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गुरु अर्जुन देव की शहादत से बहुत कुछ बदला

गुरु अर्जुन देव की शहादत ने सिख पंथ के इतिहास को पूरी तरह बदल दिया। इसके बाद सिख धर्म में राजनीतिक शक्ति के रूप में मीरी और आध्यात्मिक शक्ति के रूप में पीरी का समावेश हुआ। जो पंथ पहले केवल भक्ति तक सीमित था, वह अब अन्याय के खिलाफ खड़े होने लगा। यही बीज आगे चलकर खालसा पंथ के रूप में विकसित हुआ।

सिख धर्म के पांचवें गुरु श्रीगुरु अर्जुन देव का जीवन आध्यात्मिक ज्ञान, सेवा और सर्वोच्च बलिदान की एक अनोखी कथा है। उनके महान कार्यों ने न केवल सिख धर्म को एक मजबूत संगठनात्मक आधार दिया, बल्कि पूरी मानवता को शांति और सहिष्णुता का मार्ग भी दिखाया। गुरु अर्जुन देव का सबसे महत्वपूर्ण कार्य आदि ग्रंथ का संकलन और संपादन था, जिसे बाद में गुरु ग्रंथ साहिब कहा गया। उन्होंने इसमें न केवल पहले चार सिख गुरुओं की वाणी को जोड़ा, बल्कि कबीर, फरीद, नामदेव और रविदास जैसे हिन्दू और मुस्लिम संतों की शिक्षाओं को भी स्थान दिया।

उन्होंने वाणी को 31 रागों के आधार पर व्यवस्थित किया, जो उस समय के साहित्य में एक दुर्लभ और व्यवस्थित दृष्टिकोण था। गुरु ग्रंथ साहिब में सबसे अधिक 2218 शबद गुरु अर्जुन देव द्वारा रचे गए हैं, जिनमें सुखमनी साहिब को शांति और आनंद का सागर माना जाता है। गुरुजी ने अमृतसर में श्री हरमंदिर साहिब की नींव रखवाकर सिखों को एक केंद्रीय धार्मिक स्थल दिया। मंदिर की नींव एक मुस्लिम सूफी संत, साईं मियां मीर से रखवाई गई, जो धार्मिक सद्भाव अर्थात सर्वधर्म समभाव का एक बड़ा उदाहरण है। चारों दिशाओं में चार द्वार बनाए गए, जिसका अर्थ था कि यह स्थान बिना किसी भेदभाव के हर जाति और धर्म के व्यक्ति के लिए खुला है।

उन्होंने कई सामाजिक और जनकल्याण के कार्य किए। गुरुजी एक कुशल संगठक और समाज सुधारक भी थे। उन्होंने तरनतारन साहिब, करतारपुर साहिब और श्री हरगोबिंदपुर जैसे महत्वपूर्ण नगर बसाए। उन्होंने सिखों को अपनी आय का दसवां हिस्सा (दसवंद) जनहित और लंगर सेवा के लिए दान करने की शिक्षा दी। उन्होंने कुष्ठ रोगियों और बीमारों के लिए दवाखाने खुलवाए और गांवों में पानी के लिए कुएँ बनवाए।

गुरु अर्जुन देव सिख इतिहास के पहले बलिदानी अर्थात शहीद हैं। उनकी शहादत ने सिख धर्म के स्वरूप को हमेशा के लिए बदल दिया। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार मुगल बादशाह जहांगीर गुरु अर्जुन देव की बढ़ती लोकप्रियता और विद्रोही शहजादे खुसरो की मदद करने के आरोपों के कारण उनसे ईर्ष्या करता था। जब उन्हें इस्लाम स्वीकार करने या यातनाएं सहने का विकल्प दिया गया, तो उन्होंने सत्य का मार्ग चुना। लाहौर में उन्हें तपते लोहे के तवे पर बैठाया गया और उनके शरीर पर जलती रेत डाली गई।

इन सबके बावजूद वे ईश्वर का नाम लेते रहे और इसे ईश्वर की इच्छा माना- तेरा कीआ मीठा लागै, जो यह दिखाता है कि एक पूर्ण मनुष्य सत्ता के दमन के सामने भी मन से स्वतंत्र और शांत रह सकता है। उनकी शहादत ने सिखों में आत्मरक्षा और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की भावना जगाई, जिससे आगे चलकर सिख धर्म एक मजबूत सैन्य शक्ति के रूप में भी उभरा। गुरु अर्जुन देव का जीवन करुणा, सेवा और अटूट विश्वास का संगम है। उन्होंने अपनी शहादत से यह साबित किया कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए प्राणों का बलिदान देना सबसे बड़ा मानवीय गौरव है।

सुखमनी साहिब मन की शांति का सागर है। सुखमनी का अर्थ है- मन को सुख देने वाली मणि। यह गुरु अर्जुन देव की सबसे लंबी और लोकप्रिय रचना है, जो श्रीगुरु ग्रंथ साहिब के अंग 262 से 296 पर दर्ज है। इसमें कुल 24 अष्टपदियां अर्थात 8 पदों वाले छंद हैं। हर अष्टपदी से पहले एक श्लोक आता है, जो उस भाग के मुख्य विचार को स्पष्ट करता है। इसका मूल मंत्र है- प्रभ का सिमरन सभ ते ऊचा अर्थात ईश्वर का स्मरण सबसे ऊंचा है। गुरुजी समझाते हैं कि नाम-सिमरन से न केवल मन को शांति मिलती है, बल्कि जन्म-मरण के चक्र से भी मुक्ति मिलती है।

यह रचना केवल वैराग्य की बात नहीं करती, बल्कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए अहंकार छोड़ने, विनम्रता अपनाने और ब्रह्मज्ञानी अर्थात पूर्ण मनुष्य के गुणों को अपनाने की प्रेरणा देती है। आज के तनाव भरे समय में, सुखमनी साहिब का पाठ मानसिक तनाव और अशांति को दूर करने के लिए एक आध्यात्मिक औषधि माना जाता है। गुरु अर्जुन देव ने सन 1590 ईस्वी में अमृतसर से लगभग 25 किलोमीटर दूर श्री तरनतारन साहिब नाम का ऐतिहासिक नगर बसाया था। तरनतारन का अर्थ है- वह बेड़ा जो पार लगा दे। यह आध्यात्मिक और शारीरिक दोनों तरह के दुखों से मुक्ति का प्रतीक है। यहां का सरोवर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के सरोवर से भी बड़ा है।

गुरु जी ने इसे खास तौर पर मानव सेवा के लिए बनवाया था। उस समय कुष्ठ रोग को एक अभिशाप माना जाता था और रोगियों को समाज से अलग कर दिया जाता था। गुरु अर्जुन देव ने यहां कुष्ठ आश्रम बनवाया और स्वयं अपने हाथों से रोगियों की सेवा की। यह उस समय की एक बड़ी मानवीय पहल थी। गुरु जी ने यहां के लोगों को खेती के बेहतर तरीके सिखाए और व्यापार को बढ़ावा दिया, जिससे यह क्षेत्र आर्थिक रूप से समृद्ध हुआ। गुरु अर्जुन देव ने केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि संस्थान खड़े किए। सुखमनी साहिब के माध्यम से उन्होंने आध्यात्मिक आधार दिया और तरनतारन जैसे नगरों के जरिए सामाजिक और आर्थिक आधार तैयार किया। उनकी सोच धर्म को कर्म और सेवा से जोड़ने की थी।

गुरु अर्जुन देव और मुगल सम्राट जहांगीर के बीच का टकराव केवल दो व्यक्तियों का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह दो अलग विचारधाराओं के बीच का टकराव था- एक कट्टरता और सत्ता के अहंकार पर आधारित थी, तो दूसरी आध्यात्मिक स्वतंत्रता और मानवता की सेवा पर। अकबर के समय मुगलों और सिख गुरुओं के संबंध अच्छे थे। अकबर ने खुद गुरुजी के दर्शन किए थे और लंगर भी खाया था। लेकिन जहांगीर के सत्ता में आते ही स्थिति बदल गई। जहांगीर पर उस समय के शेख अहमद सरहिंदी जैसे नक्शबंदी कट्टरपंथी उलेमाओं का असर था, जो सिखों की बढ़ती लोकप्रियता को इस्लाम के लिए खतरा मानते थे।

गुरु अर्जुन देव ने सिखों को आदि ग्रंथ और हरमंदिर साहिब के रूप में एक अलग पहचान दे दी थी, जिसे मुगल सत्ता अपने लिए चुनौती समझने लगी थी। जहांगीर के विद्रोही पुत्र शहजादे खुसरो ने जब अपने पिता के खिलाफ विद्रोह किया, तो वह भागकर पंजाब पहुंचा। गुरुजी ने उसे एक शरणागत के रूप में आशीर्वाद दिया और लंगर खिलाया। जहांगीर ने इसे राजद्रोह माना। अपनी आत्मकथा तुजुक-ए-जहांगीरी में उसने लिखा कि वह लंबे समय से इस “झूठी दुकान” (सिख प्रचार) को बंद करना चाहता था और खुसरो का बहाना उसे मिल गया। जहांगीर ने गुरुजी पर भारी जुर्माना लगाया और आदि ग्रंथ में बदलाव करने को कहा, जिसे गुरुजी ने यह कहकर मना कर दिया कि बाणी ईश्वर की है और इसमें एक अक्षर भी नहीं बदला जा सकता।

गुरुजी को लाहौर में भयंकर गर्मी में जलती रेत और तपते लोहे (तत्ती तवी) पर बैठाया गया। यह इतिहास का एक अहिंसक सत्याग्रह था। उन्होंने शरीर पर कष्ट सहा, लेकिन मन को ईश्वर से जोड़े रखा। गुरु अर्जुन देव की शहादत ने सिख पंथ के इतिहास को पूरी तरह बदल दिया। गुरुजी ने अपने पुत्र गुरु हरगोबिंद साहिब को संदेश दिया कि अब शस्त्र धारण करने का समय है। इसके बाद सिख धर्म में राजनीतिक शक्ति के रूप में मीरी और आध्यात्मिक शक्ति के रूप में पीरी का समावेश हुआ। जो पंथ पहले केवल भक्ति तक सीमित था, वह अब अन्याय के खिलाफ खड़े होने लगा। यही बीज आगे चलकर खालसा पंथ के रूप में विकसित हुआ। जहांगीर ने गुरुजी को मारकर सिख आंदोलन को खत्म करना चाहा, लेकिन इस शहादत ने उसे और मजबूत बना दिया, जिसने आगे चलकर मुगल साम्राज्य को चुनौती दी।

गुरु अर्जुन देव की शहादत के बाद सिख इतिहास में जो बदलाव आया, वह केवल सैन्य परिवर्तन नहीं था, बल्कि अध्यात्म और आत्मरक्षा का संतुलन था। उनकी शहादत ने यह दिखा दिया कि केवल शांति और विनम्रता हर समय पर्याप्त नहीं होती। गुरुजी ने अपने पुत्र हरगोबिंद को संदेश दिया था कि अब शस्त्र धारण जरूरी है। गुरु हरगोबिंद साहिब ने दो तलवारें धारण कीं- पीरी और मीरी। इसका अर्थ था कि धर्म केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्याय के खिलाफ संघर्ष भी उसका हिस्सा है। गुरु अर्जुन देव ने हरमंदिर साहिब को आध्यात्मिक केंद्र बनाया था, और उनके बाद उनके पुत्र ने उसके सामने अकाल तख्त स्थापित किया। यह मुगल सत्ता के लिए सीधी चुनौती थी। सिखों ने अपना अलग तख्त बनाया, जहां राजनीतिक निर्णय लिए जाते थे, युद्ध अभ्यास होता था और न्याय किया जाता था। इससे सिखों को एक संगठित शक्ति मिली। इस तरह गुरु अर्जुन देव की शहादत ने सिखों की सोच बदल दी। उनके बलिदान ने सिखों के मन से मृत्यु का भय हटा दिया। अब वे संत-सिपाही बनने की राह पर बढ़े। शांत किसान और व्यापारी अब घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्ध कला सीखने लगे। गुरुजी ने अपनी सेना में योद्धाओं को शामिल करना शुरू किया, जिससे सिख समाज अधिक मजबूत हुआ। गुरु अर्जुन देव के बलिदान और उसके बाद के सैन्य रूप ने आगे चलकर गुरु तेग बहादुर के बलिदान और गुरु गोविंद सिंह द्वारा खालसा की स्थापना का मार्ग तैयार किया। गुरु अर्जुन देव की शहादत वह बीज थी, जिसने सिख धर्म को एक कोमल पौधे से एक विशाल वृक्ष में बदल दिया, जिसकी छाया में पीड़ितों को सहारा मिला और जिसकी शाखाओं ने अत्याचार का सामना किया। यह बदलाव अध्यात्म का अंत नहीं, बल्कि उसकी पूर्णता थी- जहां भक्त केवल भगवान का नाम ही नहीं लेता, बल्कि उसके बनाए मनुष्यों की रक्षा के लिए खड़ा भी होता है।

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