Naya India-Hindi News, Latest Hindi News, Breaking News, Hindi Samachar

अब डबल नहीं ट्रिपल इंजन की चाह

शिव सेना ब्रांड उप राष्ट्रीयता की हार और एमआईएम की बड़ी जीत का बारीकी से आकलन करें तो इसमें एमके स्टालिन और ममता बनर्जी दोनों के लिए चिंता की बात दिखेगी। दोनों उप राष्ट्रीयता की राजनीति करते हैं और दोनों मुस्लिम वोट को लेकर आश्वस्त रहते हैं कि वह उन्हीं को मिलेगा। लेकिन महाराष्ट्र के लोगों ने दिखाया है कि यह दोनों राजनीति विफल हो सकती है।

महाराष्ट्र में डबल इंजन की सरकार चल रही थी। 2019 से 2022 के ढाई साल के अंतराल को छोड़ दें तो 2014 के बाद से वहां डबल इंजन की सरकार है। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से सत्ता विरोधी भावना पनपती है। लेकिन महाराष्ट्र में उलटा हुआ। महाराष्ट्र के लोगों ने भाजपा को झोली भर कर वोट दिया ताकि ट्रिपल इंजन की सरकार बन जाए। देश की राजधानी दिल्ली के बाद देश की वित्तीय राजधानी मुंबई में भी ट्रिपल इंजन की सरकार बनी है। महाराष्ट्र के 29 नगर निकायों में चुनाव हुए, जिनमें 25 में भाजपा के नेतृत्व वाली महायुति ने जीत हासिल की है। इसका अर्थ है कि 25 शहरों में भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों का मेयर बनने जा रहा है। यह महाराष्ट्र के शहरी निकाय चुनाव के परिणाम का एक पहलू है।

अगर इसकी बारीकी में जाएंगे तो हैरान करने वाली बातें सामने आएंगे। राज्य में 28 सौ से ज्यादा प्रतिनिधि चुनने के लिए मतदान हुआ था, जिसमें लगभग आधे प्रतिनिधि भाजपा के चुने गए हैं। 29 निकायों में भाजपा का स्ट्राइक रेट 88 फीसदी से ज्यादा है, जो इससे पहले के चुनाव में 60 फीसदी के करीब था।

महाराष्ट्र के लोगों ने जो जनादेश दिया है वह पूरे देश में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति को परिभाषित करने वाला है। इस परिणाम को तीन कसौटियों पर देखने की जरुरत है। पहली कसौटी विकास की है, दूसरी रणनीति की है और तीसरी सामाजिक समीकरण की। इन तीनों कसौटियों पर भाजपा ने जिस तरह से चुनाव लड़ा वह अभूतपूर्व है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस की सरकार ने विकास को अपनी राजनीति के केंद्र में स्थापित किया है। भाजपा के विरोधी भी मानते हैं कि मुंबई की जैसी तस्वीर पिछले 11 साल में बदली है वह अद्भुत है। कनेक्टिविटी, जो मुंबई की सबसे बड़ी समस्या थी उसे दूर करने के लिए कमाल का काम हुआ है। अगर चुनावी रणनीति की बात करें तो वह पिछले एक दशक में भाजपा की सबसे बड़ी ताकत बनी है।

नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने चुनावी रणनीति को नई धार दी है, जिसकी चमक मुंबई में और बढ़ी। सत्ता के लोभ में शिव सेना ने भाजपा का साथ छोड़ा तो पार्टी टूट गई और आज ठाकरे परिवार अपनी प्रासंगिकता तलाश रहा है। भाजपा की मदद से एकनाथ शिंदे नगर निगम चुनाव में भी नंबर दो पार्टी के तौर पर उभरे हैं। भाजपा की राजनीतिक रणनीति ने महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार और शरद पवार दोनों की राजनीति को अप्रासंगिक बना दिया। विकास और रणनीति के साथ साथ भाजपा ने सामाजिक समीकरण भी बहुत सफलतापूर्वक साधा। ब्राह्मण मुख्यमंत्री बनाने के बाद पार्टी ने बहुत सावधानी से ब्राह्मण और बहुजन समीकरण साधा तो एकनाथ शिंदे और अजित पवार के जरिए मराठा वोट भी गठबंधन के साथ जोड़ा। इसके अलावा उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय और गुजराती वोट भी सहज रूप से भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन से जुड़े।

एक के बाद एक राज्यों में भाजपा की जीत का मूल कारण यह है कि उसने विकास के साथ साथ राजनीतिक रणनीति और सामाजिक समीकरण को जोड़े रखा। तीनों में किसी की भी अनदेखी नहीं की। महाराष्ट्र के चुनाव नतीजे को इस नजरिए से भी देखने की जरुरत है कि भाषायी और क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति के लिए मशहूर महाराष्ट्र में भाजपा ने कैसे अस्मिता की राजनीति को पराजित किया। इस पर खास ध्यान देने की जरुरत है क्योंकि अगले तीन महीने में जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं वे भाषायी अस्मिता वाले राज्य हैं। पश्चिम बंगाल से लेकर असम, केरल और तमिलनाडु में भाषा, संस्कृति और क्षेत्रवाद की राजनीति खूब चलती है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की राजनीति का केंद्रीय तत्व उप राष्ट्रीयता का रहता है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे ने इस बार मराठा उप राष्ट्रीयता का बिगुल बजा कर ही चुनाव लड़ा था। लेकिन उनकी पार्टी पूरे प्रदेश से साफ हो गई।

मुंबई में जहां ठाकरे परिवार 1968 से मेयर बनाता था वहां पहली बार भाजपा का मेयर बनेगा। शिव सेना का मुंबई का किला भी ढह गया। यह उप राष्ट्रीयता की राजनीति के अतिवादी इस्तेमाल की हार है। उद्धव ठाकरे ने राज ठाकरे से तालमेल किया, जो उत्तर भारतीयों पर हमले के लिए बदनाम रहे हैं। इस बार उन्होंने गुजरातियों के साथ साथ दक्षिण भारतीयों को निशाना बनाया और उनके लिए अपमानजनक विशेषणों का प्रयोग किया। इसका परिणाम यह हुआ कि उद्धव ठाकरे की पार्टी थोड़ी बच भी गई लेकिन राज ठाकरे की पार्टी साफ हो गई।

महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुसलमीन की सफलता पर भी ध्यान देने की जरुरत है। ओवैसी की पार्टी ने मुंबई के बीएमसी में आठ सीटें जीतीं। संभाजीनगर में वह दूसरे नंबर की पार्टी बनी और मालेगांव में पहले नंबर की पार्टी बनी। महाराष्ट्र में ओवैसी की पार्टी की 95 पार्षद जीते हैं। इतनी बड़ी कामयाबी इससे पहले ओवैसी की पार्टी को कहीं नहीं मिली। ध्यान रहे हैदराबाद से बाहर पहली बार महाराष्ट्र में ही उनकी पार्टी का सांसद बना था। अब महाराष्ट्र में ओवैसी की पार्टी से इतने पार्षदों का जीतना इस बात का संकेत है कि मुस्लिम मतदाता खास कर युवा मुस्लिम मतदाता अब अपना नेतृत्व तलाश रहे हैं। सेक्युलर राजनीति करने वाली पार्टियों के ऊपर से उनका विश्वास उठ रहा है। इसलिए वे जहां मौका मिलता है वहां मुस्लिम समुदाय के नेताओं की पार्टियों को समर्थन देने लगे हैं। बिहार में भी ओवैसी की पार्टी का जीतना इसका संकेत था तो महाराष्ट्र की जीत उस संकेत की पुष्टि है।

शिव सेना ब्रांड उप राष्ट्रीयता की हार और एमआईएम की बड़ी जीत का बारीकी से आकलन करें तो इसमें एमके स्टालिन और ममता बनर्जी दोनों के लिए चिंता की बात दिखेगी। दोनों उप राष्ट्रीयता की राजनीति करते हैं और दोनों मुस्लिम वोट को लेकर आश्वस्त रहते हैं कि वह उन्हीं को मिलेगा। लेकिन महाराष्ट्र के लोगों ने दिखाया है कि यह दोनों राजनीति विफल हो सकती है। पहले, उप राष्ट्रीयता या भाषायी अस्मिता की राजनीति की बात करें तो भाजपा ने महाराष्ट्र में दिखाया है कि राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, विकास और रणनीति की साझेदारी से इसकी राजनीति को हराया जा सकता है।

अप्रैल में जब पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, पुडुचेरी और केरल में चुनाव होंगे तो वहां महाराष्ट्र के चुनाव परिणामों की गूंज सुनाई देगी। पश्चिम बंगाल में भाषायी अस्मिता और उप राष्ट्रीयता की राजनीति कामयाब नहीं होगी। पिछले 15 साल में ममता बनर्जी की सरकार राज्य में पहले से अलोकप्रिय हो चुकी हैं और अब उस अलोकप्रियता को ढकने के लिए भावनात्मक मुद्दे उठाए जा रहे हैं। भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीयता ऐसे भावनात्मक मुद्दे हैं, जिन्हें ममता बनर्जी अक्सर उठाती रहती हैं। लेकिन अब भाजपा के सामने इन मुद्दों की धार खत्म हो गई है। महाराष्ट्र का संदेश है कि बंगाल में ममता बनर्जी का यह मुद्दा नहीं चलने वाला है।

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी का प्रदर्शन व्यापक रूप से कांग्रेस के लिए चिंता की बात है लेकिन अभी जो चुनाव हैं उसके लिहाज से ममता बनर्जी के लिए यह बड़ी चुनौती है। ममता बनर्जी मुस्लिम वोट को फॉर ग्रांटेड मानती हैं। उनको लगता है कि कांग्रेस और लेफ्ट को समाप्त कर दिया है तो भाजपा को रोकने के लिए मुस्लिम पूरी तरह से उनकी पार्टी का साथ देंगे। पिछली बार फुरफुरा शरीफ के पीरजादा अब्बास सिद्दीकी ने इंडियन सेकुलर फ्रंट नाम से पार्टी बनाई थी, जो कामयाब नहीं हुई। इससे ममता बनर्जी का हौसला और बढ़ा है। लेकिन पिछले पांच साल में स्थितियां काफी बदल गई हैं। अब मुस्लिम समाज के मतदाता लंबे समय की राजनीति का ध्यान रख कर अपना नेतृत्व बनाना चाहते हैं। तभी उन्होंने बिहार से लेकर महाराष्ट्र तक ओवैसी की पार्टी को समर्थन दिया है।

पश्चिम बंगाल में सिर्फ ओवैसी की पार्टी नहीं है, बल्कि कई और चुनौती है। तृणमूल कांग्रेस से निकाले गए हुमायूं कबीर ने जनता उन्नयन पार्टी बनाई है। वे मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद बनवा रहे हैं। उन्होंने जब मस्जिद का शिलान्यास किया तो लाखों मुस्लिम जुड़े और उन्होंने खुले दिल से चंदा दिया है। हुमायूं कबीर ने कहा है कि वे ओवैसी की पार्टी से तालमेल करेंगे। उधर नौशाद सिद्दीकी अपनी पार्टी इंडियन सेकुलर फ्रंट को लेकर गंभीरता से राजनीति कर रहे हैं। इन तीनों के बीच असम में सफल राजनीति कर चुके बदरूद्दीन अजमल भी किसी न किसी रूप में पश्चिम बंगाल के मैदान में उतरना चाहते हैं। सो, कांग्रेस और लेफ्ट के अलावा इस बार मुस्लिम वोट के चार अन्य दावेदार हैं और चारों दावेदार मुस्लिम समाज के हैं। महाराष्ट्र में ओवैसी की कामयाबी ने उनको प्रेरित किया है कि वे दूसरी मुस्लिम पार्टियों के साथ मिल कर मुस्लिम मतदाताओं को एक ऐसा मंच दें, जिस पर वे भरोसा कर सकें। अगर महाराष्ट्र का दोहराव पश्चिम बंगाल में हुआ तो ममता बनर्जी को लेने के देने पड़ेंगे।

ध्यान रहे पश्चिम बंगाल में 50 साल से ऐसी सरकार रही है, जिसका केंद्र के साथ टकराव रहा है। अब लोग इस टकराव को खत्म करना चाहते हैं। जब देश की राजधानी दिल्ली और वित्तीय राजधानी मुंबई में ट्रिपल इंजन की सरकार बन रही है तो देश की पुरानी राजधानी कोलकाता में कम से कम डबल इंजन की सरकार की उम्मीद तो की ही जा सकती है।   (लेखक दिल्ली में सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तामंग (गोले) के कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त विशेष कार्यवाहक अधिकारी हैं।)

Exit mobile version