Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

होलिका और फाल्गुन का पटविलासिनी रूप

फाल्गुन की मादकता, सौंदर्य और प्रकृति के श्रृंगार को प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में फाल्गुन पटविलासिनीकहा गया है। पटका अर्थ है वस्त्र और विलासिनीका अर्थ है क्रीड़ा करने वाली या सजी-धजी नायिका। पटविलासिनी का मतलब है वह जो सुंदर वस्त्र पहनकर सबको मोहित कर ले। फाल्गुन को पटविलासिनी कहने का अर्थ है कि प्रकृति ने रंगों के वस्त्र पहन लिए हैं।

भारतीय पंचांग का अंतिम और बारहवां महीना फाल्गुन प्रेम, उमंग, रंगों और वसंत का समय है। यह भक्ति, आराधना और ऋतु परिवर्तन का प्रतीक है। इस महीने की पूर्णिमा को फाल्गुनी नक्षत्र पड़ता है, इसलिए इसका नाम फाल्गुन है। फाल्गुन पूर्णिमा का चाँद भी विशेष माना जाता है। यह महीना आनंद और उल्लास का महीना कहा जाता है। इसी समय से धीरे-धीरे गर्मी की शुरुआत होती है और सर्दी कम होने लगती है, जिससे मौसम बहुत सुहावना हो जाता है।

फाल्गुन की मादकता, सौंदर्य और प्रकृति के श्रृंगार को प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में “फाल्गुन पटविलासिनी” कहा गया है। ‘पट’ का अर्थ है वस्त्र और ‘विलासिनी’ का अर्थ है क्रीड़ा करने वाली या सजी-धजी नायिका। पटविलासिनी का मतलब है — वह जो सुंदर वस्त्र पहनकर सबको मोहित कर ले। फाल्गुन को पटविलासिनी कहने का अर्थ है कि प्रकृति ने रंगों के वस्त्र पहन लिए हैं। इस समय प्रकृति एक सजी-संवरी नायिका की तरह दिखाई देती है। पलाश के लाल फूल और सरसों के पीले फूल मानो प्रकृति के रेशमी वस्त्र लगते हैं।

टेसू के फूल और सरसों की पीली चादर धरती को नववधू की तरह सजा देती है। जंगलों में पलाश ऐसे खिलते हैं जैसे धरती ने अग्नि रंग की साड़ी पहन ली हो। आम की मंजरियों की खुशबू और कोयल की कूक इस सजी हुई प्रकृति के आभूषण और संगीत हैं। यह वह समय है जब प्रकृति एकांत से निकलकर उत्सव में बदल जाती है।

होलिका दहन और पटविलासिनी का संबंध भी गहरा है। जहां होलिका दहन वैराग्य और भस्म का प्रतीक है, वहीं पटविलासिनी अनुराग और रंगों का प्रतीक है। बिना दहन के श्रृंगार संभव नहीं। जब तक पतझड़ के पुराने पत्ते नहीं गिरते, तब तक नए पल्लव नहीं आते।

ब्रज साहित्य में फाल्गुन पटविलासिनी को राधारानी का स्वरूप माना गया है। होली में जब वे रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर श्रीकृष्ण के साथ प्रेम-क्रीड़ा करती हैं, तब उन्हें इस सुंदर रूप में देखा जाता है। होली की अग्नि के बाद जब अबीर-गुलाल उड़ता है, तो वह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा का परमात्मा से मिलन का प्रतीक है। ब्रज की गलियों में टेसू का रंग जब बरसता है, तो वह जड़-चेतन सबको रंग देता है।

फाल्गुन पटविलासिनी हमें सिखाती है कि जीवन केवल दुखों का दहन नहीं, बल्कि दहन के बाद आने वाला उत्सव भी है। होलिका की राख नश्वरता की याद दिलाती है और फाल्गुन के रंग जीवन की ऊर्जा और प्रेम की अनंतता का संदेश देते हैं। होलिका दहन की अग्नि केवल लकड़ी नहीं जलाती, बल्कि भीतर की बुराइयों को जलाने का संकेत देती है।

दहन के बाद जो होता है, वह और भी सुंदर है। प्रकृति पुराने पत्तों को छोड़कर नए पल्लव धारण करती है। इसलिए फाल्गुन पूर्णिमा की रात होलिका के सामने अहंकार त्यागने का संकल्प लिया जाता है, ताकि अगली सुबह प्रेम और सद्भाव का स्वागत किया जा सके।

रीतिकालीन कवियों ने भी बसंत और फाल्गुन की सुंदरता का वर्णन सजीले शब्दों में किया है। ब्रज और भक्ति साहित्य में फाल्गुन पटविलासिनी का गहरा अर्थ है। होली के समय राधारानी को पटविलासिनी कहा जाता है, क्योंकि वे रंगों और आभूषणों से सजी होकर कृष्ण के साथ प्रेम का उत्सव मनाती हैं। यह भौतिक नहीं, दिव्य प्रेम का प्रतीक है।

सुर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता “अट नहीं रही है” फागुन की मादकता को सजीव रूप देती है। इस कविता में फागुन के आते ही वातावरण रंगों से भर उठता है। पेड़ों पर नई कोपलें फूटती हैं, खेत हरे हो जाते हैं। रीतिकालीन कवि पद्माकर ने भी अपने सवैयों में ब्रज और फाल्गुन के उल्लास का चित्रण किया है।

होलिका दहन और फाल्गुन पटविलासिनी का संबंध विनाश और सृजन का संगम है। जहां होलिका दहन बुराई के अंत का प्रतीक है, वहीं फाल्गुन पटविलासिनी नए जीवन का उत्सव है। दहन के बाद धुलेंडी की सुबह रंगों के साथ प्रकृति अपने सबसे सुंदर रूप में सजती है।

ब्रज में यह समय केवल रंगों का नहीं, बल्कि राधा-कृष्ण के प्रेम का उत्सव है। फाल्गुन एक मनोदशा है — जब प्रकृति पुराना त्यागकर नया रूप धारण करती है। होलिका की अग्नि केवल लकड़ी नहीं जलाती, बल्कि भीतर की ईर्ष्या और अहंकार को भी भस्म करने का संदेश देती है।

पौराणिक कथा के अनुसार प्रह्लाद का विश्वास बच जाता है और होलिका का अहंकार जल जाता है। यही संदेश है कि पुराना दहन होगा तभी नया जीवन नाचेगा। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह अग्नि वातावरण को शुद्ध करने का संकेत देती है।

ब्रज में फाल्गुन की शुरुआत के साथ ही होली के रसिया गाए जाते हैं। इस महीने महाशिवरात्रि, आमलकी एकादशी और होली प्रमुख पर्व हैं। होलाष्टक का समय साधना के लिए शुभ माना जाता है। शीतल जल से स्नान और दान का भी महत्व है।

फाल्गुन का महीना प्रेम, शांति और आध्यात्मिकता का महीना है। भागवत पुराण में प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप की कथा बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इसी स्मृति में होलिका दहन और होली मनाई जाती है। ढूंढिका राक्षसी, शिव-पार्वती विवाह, कामदेव-रति की कथाएँ भी इसे धार्मिक और आध्यात्मिक अर्थ देती हैं।

Exit mobile version