ने ही पहले नृत्य और संगीत की परंपरा को बचाए रखा। अगर ये गणिकाएं नहीं होतीं तो हमारे पास समृद्ध संस्कृति नहीं होती। यह सच है कि पितृसत्ता के कारण उन्हें अपनी आजीविका के लिए यह पेशा अपनाना पड़ा पर उन्हें आमतौर पर समाज में सम्मान प्राप्त था, क्योंकि वे अंततः गणिकाएं ही थीं। समाज की मुख्यधारा से नहीं जुड़ीं थीं लेकिन हमारे पास कोई क्रमबद्ध इतिहास न होने के कारण उनके बारे में विशेष जानकारी नहीं मिलती है और उनके महती अवदान को इतिहास में रेखांकित नहीं किया जा सका। इतना ही नहीं भारत में प्रगतिशीलता की बहस में भी उन्हें जगह नहीं मिली और वामपंथी इतिहासकारों ने भी उंनको जगह नहीं दी। 18वीं और 19वीं सदी में काशी की प्रसिद्ध गायिकाओं में चित्रा, इमामबन्दी, गुलबदन, सुखबदन आदि का जिक्र अवध के नवाब के दरबार के करम इमाम की पुस्तक में मिलता है। महाराज चेत सिंह के दरबार में दुलारी, कज्जन, किशोरी, रुक्मणि, छित्तन बाई के नृत्य संगीत का हवाला मिलता है।
इसी तरह काशी में तौकीबाई, शैलकुमारी दुर्गेशनंदिनी, चंपा, काशी बाई, सरस्वती, शिवकुंवर, गन्नो बन्नो, मैना देवी (सिद्धेश्वरी देवी की नानी, जिनकी दो पुत्रियां राजेश्वरी देवी और श्यामा देवी थीं), राजेश्वरी (सिद्धेश्वरी देवी की मौसी), विद्याधरी, हुस्ना बाई, बड़ी मोती, सिद्धेश्वरी (उर्फ गोगो या गोना बचपन का नाम), रसूलनबाई, जेबुन्निसा, खैरुन्निसा, अनवरी, मलका बाई, हीरा देवी, टॉमी, कमलेश्वरी (राजेश्वरी देवी की पुत्री), तारा, छोटी मोती, राधा, कमला, जूही, पन्ना, रत्ना, मोहिनी, रति बाई, अनवरी बेगम, शाहजहां बेगम आदि ने भी संगीत की परम्परा को समृद्ध किया।
इन गायिकाओं में कई स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ी थीं और गोपनीय ढंग से क्रांतिकारियों को मदद करती थीं। इस संबंध में विद्याधरी बाई के अनेक किस्से प्रचलित हैं। महात्मा गांधी की प्रेरणा से ‘वेश्या संघ’ की स्थापना हुई और हुस्ना बाई इसकी प्रथम अध्यक्ष निर्वाचित हुईं। लखनऊ में भी ‘वेश्या संघ’ बना था। बनारस में जब गांधी जी आए तो हुस्ना बाई से उनक़ा संवाद हुआ और हुस्ना बाई ने गांधी जी से तीखे सवाल किए क्योंकि गांधी जी ने उन्हें कोठे का जीवन त्याग कर चरखा चलाने की सलाह दी। इस पर हुस्ना ने वेश्याओं के अस्तित्व और आजीविका का सवाल उठाया था। गांधी जी चाहते थे कि तवायफें भी आंदोलन में भाग लें पर पहले वे कोठे का जीवन त्याग दें क्योंकि उनके माथे पर वेश्या होने के कलंक का टीका लगा था।
गांधी जी ने कोलकत्ता में गौहर जान से 1920 में स्वराज फंड के लिए चंदा इकट्ठा करने वास्ते एक समारोह करने का अनुरोध किया था। गौहर उस समय गायिकी की बुलंदियों पर थी। उसने गांधी जी के सामने एक शर्त रखी कि उन्हें गाना सुनने आना होगा। किसी कारणवश गांधी जी नहीं आ सके तो गौहर नाराज़ हो गईं। उसने गांधी जी पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया और टिकट से हुई 24 हज़ार रुपए की आय में से आधा यानी 12 हज़ार दिए शौकत अली को दिए, जिन्हें गांधी जी ने पैसे लेने के लिए गौहर के पास भेजा था। आजकल के हिसाब से यह रकम करोड़ों रुपए के बराबर हुई।
गांधी जी ने बनारस में विद्याधरी से अनुरोध किया कि वे अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गीत की रचना कर देशवासियों को जागृत करें। विद्याधरी ने गांधी जी के इस अनुरोध को सहर्ष स्वीकारा और देशभक्ति गीतों की रचना की थी।
लेकिन इन तवायफ़ गायिकाओं को भारतीय समाज मे उपेक्षा ही नहीं मिली, बल्कि उनके खिलाफ एक सामाजिक आंदोलन भी खड़ा हुआ और उन्हें बहिष्कृत करने की मांग की गई। उन्हें रेडियो पर कार्यक्रम देने की मनाही थी। उन पर प्रतिबंध लगाया गया, जबकि इन तवायफ़ों ने मौसिकी को बचाया ही नहीं, बल्कि उन्होंने उसे बुलंदी तक पहुंचाया। चाहे ध्रुपद, ख्याल, ग़ज़ल, ठुमरी, दादरा, चैती, कजली और भजन आदि क्यों न हो।
बेगम अख्तर ने, जिन्हें हम अख्तरी बाई उर्फ बिब्बी के नाम से भी जानते हैं, ग़ज़ल गायिकी को उत्कर्ष पर पहुंचाया और वह गौहर जान तथा जानकी बाई छप्पन छुरी की तरह बीसवीं सदी में एक आइकॉन बन गईं। बेगम अख्तर तो इतनी लोकप्रिय हुईं कि वह ग़ज़ल गायिकी का पर्याय बन गईं। उनकी जन्मशती पर भारत सरकार ने एक सिक्का भी जारी किया। यह सम्मान आज ऐसे दूसरे किसी कलाकार को नहीं मिला।
बेगम अख्तर की तवायफ़ मां मुश्तरी बाई (इस नाम से कई गायिकाएं थीं, जिनमे एक मुश्तरी बाई आगरे में भी हुई जो बरसात फ़िल्म की हीरोइन निम्मी की मौसी थीं) ने अपनी बेटी को कलकत्ता में संगीत की तालीम गौहर जान से भी दिलवाई। अख्तरी बाई को 1934 में बिहार में आए भूकम्प की राहत के लिए कलकत्ता में आयोजित संगीत समारोह में बुलाया गया, जहां उन्होंने पहली बार मंच पर आकर सरोजिनी नायडू के सामने गाया और उस ज़माने में अगले दिन अखबारों में खूब वाहवाही मिली।
पारसी थिएटर की एक कम्पनी में उन्हें उस ज़माने में सात सौ रुपए की नौकरी मिली। 1933 में उन्होंने ‘एक दिन का बादशाह’ फ़िल्म से कैरियर शुरू किया और सत्यजीत रे की फ़िल्म ‘जलसाघर’ में भी काम किया। महबूब खान की 1942 में बनी फिल्म ‘रोटी’ में उन्हें गाने के लिए 25 हज़ार मिले थे जो बहुत बड़ी रकम थी। कोलकत्ते में ही जद्दन बाई ने भी गौहर जान से संगीत की तालीम ली। उनक़ा भी जीवन बहुत संघर्षमय था क्योंकि अपनी तीन तीन नाकाम शादियों के कारण उन्हें जिंदगी में बहुत तकलीफें उठानी पड़ीं। पर वे हार नहीं मानीं, बल्कि वह फिल्मों में पहली महिला संगीतकार बनीं तथा अपनी बेटी नरगिस को महान अदाकारा बना दिया जो राज्यसभा की पहली मनोनीत महिला सदस्य बनीं।
जद्दन बाई की मां दलीपा बाई मोतीलाल नेहरू की समकालीन थीं और कहा जाता है कि इलाहाबाद में उनके कोठे पर मोतीलाल नेहरू भी संगीत सुनने जाते थे। नरगिस की नानी ही नहीं, बल्कि नूतन और सायरा बानो की नानियां रतनबाई और छमिया बाई भी अपने ज़माने की मशहूर तवायफ़ गायिकाएं थीं। रतन बाई तो तीस चालीस के दशक की अभिनेत्री भी थी। शोभना समर्थ जैसी स्टार अभिनेत्री की मां। इसी तरह छमिया बाई की बेटी नसीम बानो अपने समय की मशहूर अभिनेत्री बनी। भारतेंदु ही नहीं अयोध्या प्रसाद खत्री और जयशंकर प्रसाद के संपर्क में भी ये तवायफ़ गायिकाएं लेकिन आज भी इन्हें तवायफ माना गया संगीत की विदुषी नहीं।
