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हे मंगलमूर्ति! इन को भी क्षमा करना, उन को भी

गणपति तो विध्नहर्ता हैं। कोई बुद्धिहर्ता और विवेकहर्ता तो हैं नहीं। इसलिए मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि भारत के प्रधान न्यायाधीश महोदय को यह बुद्धि-विवेक कहां से मिला कि वे भारत के प्रधानमंत्री जी को अपने यहां गणेश-आरती करने के लिए निमंत्रित करें? मुझे यह भी नहीं मालूम कि प्रधानमंत्री जी पर इस विवेक-बुद्धि का अवतरण कहां से हुआ कि वे बाक़ायदा महाराष्ट्रीय परिधान धारण कर, सिर पर टोपी लगा कर, आरती के निजी आयोजन में शिरकत करने पहुंच गए?

मुझे यह भी नहीं मालूम कि प्रधानमंत्री जी निमंत्रण मिलने पर प्रधान न्यायाधीश जी के घर गए या बिना आमंत्रण के वैसे ही घूमते-घामते पहुंच गए, जैसे नौ बरस पहले वे अफ़गानिस्तान से लौटते वक़्त  पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को जन्मदिन की मुबारक़बाद देने के लिए अचानक लाहौर में उतर गए थे? दस साल बाद कोई भारतीय प्रधानमंत्री तब पाकिस्तान पहुंचा था।

वैसे मुझे यह नहीं लगता कि प्रधान न्यायाधीश के घर हमारे प्रधानमंत्री साग्रह-बुलावा मिले बिना गए होंगे। इसलिए मेरे मन में कुछ सवाल खदबदा रहे हैं। पहला कि आदरणीय धनंजय यशवंत चंद्रचूड़ जी प्रधान न्यायाधीश तो नवंबर 2022 में बन गए थे। चलिए, 2022 का गणपति पूजन तो उन के प्रधान न्यायाधीश बनने से पहले हो चुका था। मगर पिछले साल 2023 में भी तो उन्होंने अपने घर में गणपति बिठाए होंगे। पूजन-आरती की होगी। अगर इस बार बुलाया है तो पिछले साल प्रधानमंत्री जी को ऐसे ही आग्रहपूर्वक आरती करने क्यों नहीं बुलाया था?

दूसरा सवाल मुझे यह परेशान कर रहा है कि अगर प्रधानमंत्री जी इस साल बिना बुलाए भी आरती करने चले गए थे तो यह सदाशयता उन्होंने पिछले साल क्यों नहीं दिखाई थी? क्या इसलिए कि पिछले साल गणपति पूजन के दो महीने बाद महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव नहीं होने वाले थे? इस बरस का नवंबर बहुत महत्वपूर्ण है। नवंबर में महाराष्ट्र के चुनाव होने हैं और नवंबर में ही हमारे मौजूदा प्रधान न्यायाधीष जी सेवानिवृत्त  होने वाले हैं। क्या ग़ज़ब का संयोग-शास्त्र हमें पढ़ने को मिल रहा है!

बचपन से अपने बुजु़र्गों से हम सुनते तो यही आ रहे हैं कि धर्म-मज़हब, पूजा-इबादत, हमारी निजी आस्था का, व्यक्तिगत एतिकाद का विषय है। अगर ऐसा है तो किसी प्रधान न्यायाधीश को अपने घर में हो रही व्यक्तिगत पूजा-उपासना में किसी प्रधानमंत्री को क्यों आमंत्रित करना चाहिए? चलिए कर लिया और प्रधानमंत्री जी चले भी गए तो किसी प्रधानमंत्री को इस व्यक्तिगत पूजा-आराधना की तस्वीरें इस तरह हुलस कर सोशल मीडिया पर सार्वजनिक क्यों करनी चाहिए?

एक और भी मज़़े की बात बताता हूं। मज़े की भी है, मगर संजीदा भी है। गणेश-आरती कर के लौटने के बाद प्रधानमंत्री जी ने बुधवार की रात 10 बज कर 11 मिनट पर अंग्रेज़ी में ट्वीट कर के 140 करोड़ देशवासियों को बताया कि मैंने प्रधान न्यायाधीश जी के घर जा कर गणेश पूजन किया। फिर 36 मिनट बाद उन्हें अहसास हुआ कि असली कसर तो बाकी ही रह गई। तो 10 बज कर 47 मिनट पर उन्होंने मराठी में ट्वीट किया कि ‘सरन्यायाधीश, न्यायमूर्ती डी वाय चंद्रचूड जी यांच्या निवासस्थानी गणेश पूजेत सामील झालो‘।

अपने अंग्रेज़ी ट्वीट का ऐसा कोई तजुऱ्मा गुजराती में, बंगाली में, मलयालम में, तमिल में, तेलुगु में, कन्नड़ में पोस्ट नहीं किया। और-तो-और हिंदी तक में यह सूचना ट्वीट पर पोस्ट करने की ज़हमत उठाना उन्होंने ज़रूरी नहीं समझा। अंग्रेज़ी के अलावा सिर्फ़ एक भारतीय भाषा – मराठी – में प्रधानमंत्री जी ने यह अहम सूचना अपने देशवासियों से साझा की। इस से हम क्या समझें? अगर व्यक्तिगत धार्मिक आस्था की लहरें दिल में हिलोरें ले रही थीं और महाराष्ट्र से आ रहा सियासी अंधड़ उन के दिमाग़ के किसी कोने में था ही नहीं तो यह सब क्यों?

मौजूदा प्रधानमंत्री जी के पहले 13 लोग भारत के प्रधानमंत्री बने हैं। मौजूदा प्रधान न्यायाधीश जी के पहले 49 लोग स्वतंत्र भारत के प्रधान न्यायाधीश रहे हैं। क्या उन प्रधान न्यायाधीशों में से किसी ने कभी किसी प्रधानमंत्री को अपने यहां निजी पूजा-पाठ में आमंत्रित किया था? आज के प्रधान न्यायाधीश जी के पिता जी 46 साल पहले प्रधान न्यायाधीश बने थे। वे सात साल प्रधान न्यायाधीश रहे। जब वे बने थे तो मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री थे। उन के वक़्त चरण सिंह भी प्रधानमंत्री रहे। उन के समय इंदिरा गांधी भी प्रधानमंत्री रहीं। और, जब वे सेवानिवृत्त हो रहे थे तो राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। तब इन के पिता जी के मन में ऐसे-ऐसे चार-चार प्रधानमंत्रियों में से किसी को भी अपने घर निजी पूजन के लिए आमंत्रित करने की ललक क्यों नहीं उठी? चारों प्रधानमंत्रियों में से भी किसी के दिल में तब के प्रधान न्यायाधीश के घर पूजन-आरती करने जाने की हुलक क्यों नहीं उठी? उन में से किसी ने भी इतनी पाकीज़ा नज़ीर पेश क्यों नहीं की?

इसलिए नहीं की कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संबंधों की एक आचरण संहिता है। न्यायाधीशों और नागरिक समाज का नेतृत्व कर रहे लोगों के बीच रिश्तों के कुछ अलिखित नियम हैं। राजनीतिकों और न्यायमूर्तियों के बीच सार्वजनिक और निजी ताल्लुक रखने की कुछ मर्यादाएं हैं। इस परिधि का उल्लंधन न करने की परंपरा का उस ज़माने में सभी पालन करते थे। लेकिन आज अगर कुछ महामना परंपरातोड़ू बनने पर उतारू हो गए हैं तो हम-आप क्या करें? टकटकी लगा कर देखते रहें? क्या इस तरह के दृश्यों से अपनी असहमति भी ज़ाहिर न करें? लोकतंत्र की स्थापित स्वस्थ परंपराओं के अनुसरण की दुहाई भी न दें?

पिछला एक दशक मूल्यों, परंपराओं और सिद्धांतों के अभूतपूर्व स्खलन का दशक साबित हुआ है। हमारे राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संसार में उसूलों के विपन्न होते जाने की ऐसी दर पिछले किसी और दशक में नहीं देखी गई। इस से बेहतर क्या हो सकता है कि किसी भी मुल्क़ के अलग-अलग क्षेत्रों के कर्णधार एक-दूसरे से सौहार्द-मिलन की नियमित बारंबारता बनाए रखें! मगर जब ऐसे मौक़े किसी ख़ास मंशा से तलाशे जाएं, कुछ ख़ास मक़सदों से दृश्य-रचनाए निर्मित हों और उन के सर्वजनीन प्रकाशन से निश्च्छल भाव की सुगंध के बजाय शतरंजी नीयत की दुर्गंध हवा में पसर रही हो तो ऐसे में समूचे समाज के अर्थवान तबकों से क्या हम प्रतिक्रियाविहीन बने रहने की अपेक्षा रखें?

अगर प्रधानमंत्री और प्रधान न्यायाधीश के ज़िम्मेदार पदों पर बैठी शख़्सियतें भी राजकाज की स्थापित मान्यताओं का आदर करने से कतराएंगी तो लोकतंत्र के अंकुर हरे-भरे कैसे रहेंगे? मनमर्ज़ी के आचार-विचार-व्यवहार का यह मट्ठा जनतंत्र की जड़ों को बुरी तरह झुलसा तो नहीं देगा? अगर यह सब हमारी चिंताओं का सबब नहीं है तो समझ लीजिए कि हम एक ऐसी गहरी खाई के मुहाने पर पहुंच रहे हैं, जिस की तलहटी से बाहर आना नामुमकिन हो जाएगा।

सो, मैं तो इतना ही कह सकता हूं कि गणपति पूजन के नाम पर जो हुआ, अच्छा नहीं हुआ। इस से प्रधानमंत्री जी और प्रधान न्यायाधीष जी की गरिमा तो कम हुई ही, इस पूरे प्रसंग से एकदंत गजानन चार भुजाधारी की महिमा और भव्यता को भी बट्टा लगा। दुआ करता हूं कि मंगलमूर्ति न्यायमूर्ति को क्षमा कर दें और लंबोदर छप्पन छाती को माफ़ी बख़्शे।

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