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साम्प्रदायिक चश्मे से वन्दे मातरम् देखना गलत

सरकार का कहना है कि 1937 में हटाए गए चार अंतरे औपनिवेशिक दबाव में हटाए गए थे और अब उन्हें वापस लाना सांस्कृतिक सम्मान का प्रश्न है। कुछ मुस्लिम और ईसाई समुदायों का तर्क है कि उनके धर्म में ईश्वर के अलावा किसी और को देवी रूप में मानना उचित नहीं है, इसलिए वे इसे अपनी आस्था के खिलाफ मानते हैं। समर्थकों का कहना है कि यह धार्मिक पूजा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीक है।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने फरवरी 2026 में राष्ट्रगीत वन्दे मातरम् को लेकर नए प्रोटोकॉल जारी किए हैं। इन नियमों के अनुसार अब सभी सरकारी कार्यक्रमों और विद्यालयों में राष्ट्रगान से पहले वन्दे मातरम् गाना अनिवार्य होगा। पहले केवल दो अंतरे गाए जाते थे, अब सभी छह अंतरे गाना जरूरी होगा। पूरे गीत की अवधि तीन मिनट दस सेकंड तय की गई है। सिनेमा हॉल को छोड़कर अन्य सभी स्थानों पर गीत गाते या बजाते समय उपस्थित लोगों को सावधान की मुद्रा में खड़ा होना होगा। केवल शारीरिक रूप से अक्षम लोगों को छूट दी गई है। नए नियमों में अपमान की स्थिति में सजा का प्रावधान भी जोड़ा गया है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर गीत के गायन में बाधा डालता है या उसका अपमान करता है तो राष्ट्रीय सम्मान के अपमान का निवारण अधिनियम, 1971 के तहत तीन वर्ष तक की सजा या जुर्माना, या दोनों हो सकते हैं। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इसे अब राष्ट्रगान के समान कानूनी दर्जा देने की दिशा में कदम माना जा रहा है।

वन्दे मातरम् को अनिवार्य करने का विषय लंबे समय से चर्चा में रहा है। समर्थकों का तर्क है कि यह गीत स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक रहा है और इसका सामूहिक गायन नागरिकों में एकता और देशभक्ति की भावना मजबूत करता है। दूसरी ओर कुछ लोग अलग राय रखते हैं। सर्वोच्च न्यायालय पहले स्पष्ट कर चुका है कि संविधान के अनुच्छेद 51A में केवल राष्ट्रगान और ध्वज का उल्लेख है, राष्ट्रगीत का नहीं। संविधान में राष्ट्रगीत को अनिवार्य रूप से गाने का कोई मौलिक कर्तव्य नहीं जोड़ा गया है। हालांकि नए नियमों के बाद सरकार इसे राष्ट्रीय सम्मान के कानून के तहत संरक्षण देने की तैयारी में है। भाजपा और केंद्र सरकार का कहना है कि यह 1937 में हटाए गए अंशों को फिर से जोड़ने और राष्ट्रीय गौरव को स्थापित करने का कदम है। विपक्षी दल इसे इतिहास बदलने और चुनावी राजनीति से जुड़ा निर्णय बता रहे हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत उलेमा-ए-हिंद जैसे संगठनों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ बताते हुए अदालत जाने की बात कही है।

वन्दे मातरम् का इतिहास गौरवपूर्ण रहा है। इसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 1870 के दशक में लिखा और 1882 में आनंदमठ में शामिल किया। 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने कलकत्ता कांग्रेस अधिवेशन में इसे गाया। 24 जनवरी 1950 को राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि इसका स्थान राष्ट्रगान के बराबर सम्मान का होगा। 1937 में कुछ आपत्तियों के बाद कांग्रेस कार्यसमिति ने केवल पहले दो अंतरे गाने का निर्णय लिया था। बाद के अंकों में भारत माता की तुलना देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती से की गई है, जिसे लेकर विवाद रहा है। तीसरे से छठे छंद में शक्ति और शत्रु-विनाश का उल्लेख है, जो स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत था।

सरकार का कहना है कि 1937 में हटाए गए चार अंतरे औपनिवेशिक दबाव में हटाए गए थे और अब उन्हें वापस लाना सांस्कृतिक सम्मान का प्रश्न है। कुछ मुस्लिम और ईसाई समुदायों का तर्क है कि उनके धर्म में ईश्वर के अलावा किसी और को देवी रूप में मानना उचित नहीं है, इसलिए वे इसे अपनी आस्था के खिलाफ मानते हैं। समर्थकों का कहना है कि यह धार्मिक पूजा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रतीक है। भारत में देश को माता कहना परंपरा का हिस्सा है और शक्ति, ज्ञान जैसे प्रतीकों के माध्यम से उसे देखना सांस्कृतिक भाव है।

इस निर्णय पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ तेज हैं। सत्ता पक्ष इसे ऐतिहासिक सुधार बता रहा है, जबकि विपक्ष का कहना है कि यह संविधान सभा के पुराने समझौते के खिलाफ है और असली मुद्दों से ध्यान हटाने की कोशिश है। सरकार का कहना है कि वन्दे मातरम् स्वतंत्रता आंदोलन की आत्मा है और इसे सांप्रदायिक नजर से देखना गलत है।

कानूनी स्तर पर भी बहस जारी है। बिजोय इमैनुएल बनाम केरल राज्य (1986) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि कोई व्यक्ति सम्मान में खड़ा रहता है पर गीत नहीं गाता तो इसे अपमान नहीं माना जाएगा। अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मौन रहना भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। नवीन जिंदल बनाम भारत संघ (2004) में अदालत ने राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान को नागरिक का अधिकार और कर्तव्य दोनों माना। 2017 में अश्विनी उपाध्याय की याचिका में वन्दे मातरम् को अनिवार्य करने की मांग ठुकरा दी गई थी। अब नए दिशानिर्देशों के बाद पुराने फैसलों और नए आदेशों के बीच संवैधानिक बहस तय है।

फिलहाल ये निर्देश सरकारी संस्थानों में लागू हैं। कई राज्यों में इसे लेकर केंद्र और राज्य के बीच मतभेद उभर रहे हैं। एनडीए शासित राज्यों ने नियम लागू कर दिए हैं, जबकि कुछ विपक्ष शासित राज्यों ने इसे राज्यों के अधिकारों पर दखल बताया है। आने वाले समय में यह मुद्दा किस दिशा में जाएगा, यह देखना बाकी है।

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