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हिन्दुओं का खुदा खैर करे!

लव-जिहाद मूल जिहाद का ही रूप है, चाहे इसे लव-जिहाद कहें या जबर-जिहाद। अतः जैसे भी हो — एक हिन्दू स्त्री घटना, और एक मुस्लिम स्त्री बढ़ना जिहाद का रुप है। शान्तिपूर्ण जिहाद के असंख्य रूपों में एक। याद रहे, इस्लाम केवल औपचारिक सिद्धांत नहीं। जिहाद और शरीयत के द्वारा उसे पक्के तौर पर लागू करने की फुलप्रूफ व्यवस्था है। भारत के हिन्दू दल, संगठन, नेता चुप हैं। वे आपस में, और अंदर भी, मुख्यतः कुर्सी-कुर्सी  का  तू-तू-मैं-मैं खेल रहे हैं।

लव-जिहाद की पहचान और पैमाना – 2

जिहाद ही इस्लाम की बुनियाद है। जिस का अपने हर रूप में एक ही लक्ष्य है — गैर-इस्लामी हर चीज को हराना, और मौका मिलते ही मिटा देना। वह मानवता जैसी किसी धारणा को ही नामंजूर करता है।

इस्लाम सदैव, हर विषय में, मानवता को दो हिस्से में बाँटता है — इस्लाम मानने वाले और नहीं मानने वाले। इसी से उस का हर व्यवहार तय होता है। राजनीतिक ही नहीं, पारिवारिक, वैयक्तिक, निजी तक। इस प्रकार, इस्लाम एक नैतिकता, यानी सभी मनुष्यों के लिए समान नियम, भावना, आदि, मानता ही नहीं! उस की बुनियादी टेक दोहरी नैतिकता है। यानी, हर बात में दो पैमाने। मुस्लिम के साथ एक व्यवहार, और काफिरों के साथ दूसरा। इसी से ‘दारुल-इस्लाम’ (जहाँ मुस्लिमों का शासन है) और ‘दारुल-हरब’ (जहाँ गैर-मुस्लिमों का शासन है) की धारणा है। सो, गैर-मुस्लिमों को खत्म कर सब कुछ इस्लामी बनाने का साधन और गतिविधि ही जिहाद है।

वह जिहाद सर्वमुखी और निरंतर है। जीवन का हर क्षेत्र घेरता है। कथित लव-जिहाद और बलात्-जिहाद उस में शामिल है। पाकिस्तान, बंगलादेश, और भारत के भी विभिन्न क्षेत्रों में क्रिश्चियन, हिन्दू, जैन लड़कियों को इस का शिकार बनाना जिहाद का ही अंग था, और है। बिना इस सैद्धांतिक बल के आम मुसलमान ऐसा घृणित काम सहजता से कदापि नहीं कर सकते। तब उन्हें इन्सान के रूप में कचोट होती! पर इस्लामी मतवाद उन्हें इस के लिए प्रेरित ही नहीं करता, बल्कि ‘अल्लाह का काम’ कह कर इसे सवाब, पुण्य का काम बताता है!  यानी, किसी गैर-मुस्लिम लड़की को बहलाकर, धोखा देकर, संबंध बनाकर, अंततः उसे मुसलमान बना लेना — यह कोई मुसलमान निस्संकोच इसीलिए करता है, क्योंकि इसे वह ‘पवित्र’ काम समझता है। ऐसा करने पर उसे इस्लाम के मौलाना, ईमाम शाबाशी देते हैं, फटकारते नहीं। वरना, ऐसी भावनात्मक धोखाधड़ी का पैमाना इतना बड़ा, और स्थायी नहीं हो सकता था।

इसीलिए, पाकिस्तान और बंगलादेश से इस के समाचार बार-बार आते रहे हैं। इस पूरी परिघटना का दारुण रूप प्रमाणिक रूप से तसलीमा नसरीन की पुस्तक ‘लज्जा’ (1993) में भी है। चाहे, उस परिघटना पर भारत के हिन्दू नेता तब भी चुप थे, आज भी हैं। केवल क्रिश्चियन नेता लव-जिहाद से लड़ रहे हैं। वही लोगों को सावधान कर रहे हैं। जबकि हिन्दू नेता तरह-तरह की डींग हाँकने और जुमले खोजने में लगे हैं।

इसलिए, मुस्लिम नेता सचमुच काबिले-तारीफ हैं, जो संसद में अकेले भी, या कश्मीर में तमाम कुर्सियों पर काबिज भी, अपना मजहबी उसूल कभी नहीं छोड़ते। किसी लोभ या स्वार्थ में उस से नहीं डिगते। जबकि अधिकांश हिन्दू नेता, कुर्सीनशीन या कुर्सीविहीन, हर हाल में बगलें झाँकते या बहाने गढ़ते रहते हैं। कुर्सी से दूर, तो एक तरह के बहाने। सारी कुर्सियाँ मुट्ठी में, तब दूसरी तरह के बहाने।

अतः यदि धर्म का आचरण सीखना हो, या बिना धर्म को उपेक्षित किए राजनीति सीखनी हो, तो मुस्लिम नेताओं से सीखनी चाहिए। उन का मजहब, इस्लाम, उन्हें मुहब्बत और नफरत का कायदा भी देता है। अरबी में इसे ‘अल वला वल बारा’ कहते हैं। इस के मुताबिक, हर मुस्लिम को अल्लाह के मुताबिक ही मुहब्बत/नफरत रखनी है। कुरान (9: 23, 24) में निर्देश है, ‘‘ओ मुसलमानों! अपने पिता या भाई को भी गैर समझो, अगर वे अल्लाह पर ईमान के बजाए कुफ्र पसंद करें। तुम्हारे पिता, भाई, बीवी, सगे-संबंधी, संपत्ति, व्यापार, घर – अगर ये तुम्हें अल्लाह और उन के प्रोफेट, तथा अल्लाह के लिए लड़ने से ज्यादा प्यारे हों, तो बस इंतजार करो अल्लाह तुम्हारा हिसाब करेगा।’’ इसे कुरान (60:1, 3) में आम निर्देश जैसा भी दुहराया गया है, ‘‘ओ ईमान वालो (मुसलमानों), मेरे दुश्मनों और अपने दुश्मनों को अपना न बनाओ। दुश्मन वे हैं जो अल्लाह के कहे से इन्कार करते हैं।’’ यानी, अल्लाह और उस के प्रोफेट मुहम्मद को मानने वाले से ही सदभाव रखना है। यही ‘अल वला’ यानी प्रेम का आधार है।

उसी का पूरक ‘अल बारा’ है। यानी जिस से अल्लाह और उन के संदेशी मुहम्मद नफरत करते हैं, उस से मुसलमानों को भी नफरत रखनी है। कुल मिलाकर, ‘अल वला वल बारा’ का सिद्धांत व्यक्तिगत स्तर पर वही है, जो राष्ट्रीय स्तर पर ‘दारुल-इस्लाम’ और ‘दारुल-हरब’ है। यानी जिस देश ने इस्लाम के सामने समर्पण कर दिया, और जिस ने अभी तक नहीं किया। सो, जैसे दारुल-हरब को दारुल-इस्लाम बनाना मुसलमानों का उसूल है, वैसे ही एक काफिर लड़की को मुसलमान बनाना भी। अर्थात् किसी मुसलमान का केवल मुसलमान से सदभाव और काफिर से घृणा उस का मजहबी उसूल है।

इसलिए किसी मुसलमान का किसी काफिर से सचमुच प्रेम या दोस्ती भी रखना कुफ्र, यानी इस्लाम में सब से घृणित चीज बताई गई है। पर, दोस्ती का दिखावा करने की इजाजत है। काफिर को धोखा देना, उस के खिलाफ षडयंत्र, उसे अपमानित करना, आदि जायज है। ताकि अन्ततः वह इस्लाम कबूल करे, या मारा जाए।

इस प्रकार, काफिरों से कपट करना जिहाद में शामिल है। मुहम्मद ने कहा था: ‘‘जिहाद छल है’’। अंग्रेजी अनुवाद में लिखा है: ‘जिहाद इज डिसीट’ (सहीह बुखारी, 4:52:268)। अतः छलपूर्वक किसी क्रिश्चियन, जैन, सिख या हिन्दू लड़की को जाल में फँसाकर मुसलमान बनाना इस्लाम के अनुसार जायज है। सो, मुसलमानों के सारे संबंध, और कथनी करनी ‘अल वला वल बारा’ के दायरे में हैं। हर बात में अल्लाह के अनुसार ही मुहब्बत या नफरत रखनी जरूरी है। काफिर से कोई सदभाव रखना अल्लाह और मुहम्मद को नामंजूर है। काफिर से अल्लाह और मुहम्मद घृणा ही नहीं, बल्कि ‘तीव्र घृणा’ करते हैं (कुरान, 40:35)।

इसी कारण, मुस्लिम की गैर-मुस्लिम से शादी से पहले उसे मुसलमान बनाया जाता है। शर्मिला टैगोर जैसी हस्ती को भी आयेगा बेगम बनना पड़ता है। यह कहना फिजूल है कि वैसी हिन्दू लड़कियाँ स्वेच्छा से मुसलमान बनती हैं। असलियत यही है कि एक बार किसी मुसलमान लड़के के साथ वैयक्तिक संबंध में पड़ जाने के बाद, किसी गैर-मुस्लिम लड़की के लिए रास्ते ही बहुत कम बच जाते हैं। उस ने, या उस के परिवार ने, उस की पूरी शिक्षा में कहीं जिहाद या इस्लाम के बारे में कभी कुछ नहीं जाना या सुना होता है।‌ बल्कि, भारत में तो पूरी शिक्षा उस के बारे में झूठी, बनावटी, मीठी बातें बताती ही खत्म हो जाती है। तब जो हिन्दू, जैन, या वामपंथी लड़की भोली गाय जैसी अनजान है, वह कैसे कल्पना करे कि वह इस्लाम के हाथों जल्द ही अपना धर्म, समाज, जीवन-शैली, मान्यताएं, आजादी, सब कुछ खो देगी? उसे तो पूरी शिक्षा और देश के कर्णधारों ने यही सिखाया है कि सभी धर्म ‘एक जैसे हैं’, सभी पूजा-आराधना के ‘विभिन्न रूप’ हैं, सभी में अच्छी-बुरी बातें हैं, सभी में कुछ अंधविश्वास हैं, मगर सभी में कुछ अच्छी बातें हैं, आदि आदि।

इसी अज्ञान के चलन से भारत में अपवाद छोड़ बड़े-से-बड़े नेता, अफसर, जज, एडीटर, प्रोफेसर तक ने कभी इस्लाम की बुनियादी बातें न पढ़ी, न सुनी, न देखी होती है! जबकि वही लोग संपूर्ण देश की शिक्षा, नीति और विमर्श तय करते हैं। तब जो शासक, नीति-निर्माता, शिक्षक, संपादक, आदि इस्लाम और जिहाद के सिद्धांत, व्यवहार और इतिहास से खुद गोल हैं — वे अपने समाज, परिवार, और बच्चों को वैयक्तिक, भावनात्मक जिहाद का शिकार होने से कैसे बचा सकते हैं? यह अपना ही बनाया दुष्चक्र है, जो मूलतः शिक्षा में सक्रिय है।

इसीलिए, किसी गैर-मुस्लिम लड़की, या लड़के को भी, मुस्लिम संबंध में पड़ने के बाद जब तक इस्लामी कायदों की असलियत का पता चलता है, तब तक इस्लाम अपना काम कर चुका होता है। चूँकि इस्लाम के प्रति देश और समाज की हालत निरे अबोध-सी है, इसलिए उस ने ठगी गई लड़की के लिए उबरने, निदान, सुरक्षा या वापसी की भी कोई व्यवस्था नहीं की है। फलत: लव-जिहाद एकतरफा, बेरोक चलता जाता है। चाहे कितना भी धीमा, या रूक-रूककर।

अत: लव-जिहाद मूल जिहाद का ही रूप है, चाहे इसे लव-जिहाद कहें या जबर-जिहाद। अतः जैसे भी हो — एक हिन्दू स्त्री घटना, और एक मुस्लिम स्त्री बढ़ना जिहाद का रुप है। शान्तिपूर्ण जिहाद के असंख्य रूपों में एक।

याद रहे, इस्लाम केवल औपचारिक सिद्धांत नहीं। जिहाद और शरीयत के द्वारा उसे पक्के तौर पर लागू करने की फुलप्रूफ व्यवस्था है। यह चौदह सदियों का इतिहास है कि जिस भी समाज में इस्लाम ने प्रवेश किया, समय के साथ उस का सफाया हो गया। हिंसा, शोषण, प्रलोभन, छल, कपट, दबाव, अपमान, लाचारी, आदि विविध विधियों से अंततः काफिर खत्म होते रहे हैं। अरब से लेकर यूरोप, अफ्रीका, एसिया तक इस के दर्जनों उदाहरण हैं। चाहे इस में सदियों लग जाए। यह आज कश्मीर और बंगाल (बंगलादेश) में आँखों के सामने चल रहा है।

इस बीच, भारत के हिन्दू दल, संगठन, नेता चुप हैं। वे आपस में, और अंदर भी, मुख्यतः कुर्सी-कुर्सी  का  तू-तू-मैं-मैं खेल रहे हैं। सालो भर, जीवन भर, चुनाव लड़ने, एक-दूसरे को गिराने, और सत्ता के सुख-आराम, या उस की आस में मस्त-व्यस्त। इसी का नैतिक सुभीता करने के लिए मुसलमानों को भी हिन्दू कह कर समस्या से ही आँखें फेर लेते हैं। आर.एस.एस. नेता के ही अनुसार भारत के ‘सभी 130 करोड़ लोग हिन्दू हैं’, और भगवान राम भी कोई  ‘ईमाम’ जैसी चीज हैं। यह सब बड़े संघ-भाजपा नेता बोलते घूमते हैं। तब तो जिहाद कोई बड़ी बात ही नहीं रही — मूँदहु आँख, कतहु कुछ नाहीं!

ऐसे हाल‌ में ओवैसी को लव-जिहाद की परिभाषा या जिहाद का आँकड़ा देने की भी किसे फुर्सत है। हिन्दू नेता व्यस्त हैं, और उन के संगठन मस्त। हिन्दुओं का खुदा खैर करे!(समाप्त)

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