नेहरू में नहीं था। वे जो बात कहते थे, जो विश्वास रखते थे, उसी अनुरूप ही सारे काम आजीवन किए। मोदी ने अपने विचारों के प्रति वैसी निष्ठा शायद ही दिखाई। यदि नेहरू को हिन्दुत्व भाव से एलर्जी थी, तो उन्होंने नकली बातें नहीं की। उन्हें वामपंथियों से सहानुभूति थी, तो उन्होंने वामपंथियों को सम्मानित किया।.. मोदी ने मुख्यमंत्री रहते हुए बरसों तक अरुण शौरी जैसों से सलाह-मशवरा लेते रहने की छवि बनाई। पर जब राष्ट्रीय नीति-निर्माण और बौद्धिकों को प्रोत्साहन देने का समय आया, तो मोदी ने शौरी को बाहर, और सेक्यूलरवादी एम. जे. अकबर को पुरस्कृत किया।
अभी एक भाजपा नेता ने नेहरू-मोदी तुलना करते हुए, तुलना कम फजीहत ज्यादा की है। उन्होंने जिस तरह आड़ी-तिरछी बातें रखी, उस से मोदी की भी फजीहत होती है।
जैसे, वे 15 अगस्त 1947 को ‘माउंटबेटन द्वारा शपथ लेकर’ नेहरू का प्रधानमंत्री बनना हल्का करते हैं, मानो कुछ अवैध हुआ! पर यह नहीं कहते कि मई 2014 में ‘प्रणव मुखर्जी द्वारा शपथ लेकर’ मोदी प्रधानमंत्री बने। क्या इसलिए कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने का श्रेय कांग्रेस नेता प्रणव मुखर्जी को भी जाएगा?
कुछ समय से प्रोपेगंडा चल रहा है कि मोदी सब से अधिक समय प्रधानमंत्री रहने का ‘रिकॉर्ड तोड़ देंगे’। यद्यपि नेहरू के लगभग 18 साल (यदि 2 सितंबर 1946 से जोड़ें, जिस का भाजपा नेता ने ही उल्लेख किया है), या लगभग 17 साल की तुलना में अभी मोदी के केवल 12 साल हुए हैं। तब यह रिकॉर्ड तोड़ प्रोपेगंडा की उतावली क्यों? जबकि अभी 2029 का लोक सभा चुनाव भी बाकी है।
फिर, यह कैसा राष्ट्रवाद जिस में देश के सब से लोकप्रिय प्रधानमंत्री के पूरे काल को मानो अवैध बताने की झक है? भाजपा नेता ने नेहरू के प्रधानमंत्री बनने में ‘अंग्रेजों की सुविधा’ को भी कारण बताया, ‘गाँधीजी की कृपा’ को भी जोड़ा। पर वे भूल गये कि अक्तूबर 2001 में खुद मोदी भी वाजपेई की कृपा से मुख्यमंत्री बने थे। वरना, तब तक उन्हें कौन जानता था! बाद में भी, प्रधानमंत्री उम्मीदवार के लिए स्वीकृत होने में भी मोहन भागवत की, फिर अरुण जेटली, अंततः राजनाथ सिंह की ‘कृपाओं’ का भी हाथ था। वरना वाजपेई, अडवाणी, जोशी, सुषमा, गडकरी जैसे निर्णायक नेता मोदी को दूर रखना चाहते थे। सो, यदि राजनाथ की कृपा न होती, तो मोदी प्रधानमंत्री उम्मीदवार ही नहीं हो सकते थे।
क्या नेहरू के साथ भी ऐसा कुछ था? वे 1920 के दशक से ही राष्ट्रीय नेता के रूप में प्रसिद्ध थे। चाहे 1947 में कांग्रेस कमिटी में उन से अधिक सरदार पटेल को चाहने वाले थे। जैसे 2013 में भाजपा कमिटी में आडवाणी को चाहने वाले अधिक थे। फिर, यदि 2013 में आम जनता में मोदी की हवा अधिक थी, तो 1946 में नेहरू विगत दो दशकों से लोकप्रिय थे — पटेल, सीतारमैया, कृपलानी आदि तुलना में काफी पीछे थे।
इस प्रकार, कभी पार्टी कमिटी, और कभी जनता में लोकप्रियता दिखाना अटपटा है। जबकि दोनों हिसाब में नेहरू ऊँचे ठहरते हैं। तुलना करने में भाजपा नेता ने यह तथ्य गोल कर दिया है कि 2013 तक भी भाजपा के सर्वोच्च निकाय में मोदी को कितने वोट थे? यह भी कि तब वे उस निकाय के सदस्य तक नहीं थे।
जनता में भी मोदी इतने अनजान थे कि वाजपेई कृपा से मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन के लिए गुजरात में सुरक्षित सीट खोजनी पड़ी! जिस बड़ौदा में उन्होंने बरसों काम किया था, जिसे मोदी की ‘कर्मभूमि’ बताया गया, वहाँ से भी उन की जीत निश्चित न थी। सो वे 2002 में मणिनगर से विधायक बने।
क्या नेहरू के साथ भी ऐसा था? नेहरू पर ‘गाँधी की कृपा’ और ‘अंग्रेजों की सुविधा’ का लांछन लगाने वाले छिपाते हैं कि नेहरू देश की किसी लोक सभा सीट से जीत सकते थे — संभवतः बिना प्रचार किए भी! और यह स्थिति 1930 से 1960 तक मानी जा सकती है, यदि लोकप्रियता को आधार मानें।
यही नहीं, मोदी को 2014 में भी दो जगह से चुनाव लड़ना पड़ा, क्योंकि किसी एक जगह जीत पक्की नहीं समझी गई थी। जबकि नेहरू मजे से एक ही फूलपुर से तीनों बार लोक सभा पहुँचे थे। उन्हें निजी सीट के लिए कभी सोचना भी नहीं पड़ा था।
सब से बढ़कर, यदि ‘जन’ समर्थन को आधार बनाएं तो मोदी को 2024 में जनता ठुकरा चुकी है! उन की पार्टी को बहुमत नहीं मिला। नेहरू की तीनों बार, 1952, 1957, 1962 में लोक सभा जीत उन के नेतृत्व में कांग्रेस की अकेले जीत थी। उन्हें अपने संसदीय दल का नेता चुने जाने के लिए भी कुछ नहीं करना पड़ा था। जो जून 2024 में मोदी के लिए करना पड़ा।
भाजपा संसदीय दल के नेता के रूप में मोदी का चुनाव 2014, 2019 लोक सभा चुनाव परिणाम के बाद जैसे हुआ था, वैसे 2024 में नहीं हुआ। पहले 5 जून 2024 को सहयोगी दलों द्वारा समर्थन की बैठक में उन्हें ‘समर्थन’ दिखाया गया। जिस का आधार बना कर 7 जून 2024 को भाजपा संसदीय दल की बैठक में मोदी को नेता ‘चुना’ गया। यह भाजपा सांसदों पर मनोवैज्ञानिक दबाव था। वरना, भाजपा संसदीय दल की बैठक यदि कायदे से एनडीए समर्थन वाली बैठक से पहले होती, तब किसी अन्य भाजपा नेता द्वारा भी उम्मीदवार बनने का खतरा था! फिर क्या होता, कहना कठिन है।
सो, नेहरू को नीचा दिखाने की कसरत अनावश्यक है। जिन्हें कभी तिकड़म नहीं करनी पड़ी। तब भी, जब गाँधी जी ने मार्च 1947 में नये वायसराय माऊंटबेटन को सलाह दी कि जिन्ना के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बना दें ताकि भारत-विभाजन की बात खत्म हो जाए। पर पटेल, कृपलानी, आदि अन्य सर्वोच्च नेता भी जिन्ना को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में न थे।
अभी भाजपा नेता ने नेहरू की गलतियाँ दिखाने में अनुच्छेद 370, तिब्बत नीति, आदि मुद्दे भी उठाए हैं। वे भूलते हैं कि तब सरकार में पटेल, अंबेडकर, मुंशी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, आदि अनेक दिग्गज थे। यदि कश्मीर या तिब्बत पर कोई गंभीर आपत्ति होती, तो वे विरोध करते या सरकार से अलग हो सकते थे। जैसा मुखर्जी ने अप्रैल 1950 में अन्य मुद्दे पर किया भी।
इसलिए, अब कश्मीर या तिब्बत को अकेले नेहरू के माथे डालना अतिरंजना है। निश्चित ही तब कांग्रेस नेतृत्व ने कश्मीर मुद्दे को हल्के से लिया था। बल्कि कांग्रेस कमिटी में अनुच्छेद 370 स्वीकार करने का प्रस्ताव सरदार पटेल ने रखा था! अतः बाद के दुष्परिणामों का दोष अकेले नेहरू को देना छल है। यह वैसा ही होगा, जैसे ‘नोटबंदी’ (2016) या ‘आपरेशन सिंदूर’ (2025) की खामख्याली का दोष भविष्य में केवल प्रधानमंत्री को दिया जाए।
दरअसल, नेहरू ही सच्चे राष्ट्रवादी थे। कांग्रेस की एकछत्र जीत के बाद भी उन्होंने राष्ट्रीय सरकार बना कर उदाहरण पेश किया। अपनी कैबिनेट में डॉ अंबेडकर और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी रखा जो उन की पार्टी के नहीं थे। जब कि मोदी ने अपनी पार्टी के भी कई काबिल, बल्कि कठिन समय में सहायता करने वालों को भी छोड़ दिया। बल्कि अपमानित हाल में रख कर बाहर का रास्ता दिखाया। ऐसे कदमों से राष्ट्र की लाभ-हानि का हिसाब क्या बनता है?
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तो नेहरू का बड़ा स्थान था। वे गुटनिरपेक्ष आंदोलन के एक संस्थापक थे, जिस ने तीन दशकों तक विश्व राजनीति में एक भूमिका निभाई। आज हमारा स्थान ट्रंप लगातार दिखा रहे हैं। उन्होंने भारत को मजाक बना दिया है जिन का मौखिक जबाव देने में भी हमारे नेता असहाय हैं। अमेरिका एक तरह जगजाहिर रूप से भारत को आदेश देकर कई फैसले करवा रहा है। तुलना में, पाकिस्तान की भी स्थिति इतनी ऊँची हुई है कि उस ने अभी अमेरिका-ईरान युद्ध रोकने में मध्यस्थता की।
जबकि नेहरू के समय भारत की हैसियत यह थी कि अमेरिका ने भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता देने की कार्रवाई (1955) शुरू कर दी थी। नेहरू का आत्मविश्वास ऐसा था कि उन्होंने उसे जोर देकर अस्वीकार किया। वह गलत कदम साबित हुआ, यह दूसरी बात है। पर अभी बात अंतरराष्ट्रीय राजनीति में देश व नेता की हैसियत की हो रही है।
अंदरूनी नीतियों में भी नेहरू ने शिक्षा, उद्योग, संस्कृति, आदि हर क्षेत्र में अपने विचारों के अनुसार काम किया। वे समाजवादी थे, तो उन्हीं मान्यताओं से विविध काम किए। जबकि मोदी ने केंद्र में आने से पहले और बाद में विपरीत अदाएं दिखाई। पहले इन्होंने ‘मिनिमम गवर्नमेंट’ की बात की थी। जून 2012 में कहा था कि ‘बिजनेस, व्यापार करना सरकार का काम नहीं’। जबकि केंद्र में आने के बाद उन्होंने सरकार को बड़ा कर दिया। मंत्रालय घटने के बजाए बढ़ गये। हर कहीं सरकारी हाथ इतना बेतहाशा फैला दिया जो पहले कभी न था।
वही स्थिति सेक्यूलरिज्म पर देखी गई। इस में मोदी की पब्लिक भंगिमा और असल नीति में भारी अंतर रहा है। प्रधानमंत्री बनने से पहले अपनी ‘एंटी-मुस्लिम’ छवि बनाकर लाभ लिया। जबकि वह पद लेकर मुस्लिमों के ‘तृप्तिकरण’ की घोषणा की। उसी तरह, मुख्यमंत्री रूप में जैसे अधिकार उन्होंने अपने लिए रखे, वैसा अधिकार प्रधानमंत्री बनने पर भाजपा के किसी मुख्यमंत्री को नहीं दिया।
यह सब नीतिगत खालीपन दिखाता है। जो नेहरू में नहीं था। वे जो बात कहते थे, जो विश्वास रखते थे, उसी अनुरूप ही सारे काम आजीवन किए। मोदी ने अपने विचारों के प्रति वैसी निष्ठा शायद ही दिखाई। यदि नेहरू को हिन्दुत्व भाव से एलर्जी थी, तो उन्होंने नकली बातें नहीं की। उन्हें वामपंथियों से सहानुभूति थी, तो उन्होंने वामपंथियों को सम्मानित किया। प्रोत्साहन दिया।
जबकि मोदी ने मुख्यमंत्री रहते हुए बरसों तक अरुण शौरी जैसों की आवभगत की, उन से सलाह-मशवरा लेते रहने की छवि बनाई। पर जब राष्ट्रीय नीति-निर्माण और बौद्धिकों को प्रोत्साहन देने का समय आया, तो मोदी ने शौरी को बाहर, और सेक्यूलरवादी एम. जे. अकबर को पुरस्कृत किया। उन्हीं को बढ़ाया जिन्होंने मोदी राज के गुजरात को ‘हिन्दुत्व की प्रयोगशाला’ कह-कह कर वहाँ मुस्लिमों के उत्पीड़न का प्रचार किया था।
अतः जहाँ नेहरू में वैचारिक निष्ठा थी, वहीं मोदी का वैसा कुछ नहीं रहा है। इसीलिए नेहरू की पुस्तकें, उन की ‘आत्मकथा’, ‘भारत की खोज’, आदि स्थाई महत्वपूर्ण बनी हुई हैं। जबकि मोदी के किसी भी लेखन या व्याख्यान को आज ही कोई नहीं देखता! तब कल उस का क्या मोल होगा, यह अनुमान कर सकते हैं।
यदि नेहरू ने नीतिगत गलतियाँ की, तब भी उन का स्थान स्टालिन, माओ, नासिर, आदि की श्रेणी में रहेगा जिन की अनेक नीतियाँ भी भयानक हानिकर साबित हुईं। लेकिन उन में किसी दोहरेपन का दोष नहीं लगाया जा सकता।
जब बाद की पीढ़ियाँ नेताओं का मूल्यांकन करती हैं तब पूरी स्थिति अधिक प्रमाणिक आती है। इस रूप में, अभी मोदी के मूल्यांकन का समय ही नहीं आया है। तब तक उन की तुलना वर्तमान विदेशी नेताओं से करनी चाहिए, न कि अपने दिवंगत नेताओं से।
निस्संदेह, नेहरू की आलोचना के अनेक उचित बिन्दु हैं। लेकिन जैसी बचकानी विधि से भाजपा प्रचारक ऐसा कर रहे हैं उस से उलटे मोदी की छवि ही गिरेगी।
