Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

अब ‘विश्व व्यवस्था’नहीं, शक्ति का खेल

New Delhi, Jan 27 (ANI): Prime Minister Narendra Modi with President of the European Council António Luís Santos da Costa and President of the European Commission Ursula von der Leyen, at Hyderabad House in New Delhi on Tuesday. (DPR PMO/ANI Photo)

यदि यूरोप का अतीत कलंकित है, तो अमेरिका का इतिहास रणनीतिक भूलों से भरा है। उसने ही साम्राज्यवादी चीन के विश्व उदय का रास्ता खोला था। वर्ष 1999 में व्यापार समझौता और 2001 में विश्व व्यापार संगठनमें प्रवेश दिलाकर अमेरिका ने चीन को उत्पादन का वैश्विक केंद्र बना दिया। तब चीन की जीडीपी 1.2 ट्रिलियन डॉलर थी, जबकि अमेरिका की 10.3 ट्रिलियन। आज वही चीन 19.5 ट्रिलियन डॉलर के साथ अमेरिका के करीब पहुंच गया है,

हर कुछ दशकों में, जब वैश्विक अस्थिरता बढ़ती है, तब एक परिचित शब्द सुनाई देने लगता है— विश्व व्यवस्था (वर्ल्ड ऑर्डर)। हालिया दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कुछ तल्ख बयानों और हैरानी भरे कदमों के बाद यह शब्दवली फिर चर्चा में है। अब इसे “नई विश्व व्यवस्था” के रूप में पेश किया जा रहा है। लेकिन इतिहास साक्षी है कि ऐसी कोई स्थायी वैश्विक व्यवस्था कभी नहीं रही। न पहले इसका कोई वजूद था, न आज है, और न ही यह निकट भविष्य में कभी बनेगा। यह विचार सुनने में भले ही आकर्षक हो, लेकिन वास्तविक शक्ति-संतुलन की कठोर सच्चाइयों से दूर एक कोरी-कल्पना है। असल दुनिया में हमेशा एक बात का वजन होता है और वह शक्तिशाली का कमजोर पर प्रभुत्व है, जिसे अक्सर कानून, नैतिकता, सभ्यता और मानवाधिकार की ओट में ढक दिया जाता है।

बीते 20 जनवरी को ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच पर एआई निर्मित एक विवादित तस्वीर साझा की। उसमें उन्होंने कनाडा, ग्रीनलैंड और वेनेजुएला को अमेरिकी क्षेत्र के रूप में दिखाया। वह तस्वीर अमेरिकी राष्ट्रपति के कार्यालय की थी, जिसमें शीर्ष यूरोपीय नेताओं की भी मौजूदगी थी। अब अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा यह पोस्ट कोई शरारत भरी हरकत नहीं थी, बल्कि इसके पीछे बहुत सोचा-समझा और गूढ़ राजनीतिक संदेश छिपा था। कुछ दिन पहले, 8 जनवरी को ट्रंप ने ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ को साक्षात्कार देते हुए कहा था: “मुझे किसी अंतरराष्ट्रीय कानून की जरूरत नहीं; मेरी शक्ति की सीमा सिर्फ मेरी नैतिकता है।”

यह संकेत इतिहास के संदर्भ में विडंबनाओं से भरा है, क्योंकि अमेरिका खुद साम्राज्यवादी नियंत्रण के खिलाफ विद्रोह से पैदा हुआ वह देश है, जो पहले ही अमेरिकी महाद्वीप पर बाहरी अधिकार की भयावह क्रूरता को झेल चुका था। 1492 में इतालवी क्रिस्टोफर कोलंबस ने स्पेन के ईसाई राजा के लिए अमेरिका की “खोज” की। लंबी समुद्री यात्रा करके अमेरिका पहुंचे कोलंबस का वहां जिन मूल निवासियों ने स्वागत किया, उन्हें और उनकी ‘पेगन’ संस्कृति-सभ्यता को मजहब के नाम पर मिटाकर अमेरिकी संग्रहालय में शोभा बढ़ाने की वस्तु तक गौण कर दिया है।

सदियों बाद संभवत: पहली बार यूरोप खुद अपने द्वारा स्थापित साम्राज्यवादी हनक को महसूस कर रहा है। ट्रंप की “साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं” की आलोचना उसी यूरोपीय महाद्वीप से आ रही है, जिसका इतिहास ही आक्रमण, औपनिवेश और नस्लीय भेदभाव से भरा है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने स्विट्जरलैंड स्थित दावोस में ‘विश्व आर्थिक मंच’ से ट्रंप को घेरते हुए कहा था, “यह नए साम्राज्यवाद का समय नहीं है।” ये वही फ्रांस है, जो आज भी कैरेबियाई क्षेत्र से हिंद महासागर तक कई क्षेत्रों का अपना प्रशासन चलाता है। नाम भले ही बदल गया हो, लेकिन शासन करने का नजरिया अब भी वही संरक्षणवादी है। इसी कारण फ्रांस के पास दुनिया में सबसे अधिक 12-13 ‘समय मंडल’ (टाइम जोन) हैं। अल्जीरिया में फ्रांसीसी शासन के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम (1954–62) में लगभग 15 लाख लोग मारे गए थे।

वर्तमान यूरोप की बेचैनी दावोस से पहले ही दिख रही थी। जर्मनी के वित्तमंत्री ने चेतावनी दी कि वे ट्रंप के दबाव के आगे नहीं झुकेंगे। वही फ्रांसीसी वित्तमंत्री के अनुसार, 250 साल पुराने सहयोगी अब शुल्क को हथियार बना रहे हैं। वही कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने विश्व व्यवस्था को “एक सुखद भ्रम का अंत” बताया है। सच तो यह है कि तथाकथित ‘विश्व व्यवस्था’ कभी सार्वभौमिक नैतिक समझौता नहीं रहा, बल्कि यह नियम बनाने वालों के हित में बनी शक्तिशालियों का अग्रिम उपक्रम था। इसलिए पश्चिमी दुनिया के मुंह से नैतिकता की बात करना छलावा जैसा है।

पुर्तगाली वास्को डी गामा और स्पेनवासी जेसुइट मिशनरी फ्रांसिस जेवियर आदि के 16वीं शताब्दी में भारत पहुंचने का घोषित लक्ष्य स्थानीय पूजा-पद्धति को मिटाकर ईसाइयत का विस्तार करना था। इसमें हिंदुओं, मुसलमानों और स्थानीय ईसाइयों पर जो उत्पीड़न हुआ— उसका नृशंस इतिहास है। ‘गोवा इनक्विजिशन’ उसका एक भयावह रूप है, जिसमें असंख्य स्थानीय लोगों की जीवित रहते जीभ काट दी और चमड़ी उधेड़ ली गई थी। कई प्रामाणित लेखकों के साथ संविधान निर्माता डॉ। भीमराव रामजी अंबेडकर के साहित्य में भी इन सभी निर्मम घटनाओं का स्पष्ट उल्लेख है। वैटिकन और कैथोलिक चर्च दुनिया के कुछ हिस्सों (कनाडा सहित) में अपने ‘अपराधों’ पर खेद जता चुका है, जो कोई पश्चाताप न होकर केवल छवि सुधार का हिस्सा है।

यदि यूरोप का अतीत कलंकित है, तो अमेरिका का इतिहास रणनीतिक भूलों से भरा है। उसने ही साम्राज्यवादी चीन के विश्व उदय का रास्ता खोला था। वर्ष 1999 में व्यापार समझौता और 2001 में ‘विश्व व्यापार संगठन’ में प्रवेश दिलाकर अमेरिका ने चीन को उत्पादन का वैश्विक केंद्र बना दिया। तब चीन की जीडीपी 1.2 ट्रिलियन डॉलर थी, जबकि अमेरिका की 10.3 ट्रिलियन। आज वही चीन 19.5 ट्रिलियन डॉलर के साथ अमेरिका के करीब पहुंच गया है, जिसका तिब्बत पर कब्जा है, कई देशों (भारत सहित) से चीन का सीमा (समुद्री क्षेत्र सहित) विवाद है और अपनी दूषित कर्ज-नीति से श्रीलंका जैसे कुछ देशों को तबाह कर चुका है। अमेरिका दशकों से ताकत दिखाता रहा है। वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान और वेनेजुएला— इसके प्रमाण है। 1980 के दशक में अमेरिका ने अफगानिस्तान में तत्कालीन सोवियत के खिलाफ जिन मुजाहिद्दीनों को पैदा किया, बाद में उन्हीं से तालिबान के रूप में उसे लड़ना पड़ा और फिर दो दशक बाद उन्हीं तालिबानियों से समझौता करके अपने हथियारों को छोड़कर वापस चलता बना। लेकिन अमेरिका में लोकतंत्र है, चुनाव होते हैं और अदालतें हैं— इसलिए वहां सुधार की संभावना अधिक है। परंतु चीन में ऐसा नहीं है। वहां सत्ता केंद्रीकृत है, विरोध-असहमति की जगह नहीं। इसी कारण चीन का उदय अधिक चिंताजनक है।

शक्ति-संतुलन के इस कठोर खेल में भारत के लिए संदेश बिल्कुल स्पष्ट है— सहयोग करें, लेकिन समर्पण नहीं। किसी भ्रम में न रहे। कूटनीतिक चाशनी में डूबे शब्दों पर तुरंत विश्वास न करें। अंतरराष्ट्रीय राजनीति भावनाओं से नहीं, हितों और ताकत से चलती है। इसलिए दुनिया किसी “नई विश्व व्यवस्था” की ओर नहीं बढ़ रही; वह दरअसल उसी पुरानी, कठोर सच्चाई की ओर लौट रही है— जहां कमजोर की नैतिकता उपदेश लगती है, जबकि शक्तिशाली की नैतिकता नियम बन जाती है।

Exit mobile version