वल्लभाचार्य का सबसे बड़ा धार्मिक कार्य पुष्टिमार्ग की स्थापना है। “पोषणं तदनुग्रहः” अर्थात भगवान की कृपा ही पोषण है। जहाँ अन्य मार्ग साधना, जप और तप पर जोर देते हैं, वहीं पुष्टिमार्ग पूरी तरह श्रीनाथ जी की कृपा पर आधारित है। उन्होंने पूजा के स्थान पर सेवा को प्रमुख बनाया।
13 अप्रैल वल्लभाचार्य जयंती
पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में, जब भारतीय समाज बाहरी आक्रमणों और भीतर की जड़ता से जूझ रहा था, तब वल्लभाचार्य ने पुष्टिमार्ग के माध्यम से भक्ति का प्रसार किया। वल्लभाचार्य का सबसे बड़ा बौद्धिक योगदान शुद्धाद्वैत दर्शन का प्रतिपादन है। उन्होंने शंकराचार्य के केवलाद्वैत में माया के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं किया और स्पष्ट किया कि ब्रह्म शुद्ध है, तथा जीव और जगत उसी के अंश हैं।
महाप्रभु का साहित्य संस्कृत वाङ्मय की अमूल्य धरोहर है। उन्होंने ब्रह्मसूत्र पर अणुभाष्य लिखकर अद्वैत की नई व्याख्या प्रस्तुत की और प्रस्थानचतुष्टय को समझाया। उन्होंने भागवत पुराण को वेदांत का अंतिम प्रमाण माना। उनकी सुबोधिनी टीका भक्ति साहित्य का अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। गृहस्थों और भक्तों के लिए सरल मार्गदर्शन देने हेतु उन्होंने यमुनाष्टक, सिद्धांतमुक्तावली, नवरत्न आदि सोलह छोटे ग्रंथ लिखे, जो जीवन जीने की कला सिखाते हैं।
वल्लभाचार्य का सबसे बड़ा धार्मिक कार्य पुष्टिमार्ग की स्थापना है। “पोषणं तदनुग्रहः” अर्थात भगवान की कृपा ही पोषण है। जहाँ अन्य मार्ग साधना, जप और तप पर जोर देते हैं, वहीं पुष्टिमार्ग पूरी तरह श्रीनाथ जी की कृपा पर आधारित है। उन्होंने पूजा के स्थान पर सेवा को प्रमुख बनाया। अष्टयाम सेवा—मंगला से शयन तक—के माध्यम से उन्होंने भक्ति को कला, संगीत (अष्टछाप कवि) और वास्तुकला से जोड़ दिया।
उनके शिष्यों में राजा से लेकर साधारण ग्वाले तक शामिल थे। दक्षिण भारत के काकरवाड़ में जन्म लेकर उत्तर भारत के ब्रज को कर्मभूमि बनाना और पूरे भारत की तीन बार नंगे पैर परिक्रमा करना उनकी व्यापक सांस्कृतिक चेतना को दर्शाता है। वल्लभाचार्य का दर्शन वैराग्य की जगह राग, यानी भगवान के प्रति प्रेम का संदेश देता है। उनका मानना था कि संसार को छोड़ने की जरूरत नहीं, बल्कि हर कर्म को कृष्ण को समर्पित करना चाहिए।
महाप्रभु वल्लभाचार्य का ब्रह्मसूत्र पर लिखा अणुभाष्य एक कालजयी ग्रंथ है। जहाँ आदि शंकराचार्य का शारीरिक भाष्य निर्गुण ब्रह्म और मायावाद पर केंद्रित है, वहीं अणुभाष्य सगुण-साकार ब्रह्म की तार्किक स्थापना करता है। इसमें वल्लभाचार्य ने स्पष्ट किया कि ब्रह्म और जीव के बीच माया कोई पर्दा नहीं है। उनके अनुसार माया ब्रह्म की शक्ति है, न कि कोई ऐसी चीज जो ब्रह्म को ढक ले। शुद्धाद्वैत का अर्थ है—कार्य (जगत) और कारण (ब्रह्म) दोनों शुद्ध हैं। संसार मिथ्या नहीं, बल्कि ब्रह्म का प्रकट रूप है। इसके अनुसार जीव ब्रह्म का वास्तविक अंश है, जैसे अग्नि की चिंगारी। ब्रह्म के तीन गुण हैं—सत्, चित् और आनंद। जीव में सत और चित तो प्रकट हैं, पर आनंद छिपा हुआ है। उसी आनंद को पुनः प्राप्त करने की प्रक्रिया पुष्टिमार्ग है। अणुभाष्य एक और महत्वपूर्ण अंतर बताता है—जगत सत्य है क्योंकि वह ब्रह्म की रचना है, जबकि संसार जीव के अज्ञान, अहंकार और ममता से बना भ्रम है।
वल्लभाचार्य और उनके पुत्र विट्ठलनाथ ने मिलकर आठ कवियों की एक ऐसी मंडली बनाई, जिसने ब्रजभाषा साहित्य और शास्त्रीय संगीत को अमर कर दिया। इन्हें अष्टसखा भी कहा जाता है। अष्टछाप में जाति या सामाजिक प्रतिष्ठा का कोई महत्व नहीं था। सूरदास को पुष्टिमार्ग का जहाज कहा गया। उनकी ‘सूरसागर’ वल्लभाचार्य के सुबोधिनी भाष्य का काव्य रूप मानी जाती है। इसमें ऊँची जाति के ब्राह्मणों के साथ-साथ सामान्य पृष्ठभूमि के भक्त भी शामिल थे—यह सामाजिक समरसता का बड़ा उदाहरण है। वल्लभाचार्य ने मंदिर की पूजा को राजसी वैभव से हटाकर वात्सल्य और सख्य भाव की सेवा में बदल दिया। अष्टछाप के कवि श्रीनाथ जी की आठों प्रहर की सेवा में कीर्तन करते थे। इससे हवेली संगीत की परंपरा बनी, जो भारतीय शास्त्रीय संगीत, विशेषकर ध्रुपद का आधार है। भक्ति केवल जप नहीं रही, बल्कि गायन, वादन, नृत्य और भोग के माध्यम से एक संपूर्ण सांस्कृतिक जीवन पद्धति बन गई। इन कवियों ने वल्लभाचार्य के गहरे दार्शनिक सिद्धांतों को सरल ब्रजभाषा में ढाल दिया। यदि अणुभाष्य विद्वानों के लिए मस्तिष्क था, तो अष्टछाप का साहित्य जनसाधारण के लिए हृदय बन गया।
अष्टयाम सेवा का मूल भाव यह है कि भक्त अपने अहंकार को भूलकर पूरी तरह भगवान के सुख में तल्लीन हो जाए (तदसुखसुखित्वम्)। दिन के अष्टयाम अर्थात 24 घंटों को आठ भागों में बाँटकर प्रभु की दिनचर्या तय की गई है, जो प्रकृति और ऋतुओं के अनुसार बदलती रहती है।
वल्लभाचार्य द्वारा स्थापित यह सेवा-पद्धति पूरी तरह प्रकृति से जुड़ी हुई है। पुष्टिमार्ग में वर्षा ऋतु में हिंडोला, वसंत में फाग और होली, तथा छप्पन भोग जैसे उत्सव केवल धार्मिक नहीं हैं, बल्कि वे मनुष्य को प्रकृति के चक्र से जोड़ते हैं। सेवा में उपयोग होने वाली पिछवाई चित्रकला विश्व प्रसिद्ध है। यह केवल सजावट नहीं, बल्कि उस समय चल रही लीला का दृश्य रूप है।
अष्टयाम सेवा तीन मुख्य स्तंभों पर आधारित है—राग, भोग और श्रृंगार का संगम। हर प्रहर का अपना विशेष राग और पद होता है। भोजन सात्विक और ऋतु के अनुसार होता है, जिसकी विविधता अन्य धार्मिक पद्धतियों में दुर्लभ है। वस्त्र और आभूषण दिव्य सौंदर्य का अनुभव कराते हैं।
अष्टयाम सेवा मनुष्य की पाँचों इंद्रियों—देखना, सुनना, चखना, छूना और सूँघना—को भगवान की सेवा में लगा देती है। इससे विषयों की आसक्ति धीरे-धीरे भगवान की आसक्ति में बदल जाती है।
