सभी कहानियों को साथ रखिए तो एक दिलचस्प बात सामने आती है कि सेक्स इच्छा की शुरुआत नहीं है। इच्छा उससे बहुत पहले शुरू हो चुकी होती है। शायद यही वह बिंदु है, जहां ओशो की सोच प्रासंगिक हो जाती है। ओशो ने सेक्स को केवल दबाने या भोगने की वस्तु के रूप में देखने के बजाय उसके प्रति जागरूक होने की बात की। उनके लिए समस्या इच्छा का होना नहीं थी; समस्या यह थी कि मनुष्य या तो उससे लड़ता है या उसके पीछे बिना समझे भागता है।
पंकज दुबे
सेक्स के बारे में हमारी सबसे बड़ी दिक्कत शायद यह नहीं कि हम उसके बारे में कम जानते हैं। दिक्कत यह है कि हम उसके बारे में खुलकर सोचते भी कम हैं।
हमारे समाज में सेक्स या तो नैतिकता का विषय रहा है, या अपराध बोध का, या फिर चुपचाप उपभोग की जाने वाली चीज़। प्रेम पर कविता लिखी जा सकती है, विरह पर गीत बनाया जा सकता है, लेकिन इच्छा पर बात आते ही भाषा धीमी पड़ जाती है। इसलिए ‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ को सिर्फ चार कामुक कहानियों की तरह देखना उसके साथ नाइंसाफी होगी।
विक्रमादित्य मोटवानी, किरण राव, शकुन बत्रा और विशाल भारद्वाज की चार कहानियां दरअसल एक ही मानवीय इलाके में घूमती हैं कि ‘हम आखिर चाहते क्या हैं’? और उससे भी बड़ा सवाल कि हम जो चाहते हैं, क्या उसके बारे में अपने साथी से बात कर पाते हैं? यही वह जगह है जहां सेक्स धीरे-धीरे रिश्ते का विषय बन जाता है।
मोटवानी की कहानी में दो विवाहित स्त्रियां अपने वैवाहिक जीवन में आई ऊब को तोड़ने के लिए एक असामान्य रास्ता सोचती हैं। कहानी में हास्य है, लेकिन उसके पीछे एक गंभीर प्रश्न है, “क्या विवाह में साथ रहना अपने आप अंतरंग बने रहना भी है?”
विवाह की शुरुआत में दूसरा व्यक्ति रहस्य होता है। फिर वह परिचित होता है। फिर बहुत परिचित। और कभी-कभी इतना परिचित कि जिज्ञासा ही खत्म हो जाती है। शायद इच्छा का एक हिस्सा नवीनता नहीं, दूसरे को फिर से देखने की क्षमता है। मोटवानी की कहानी इसी खोई हुई दृष्टि को हल्के-फुल्के ढंग से पकड़ती है। खास बात यह है कि यहां स्त्री की कामना किसी पुरुष की इच्छा के जवाब में नहीं, अपने आप में मौजूद मानवीय इच्छा है। यह फ़र्क़ छोटा नहीं है।
किरण राव इस इच्छा को और भीतर ले जाती हैं। उनकी कहानी में आकर्षण सिर्फ़ उस व्यक्ति का नहीं है जो सामने मौजूद है; उसमें उस व्यक्ति की हमारी बनाई हुई कल्पना भी शामिल है। हम किसी को देखते हैं और फिर अपने मन में उसका एक संस्करण बना लेते हैं। कभी-कभी हम इंसान से नहीं, उसके बारे में अपनी कल्पना से आकर्षित होते हैं। यानी कामना की पहली मंज़िल शरीर नहीं बल्कि कल्पना है।
शकुन बत्रा के यहां यह कल्पना विवाह के टूटने के बाद भी शरीर में बनी रहती है। रिश्ता खत्म करने का फैसला हो चुका है, लेकिन आकर्षण पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।यह असुविधाजनक स्थिति इसलिए दिलचस्प है क्योंकि जीवन में भावनाएं अनुबंधों की तरह समाप्त नहीं होतीं। तलाक का कागज़ कह सकता है कि रिश्ता ख़त्म। शरीर शायद कहे, अभी नहीं। यहीं फ़िल्म सेक्स को एक ऐसी भाषा की तरह देखती है जो उस समय भी बोल सकती है जब शब्दों ने जवाब देना बंद कर दिया हो।
और विशाल भारद्वाज कामना को लगभग पूरी तरह मन के हवाले कर देते हैं। साहित्य, कल्पना, आवाज़ और स्मृति मिलकर एक ऐसा संसार बनाते हैं जहां इच्छा को किसी शारीरिक घटना की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
सभी कहानियों को साथ रखिए तो एक दिलचस्प बात सामने आती है कि सेक्स इच्छा की शुरुआत नहीं है। इच्छा उससे बहुत पहले शुरू हो चुकी होती है। शायद यही वह बिंदु है, जहां ओशो की सोच प्रासंगिक हो जाती है। ओशो ने सेक्स को केवल दबाने या भोगने की वस्तु के रूप में देखने के बजाय उसके प्रति जागरूक होने की बात की। उनके लिए समस्या इच्छा का होना नहीं थी; समस्या यह थी कि मनुष्य या तो उससे लड़ता है या उसके पीछे बिना समझे भागता है। इस विचार को ‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ पर रखें तो चारों कहानियां एक दिलचस्प नक्शा बनाती हैं।
कहीं इच्छा को विवाह की ऊब से मुक्ति चाहिए। कहीं वह कल्पना में अपना संसार बना रही है। कहीं रिश्ता खत्म हो चुका है, लेकिन शरीर पीछे छूट गया है।
कहीं साहित्य और कल्पना देह से पहले इच्छा को जगा रहे हैं। तो फिर सेक्स आखिर है क्या? शायद इसका उत्तर इतना सरल नहीं है। कभी वह सुख है। कभी रोमांच। कभी ये पुष्टि कि मैं अभी भी आकर्षक हूं। और कभी पलायन कि कुछ देर के लिए अपनी ज़िंदगी की दूसरी सारी परेशानियां भूल सकूं। और कभी-कभी वह उस अकेलेपन के खिलाफ मनुष्य का सबसे पुराना प्रतिरोध है, जिसे शब्दों में स्वीकार करना मुश्किल होता है। यहीं ओशो का ‘ध्यान’ वाला विचार महत्वपूर्ण हो जाता है।
यदि ध्यान का अर्थ पूरी तरह वर्तमान क्षण में होना है, तो अंतरंगता में भी ऐसी ही उपस्थिति की संभावना है। जब दो लोग सचमुच एक-दूसरे के साथ होते हैं, तब कुछ समय के लिए सामाजिक भूमिकाएं, चिंता, प्रदर्शन और आत्म-संदेह पीछे हट सकते हैं। लेकिन इसमें एक बड़ा फ़र्क़ है। सेक्स अपने आप ध्यान नहीं है। जागरूकता उसे एक अलग अनुभव बना सकती है। और जागरूकता का अर्थ है कि मैं सिर्फ़ अपनी इच्छा को नहीं देख रहा; मैं सामने वाले मनुष्य को भी देख रहा हूं।
यहीं से कामना और अंतरंगता अलग हो जाती हैं। कामना पूछती है, ‘मुझे क्या चाहिए?’ अंतरंगता पूछती है, ‘हम दोनों के बीच अभी क्या हो रहा है?’ यह फ़र्क़ विवाह के लिए शायद सबसे महत्वपूर्ण है। क्योंकि विवाह में सबसे बड़ा संकट हमेशा सेक्स की कमी नहीं होता। कभी-कभी संकट यह होता है कि हम अपने साथी के बारे में नई चीज़ें जानना बंद कर देते हैं। उसे देखकर हमें कुछ नया महसूस नहीं होता। उसकी चुप्पी पढ़ने की कोशिश नहीं करते। उसके बदलते शरीर को नहीं देखते। उसकी बदलती इच्छाओं के बारे में नहीं पूछते। हम व्यक्ति को उसकी भूमिका में बदल देते हैं मसलन पति, पत्नी, मां, पिता, कमाने वाला, घर संभालने वाला। और जिस दिन व्यक्ति की जगह भूमिका ले लेती है, उस दिन अंतरंगता धीरे-धीरे कम होने लगती है।
यहीं ‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ अपने शीर्षक से कहीं बड़ा हो जाता है। यह सिर्फ ‘लस्ट’ की कहानी नहीं है। यह उस मनुष्य की कहानी है जो चाहा जाना चाहता है, देखा जाना चाहता है और अपने भीतर अभी भी जीवित किसी हिस्से को महसूस करना चाहता है। चारों फ़िल्मों में कामना के रूप अलग हैं, लेकिन उनकी जड़ में पहचान का प्रश्न है। क्या मैं अभी भी आकर्षक हूं? क्या कोई मुझे देखता है? क्या मेरे भीतर अभी भी कुछ ऐसा है जिसे कोई पाना चाहता है? क्या मैं अपने साथी को अब भी वैसे देख सकता हूं? और शायद सबसे कठिन सवाल कि ‘क्या मैं खुद को अब भी वैसे देख सकता हूं’?
यही वजह है कि फ़िल्म में सेक्स जितना दिखाई देता है, उससे कहीं ज्यादा अनुपस्थित चीज़ें महत्वपूर्ण हैं जैसे बातचीत, जिज्ञासा, असुरक्षा, कल्पना, स्मृति और वह भावनात्मक दूरी जिसे कोई शारीरिक निकटता हमेशा भर नहीं सकती।
सभी निर्देशक इन चीज़ों को अलग-अलग सुरों में छूते हैं। मोटवानी के यहां हास्य है, किरण राव के यहां भ्रम, शकुन बत्रा के यहां रिश्ते के टूटने की बेचैनी और विशाल भारद्वाज के यहां कल्पना का सम्मोहन।
इनमें कोई एक कहानी दूसरी पर निर्णायक रूप से भारी नहीं पड़ती; असली दिलचस्पी इन चार दृष्टियों को साथ देखने में है। क्योंकि तब ‘लस्ट’ एक शारीरिक शब्द नहीं रह जाता। वह एक मनोवैज्ञानिक शब्द बन जाता है। हम किस चीज़ के लिए तरस रहे हैं? और शायद इस सवाल का जवाब सेक्स से बहुत बड़ा है।
कभी हम स्पर्श के लिए तरसते हैं। कभी ध्यान के लिए। कभी स्वीकार किए जाने के लिए। कभी पुराने प्रेम में नई रोशनी के लिए। और कभी सिर्फ़ इस आश्वासन के लिए कि हमारी ज़िंदगी अभी पूरी तरह आदत नहीं बनी है।
इसलिए सेक्स की सबसे बड़ी ताकत शायद उसका चरम सुख नहीं, बल्कि उसकी क्षमता है कि कुछ देर के लिए वह हमें अपनी बनाई हुई दुनिया से बाहर निकाल सके। लेकिन विडंबना देखिए कि हम सेक्स का इस्तेमाल कभी-कभी अकेलेपन से बचने के लिए करते हैं, जबकि सच्ची अंतरंगता हमें अकेलेपन के कारण से सामना कराती है।
मेरे भीतर ऐसा क्या खाली है, जिसे मैं दूसरे की देह से भरना चाहता हूं? यह सवाल आसान नहीं है। शायद इसी कारण हम इसे पूछना भी नहीं चाहते।
‘लस्ट स्टोरीज़ 3’ की असली दिलचस्पी इसी असुविधा में है। यह हमें सेक्स के बारे में सोचने के बहाने रिश्तों के बारे में सोचने पर मजबूर करती है। और ओशो को संदर्भ में रखें तो शायद यात्रा कुछ ऐसी बनती है- दमन से मुक्ति तक। कामना से जागरूकता तक। शरीर से उपस्थिति तक। और उपस्थिति से अंतरंगता तक।
क्योंकि अंततः किसी रिश्ते का सबसे कामुक हिस्सा शायद शरीर नहीं होता। वह क्षण होता है जब सामने वाला मनुष्य आपको महसूस कराता है कि मैं तुम्हें देख रहा हूं। तुम मेरे लिए अभी भी एक रहस्य हो।शायद प्रेम का भविष्य इसी छोटे-से रहस्य में छिपा है। और शायद कामना का भी। कामना के उस पार सेक्स नहीं, एक-दूसरे को फिर से खोज लेने की संभावना है।
देख लीजिएगा। (पंकज दुबे पॉप कल्चर क़िस्सागो, उपन्यासकार और यूट्यूब चैट शो ‘स्मॉल टाउन्स बिग स्टोरीज़” के होस्ट हैं।)
