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जनाब ओवैसी, कैथोलिक काऊंसिल से जाने सच्चाई

संघ-परिवार

बिशप काउंसिल ने बाकायदा एक आयोग बनाकर इस मामले की पड़ताल करवाई। उस की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2005 से 2012 के बीच ही लव-जिहाद के लगभग चार हजार मामले हुए। केरल में इस्लामिक पोपुलर फ्रंट की छात्र शाखा कैंपस फ्रंट ने असंख्य क्रिश्चियन और हिन्दू लड़कियों को जाल में फँसा कर उन्हें मुसलमान बनाया है।… कभी मौलाना मदनी द्वारा जिहाद को पवित्रकहकर नाराजी दिखाना, तो कभी ओवैसी द्वारा लव-जिहादपर तंज कर चुनौती देना हिन्दू नेताओं की असलियत दिखाता है। आर.एस.एस. को चुनौती देकर ओवैसी का मजा लेना है। आखिर क्यों नहीं! ये अज्ञान और डर, दोनों प्रभाव से जीते है।

लव-जिहाद की पहचान और पैमाना – 1

गत 5 जनवरी प्रखर मुस्लिम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने आर.एस.एस. नेता मोहन भागवत को चुनौती दी कि ‘लव जिहाद परिभाषित’ करें‌। क्योंकि इन्होंने अपने किसी भाषण में इस का उल्लेख किया था। ओवैसी ने भाजपा से भी माँग की कि, ‘अगर देश में लव जिहाद हो रहा, तो इस के आँकड़े संसद में दे’।

पर ओवैसी की चुनौती अनुत्तरित रही। अधिकांश संघ-भाजपा नेता मुहावरों, जुमलों, आधी-अधूरी बातों तक ही रहते हैं। किन्तु ओवैसी भी गर ‘लव-जिहाद’ की सच्चाई जानना चाहते तो अपनी माँग कैथोलिक बिशप काऊंसिल ऑफ इंडिया और सीरियन मलाबार चर्च से करते। लव-जिहाद का मामला सब से पहले भारत के क्रिश्चियन नेताओं ने उठाया था। वे वर्षों से इस पर लड़ रहे हैं। कैथोलिक बिशप काऊंसिल और सीरियन मलाबार चर्च ने 2020 में बिशप सम्मेलन (सायनोड) के आधिकारिक बयान में कहा था कि ‘लव-जिहाद एक सचाई है’, और खतरा है।

बिशप काउंसिल ने बाकायदा एक आयोग बनाकर इस मामले की पड़ताल करवाई। उस की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2005 से 2012 के बीच ही लव-जिहाद के लगभग चार हजार मामले हुए। केरल में ‘इस्लामिक पोपुलर फ्रंट’ की छात्र शाखा ‘कैंपस फ्रंट’ ने असंख्य क्रिश्चियन और हिन्दू लड़कियों को जाल में फँसा कर उन्हें मुसलमान बनाया है। अतः यदि किसी संघ-भाजपा सांसद को इस पर तनिक भी चिन्ता हो, तो वह बिशप काउंसिल की रिपोर्ट के ही आंकड़े संसद में पेश करें — ताकि ओवैसी की चुनौती को वाक-ओवर न मिले।

राजनीति में ऐसी स्थितियाँ जनता के बीच धारणाएं बनाती हैं। उन धारणाओं के परिणाम होते हैं। अतः संघ-भाजपा नेताओं को अपनी ही बातों पर भागना नहीं चाहिए। वह भी इतना गंभीर मुद्दा, जो हिन्दू-जैन-क्रिश्चियन-सिख समाज के अस्तित्व से जुड़ा है।

आखिर, इस्लाम द्वारा दुनिया भर में अनेक जगह दूसरे धर्म-समाज को खत्म कर देना ऐतिहासिक सचाई है। इस पर मुस्लिम उलेमा, लीडर फख्र भी करते हैं। फारस, सीरिया, कौंस्टेंटिनोपल, लेबनान, कोसोवो ही नहीं — भारत के भी पश्चिमी और पूर्वी हिस्से में हजारों मील इलाकों और करोड़ों हिन्दू-सिख लोगों को इस्लाम ने हड़प लिया। उस का औजार जिहाद ही है। इस में लव-जिहाद के विविध रूप भी शामिल हैं।

यह न केवल भारत, बल्कि अनेक यूरोपीय देशों में भी चल रहा है। वहाँ यह गतिविधि ‘ग्रूमिंग गैंग’ के काम से भी जानी जाती है। जिस की शिकार अधिकांशतः गोरी क्रिश्चियन लड़कियाँ और शिकारी अधिकांश पाकिस्तानी मूल के मुस्लिम होते हैं। सिख लड़कियों को भी ‘के टु के’ (कौर से खान) बनाने का धंधा जाहिर है। सो, यूरोप या भारत में लव-जिहाद वास्तविक है।

यहाँ केरल‌ सरकार और हाई कोर्ट ने भी इस का नोटिस लिया है। वहाँ के कम्युनिस्ट मुख्य मंत्री वी. एस. अच्युतानन्दन ने बरसों पहले, 2010 में ही, इस पर चेतावनी दी थी। उन के शब्दों में, एक मुस्लिम दल ‘मनी और मैरेज’ द्वारा दो दशक में केरल को पूर्ण इस्लामी बनाने की योजना पर चल रहा है। क्या ओवैसी ने इस पर भी ध्यान नहीं दिया था?

केरल हाई कोर्ट ने भी 2009 और 2017 में इस का संज्ञान लिया था। यद्यपि कोर्ट की टिप्पणी थी कि सभी अंतर्-धर्म विवाहों को ‘लव जिहाद’ की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। किन्तु इस में साफ ध्वनि है कि कुछ मामले ऐसे हैं। वे कौन से मामले हैं, और कितने हैं? निस्संदेह, यह कार्यपालिका और विधायिका के कर्णधारों को देखना था। इस पर बोलना और इस में हो रहे छल-प्रपंच, और दबाव-ब्लैकमेल, आदि को रोकना था। इस बिन्दु पर ओवैसी की चुनौती बिलकुल सही है।

पर ‘लव-जिहाद’ की परिभाषा तो केरल के मुख्यमंत्री बता चुके — ‘मैरेज का इस्तेमाल करके इस्लाम फैलाना’। वस्तुत: यही कुल जिहाद का उद्देश्य है — इस्लाम को बढ़ाना, और गैर-इस्लाम को मिटाना। इस्लाम की सारी लड़ाई बस इसी के लिए है। उस की बाकी सारी बातें दोयम या बहाना हैं।

कुरान की अनगिनत आयतें, जैसे 2:193; 8:39; 9:29; 9:111; 3:28; आदि जिहाद लड़ने की ताकीद करती हैं। जिस की एक ही टेक है: जैसे हो, सब को अल्लाह और मुहम्मद का अनुयायी बनाओ, ताकि सब उन का हुक्म मानें (कुरान, 3:32; 3:132; 4:59, आदि)। यही इस्लाम का आदि-अंत है। न इस से कम, न इस से अधिक। बाकी सब बातें कमतर या स्वैच्छिक हैं। केवल यह — इस्लाम फैलाओ, अन्य को मिटाओ — ही बुनियादी कौल है। इस्लामी राजनीति के सभी काम इसी के अंग हैं।

अतः, छल-बल या प्रेम से भी किसी हिन्दू, जैन, सिख, या क्रिश्चियन लड़की या लड़के को मुस्लिम बना लेना ही लव-जिहाद है। तलवार से, या प्रेम से — लक्ष्य वही है, मुस्लिम संख्या बढ़ाना। इस्लाम की ताकत बढ़ाना। इसी को कुरान, हदीस, और सीरा — इस्लाम की तीनों मूल किताबों में — ‘अल्लाह का काम’ कहा गया है। सो, लव-जिहाद या जबर-जिहाद, सभी इस्लाम के अनुरूप हैं। यह हर मौलाना जानता है। ओवैसी तो बखूबी जानते होंगे। वे केवल संघ-भाजपा नेताओं के अटपटेपन का मजा लेते रहते हैं!

पर, वस्तुत: अच्युतानन्दन वाली परिभाषा तेरह सदियों से भारत में घटित होती देखी जा सकती है। सभी इतिहासकारों के विवरण दिखाते हैं कि 712 ई. में आने वाले मुहम्मद बिन कासिम के पहले गिरोह से लेकर बाद की सदियों में आने वाले सभी मुस्लिम हमलावर — तुर्क, ईरानी, मंगोल, आदि — कोई भी अपनी बीवियाँ साथ नहीं लाए थे। सब ने यहीं की हिन्दू स्त्रियों, लड़कियों को गुलाम, रखैल, या बीवी बनाकर, और सब को मुसलमान बनाकर परिवार बनाया, या केवल औलादें पैदा की। इसे गुलाम-जिहाद, सेक्स-जिहाद, बलात्कार-जिहाद, रखैल-जिहाद, लव-जिहाद, जो भी कहें। बात वही रहेगी। आज इस का व्यवहारिक अर्थ किसी विस्थापित कश्मीरी पंडित या बंगलादेश के हिन्दू से पूछ लीजिए। वह इस के अनेक जीवित उदाहरण दे सकता है।

इस प्रकार, ऐतिहासिक रूप में, सीरिया, तुर्की, या ईरान के लगभग तमाम मुस्लिम ही नहीं — जो हजार साल पहले शत-प्रतिशत क्रिश्चियन या पारसी थे — बल्कि भारत-पाकिस्तान-बंगलादेश की संपूर्ण मुस्लिम आबादी के भी लगभग सभी लोग सारत: सेक्स-जिहाद या लव-जिहाद की उत्पत्ति हैं। किसी मुस्लिम तारीखनवीस ने भी, सदियों की तारीख में, एक भी हिन्दू, जैन, या सिख पिता का उदाहरण नहीं दिया है जिस ने स्वेच्छा से अपनी बेटी किसी मुगल बादशाह को भी दी हो। सो, क्रिश्चियन-यहूदी-हिन्दू-जैन-सिख लड़कियों, स्त्रियों को मुसलमान बनाना पूरे विश्व में, सदैव एकतरफा और जबरिया मामला था, और है।

यदि सदियों पुरानी यह सच्चाई दूर की लगे, तो अभी हाल का देख लीजिए। केवल पैंतीस वर्ष पहले, 1990 में कश्मीर में नारा दिया गया था — ‘असि छु बनावुन पाकिस्तान, बटव रोस तु बटन्यव सान’ (हम पाकिस्तान बनाएंगे, कश्मीरी पंडितों को खत्म कर, मगर उन की स्त्रियों को रख कर)। उस का पूरक नारा भी था — ‘या रलिव, या गलिव, या चलिव’ (या तो इस्लाम में मिल जाओ, या खत्म हो जाओ, या भाग जाओ)।

यह सब क्या था, जनाब ओवैसी? पूरी की पूरी मुस्लिम जमात समूचे प्रदेश में कहती है कि वे ‘हिन्दू स्त्रियों को रखेंगे, मगर हिन्दू पुरुषों को भगाएंगे’! किसलिए? ओवैसी इस से अनजान क्यों बन रहे हैं? केवल संघ-भाजपा के गैंडाखाल या अज्ञानी ही हिन्दू नहीं। असंख्य सामान्य हिन्दू भी हैं, जो इस्लाम की टेक और उस का इतिहास जानते हैं। उन के जले पर नमक छिड़कना इन्सानियत के खिलाफ है। औवेसी को कभी इस्लामियत से ऊपर उठ कर इन्सानियत का ख्याल करना चाहिए। इन्सानियत बड़ी और स्थाई चीज है। इस्लामियत छोटी और आनी-जानी।

सो, कश्मीर में तलवार-जिहाद और सेक्स-जिहाद का तालमेल अपवाद नहीं था। जो बात वहाँ कश्मीरी में कही गई थी, वही आज पश्चिम बंगाल और असम के सीमावर्ती हिन्दुओं को बंगला में कही जाती है। सुनिए — ‘गोरू राखबि कैंपे, टाका राखबि बैंके, बोउ राखबि कोथाय?’ (गायों को सी.आर.पी.एफ. कैंपों में रख कर बचाओगे, रूपए को बैंक में रखकर बचाओगे, मगर अपनी स्त्रियों को कहाँ रखोगे?)।

यह सब क्या है? बिलकुल साफ बलात्-जिहाद और सेक्स-जिहाद। वही, जो आठवीं सदी में मुहम्मद बिन कासिम के समय में गुलाम-जिहाद और रखैल-जिहाद था। आज कश्मीर और बंगाल की उक्त दोनों परिघटनाओं को बलात्कार-जिहाद के सिवा और क्या कहना चाहिए? आलिम या ईमाम इस पर चुप रहते हैं। पर विवेकशील मुस्लिम नेताओं को तो विशेषाधिकारी, घमंडी भावना से उबरना चाहिए। इस्लाम तलवार में मजबूत जरूर है, पर बाकी हर चीज में सदा से फिसड्डी। विचार, ज्ञान, साइंस, और मानवीय संस्कृति बिलकुल गोल। यह अभाव आज नहीं कल उसे ठंडा कर देगा। तब तक वह चाहे भारत के गैर-मुस्लिमों पर कब्जा ही क्यों न कर ले, या उन्हें मिटा भी दे। किन्तु अंततः इस्लाम का बेकार दिखना और खत्म हो जाना तय है। केवल इस की अवधि गैर-मुस्लिमों के अज्ञान में पड़े रहने, या इस्लाम के बारे में अपने अज्ञान से उबर जाने पर निर्भर है।

पर अभी तो इस्लाम का भारत में दबदबा बेरोकटोक है। आर.एस.एस. को चुनौती देकर ओवैसी का मजा लेना इस का उदाहरण है। आखिर क्यों नहीं! जब संघ-भाजपा समेत सभी दल, शासक, अकादमियाँ, मीडिया, आदि उन की तवज्जो में लगे रहते हैं। अज्ञान और डर, दोनों प्रभाव से। वस्तुत: डर और अज्ञान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, और एक-दूसरे को बढ़ाते हैं। हिन्दू नेता इस के उदाहरण हैं।

कभी मौलाना मदनी द्वारा जिहाद को ‘पवित्र’ कहकर नाराजी दिखाना, तो कभी ओवैसी द्वारा ‘लव-जिहाद’ पर तंज कर चुनौती देना हिन्दू नेताओं की असलियत दिखाता है। यह यहाँ जिहाद का नैतिक वर्चस्व ही है कि कोई हिन्दू नेता उसे आइना नहीं दिखाता। संसद से लेकर विधानसभाओं तक, एक भी नेता ऐसा नहीं जो काफिर के यानी पीड़ित के नजरिए से इस्लाम का सच दिखा सके।

इस प्रकार, जिहाद के सिद्धांत-इतिहास से नौनिहालों को अनजान रख उन्हें आसान शिकार बनने छोड़ दिया गया है। जब जिहाद को भारत में ही कोई वैचारिक चुनौती नहीं, तब पाकिस्तान और बंगलादेश में तो उस का राज ही है।‌ अत: उन देशों में जिहाद के हाथों हिन्दू आबादी का विनाश हो रहा है। कभी तेज, तो कभी धीमा। पर दिशा एक है।(जारी)

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