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नाना को मेरे नमन पर ओछा हल्ला क्यों?

जब नाना के न रहने की ख़बर आई तो मैं ने सच्चे ग़मगीन भाव से स्मृति-ट्वीट किया। सिर्फ़ इतना लिखा: ‘नाना को नमन!’ 34,170 लोगों ने उसे देखा। कइयों ने लाइक किया। लेकिन कुछ ने मुझे भद्दी-भद्दी गालियां दीं। मुझ से कुसूर यह हो गया कि अमित भाई शाह ने श्रद्धांजलि देते हुए अपने ट्वीट में नाना की तीन तस्वीरें साझा की थीं और मैं ने वही तस्वीरें अपने ट्वीट में पोस्ट कर दीं?… मगर मैं तो यह देख कर हैरत में पड़ गया कि कुछ लोगों के दिमाग़ में कितना कर्कट भरा होता है कि वे देश-काल-वातावरण की परवाह किए बिना हर वक़्त सिर्फ़ अपने दिल का कीचड़ बिखेरते रहते हैं।

मैं विश्वनाथ गजानन पाटेकर के अभिनय का धुंआधार प्रशंसक रहा हूं। वे बचपन से भले ही ‘नाना’ के संबोधन से विभूषित कर दिए गए थे, मगर मैं उन के एकाध ऐसे मित्रों को भी जानता रहा हूं, जो ‘नाना’ को ‘विशू’ के नाम से बुलाते थे। 1979 में जब मैं ‘टाइम्स-प्रशिक्षु’ बतौर बंबई पहुंचा तो मेरे एक मित्र के चाचा या मामा क़िस्म के कोई रिश्तेदार हमें मुजफ़्फर अली द्वारा निर्देशित फ़िल्म ‘गमन’ दिखाने ले गए। बोले कि बहुत अच्छी फ़िल्म है, चलो, चलो।

उन के इस अतिरिक्त आग्रह का रहस्य तब समझ में आया, जब वे उस के एक किरदार ‘वासु’ के बारे में फ़िल्म के दौरान और बाद में भी बार-बार यह ज़िक्र करते रहे कि यह जो अभिनेता है, यह मेरा दोस्त है। यह मेरे साथ पढ़ता था। फ़िल्म के मुख्य किरदारों फ़ारूख शेख और स्मिता पाटिल मे उन की कोई दिलचस्पी नहीं थी। वे हमें वासु का किरदार निभाने वाले नाना पाटेकर के किस्से सुनाते रहे। नाना पाटेकर की भूमिका बहुत ही छोटी-सी थी। ऐसी कि किसी का ध्यान भी न जाए। मगर चाचा जी या मामा जी, जो भी वे थे, उन के लिए सब से महत्वपूर्ण भूमिका उन के जे. के. स्कूल ऑफ़ आर्ट के सहपाठी विशू उर्फ़ नाना की ही थी।

सात-आठ साल बाद जब ‘अंकुश’ और ‘प्रतिघात’ फ़िल्में आईं तो नाना की पहचान बननी शुरू हुई। ‘अंकुश’ के मुख्य अभिनेता नाना थे और उस में क्षोभ और गुस्से से भरे एक बेरोज़गार नौजवान रवींद्र केलकर की उन की भूमिका को अच्छी तारीफ़ मिली। ‘प्रतिघात’ में उन्होंने एक्स-कांस्टेबल करमवीर की सहायक भूमिका निभाई थी, जो गैंगस्टर कालीप्रसाद के अत्याचारों की वज़ह से अपना मानसिक संतुलन खो देता है। नाना के इस किरदार ने भी दर्शकों पर अच्छी छाप छोड़ी।

फिर जब 1989 में ‘परिंदा’ आई तो चारों तरफ़ नाना-नाना होने लगा। मनोरोग से ग्रस्त बेहद क्रूर खलनायक ‘अन्ना’ के किरदार ने नाना को नाना पाटेकर बना दिया। उन्हें इस भूमिका के लिए पहला राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार मिला था। ‘परिंदा’ से ‘क्रांतिवीर’ और ‘तिरंगा’ तक का उन का सफ़र तो किसी को भी भुलाए नहीं भूलेगा। 1993-94 आते-आते तो कोई सोच भी नहीं सकता था कि नाना पाटेकर ने कभी ‘गिद्ध, भालू और शीला’ जैसी फ़िल्म में भी काम किया था।

तो अभी गुज़रे बृहस्पतिवार को जब नाना के न रहने की ख़बर आई तो मैं ने सच्चे ग़मगीन भाव से स्मृति-ट्वीट किया। सिर्फ़ इतना लिखा: ‘नाना को नमन!’ 34,170 लोगों ने उसे देखा। कइयों ने लाइक किया। लेकिन कुछ ने मुझे भद्दी-भद्दी गालियां दीं। मुझ से कुसूर यह हो गया कि अमित भाई शाह ने श्रद्धांजलि देते हुए अपने ट्वीट में नाना की तीन तस्वीरें साझा की थीं और मैं ने वही तस्वीरें यह सोच कर अपने ट्वीट में पोस्ट कर दीं कि भारत के गृहमंत्री के साथ नाना की मौजूदगी अमित भाई और नाना दोनों का ही मान बढ़ाने वाला प्रसंग है।

मगर मैं तो यह देख कर हैरत में पड़ गया कि कुछ लोगों के दिमाग़ में कितना कर्कट भरा होता है कि वे देश-काल-वातावरण की परवाह किए बिना हर वक़्त सिर्फ़ अपने दिल का कीचड़ बिखेरते रहते हैं। एक साहब ने मेरे लिए लिखा: ‘कितना मा… है तू हराम…’। एक और ने लिखा: ‘इस की … जली कि वो हिंदूवादी थे…‘। एक और बोले: ‘ये बताना चाहता है कि नाना फ़ासिज़्म का समर्थन करते थे, इसलिए उन की मौत पर शोक नहीं करना चाहिए…‘।

मैं तो दंग रह गया। मैं कुछ बोला ही नहीं और भाई लोग क्या-क्या कहने लगे? मैं ने सचमुच यह सब सोचा ही नहीं था। मैं ने नाना को पूरे अंतर्मन से नमन किया था। मैं ने कब कहा कि नाना हिंदूवादी थे? मैं ने कब कहा कि वे फ़ासीवाद के समर्थक थे? महज़ इसलिए कि मैं ने अमित भाई की साझा की गई तस्वीरें पोस्ट कर दीं, मुझ पर ऐसी तोहमतें? अमित भाई इन तस्वीरों में बेहद स्नेहपूर्ण मुद्रा में अपने निजी आवास या दफ़्तर में नाना का हाथ थामे और उन्हें गले लगाते दिखाई दे रहे हैं। मैं तो गृह मंत्री जी की सादगी और सदाशयता से सचमुच अभिभूत-सा था।

एक बात बताइए। अगर मैं नाना सरीखे किसी भी महान फ़िल्म अभिनेता को आदरांजलि देते हुए उस की तस्वीर भारत के गृह मंत्री रहे सरदार वल्लभ भाई पटेल, सी. राजगोपालाचारी, गोविंद वल्लभ पंत, लालबहादुर शास्त्री, यशवंत राव चह्वाण, चरण सिंह, पी. वी. नरसिंहराव, लालकृष्ण आडवाणी, पी. चिदंबरम या राजनाथ सिंह के साथ ट्वीट कर देता, तो क्या तब भी ऐसी ही गालियों का हक़दार होता? फिर सिर्फ़ अमित भाई को ले कर मेरे ख़िलाफ़ ऐसा ओछा हल्ला क्यों?

मैं तो खुल कर कहता हूं कि मैं अमित भाई को ऐसा हिंदूवादी कतई नहीं मानता हूं, जिस पर मुझे कोई ऐतराज़ हो। मैं तो ख़ुद हिंदू हूं और जितना हिंदू मैं हूं, उतने ही हिंदू वे हैं। वे क्या मुझ से ज़्यादा हिंदू हैं? मैं क्या उन से कम हिंदू हूं? जितना हिंदुत्व उन में है, उतना ही हिंदुत्व हर हिंदू में है। तो नाना की अमित भाई के साथ उपस्थिति क्या नाना को हिंदू बनाती है? क्या जब तक वे अमित भाई से नहीं मिले थे, हिंदू नहीं थे?

रह गई यह बात कि अमित भाई के साथ उन की तस्वीरें साझा कर के मैं नाना को फ़ासिज़्म का समर्थक बता रहा हूं तो यह भी मैं खुल कर कह रहा हूं कि मैं अमित भाई को फ़ासिस्ट बिल्कुल नहीं मानता हूं। ठीक है कि पिछले बारह साल से चल रही सरकार की कार्यशैली को ले कर मेरे मन में कुछ अनमनापन है। मैं इस बारे में अपनी राय अनवरत ज़ाहिर भी करता रहता हूं। मगर वे असहमतियां अपनी जगह हैं। इस का अर्थ यह नहीं है कि उन के चलते मैं अमित भाई के हर राष्ट्रीय योगदान को सिरे से खारिज़ कर दूं।

हमारे गृह मंत्री हो सकता है कि विकेंद्रीकरण में ज़्यादा विश्वास न रखते हों, हो सकता है कि कई मसलों को ले कर उन का अड़ियलपन सामने आया हो और यह भी हो सकता है कि भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था को ले कर उन के विचार थोड़े कट्टर किस्म के हों। लेकिन इतने भर से मैं उन्हें बेनिटो मुसोलिनी और एडॉल्फ हिटलर की श्रेणी में नहीं रख सकता। बावजूद थोड़ी कसामुसी के भारत का लोकतंत्र पूरी तरह ज़िंदा है। फासीवादी हुकूमतों में तो जनता की समूची जीवनीशक्ति भी जनतंत्र को जीवित नहीं रख पाती है।

सो, आप को यह नहीं लग रहा है क्या कि अमित भाई से असली परेशानी तो उन्हें है, जो मुझे धिक्कार रहे हैं? उन्हें अगर हमारे मौजूदा गृह मंत्री जी में वल्लभ भाई और गोविंद वल्लभ तो ठीक, आडवाणी और राजनाथ भी नज़र नहीं आ रहे हैं तो इस में मेरा क्या दोष है? इसलिए मेरे नहीं, अपने गिरेबां में झांकिए। जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। अमित भाई शाह को मैं तो देश के गृहमंत्रियों की ऐतिहासिक दीर्घा का ही विस्तार मानता हूं। जिन्हें उन में यह अक़्स दिखाई नहीं देता हो वे अपना जानें। मन में मैल आप के है, मेरे नहीं। अपना मन धोइए। मेरा तो धुला हुआ है।

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